Fri, 04 April 2025 09:54:12pm
क्या कोई अपराधी महज कानूनी प्रक्रियाओं की जटिलताओं का सहारा लेकर बच सकता है? क्या न्याय केवल समय सीमा का बंधक बनकर रह जाएगा? सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट कर दिया कि न्याय की पहुंच को समय की सीमाओं में कैद नहीं किया जा सकता। धारा 319 सीआरपीसी के तहत अतिरिक्त आरोपियों को समन करने के संबंध में दिया गया यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के लचीलेपन और दोषियों को दंडित करने की अनिवार्यता को रेखांकित करता है।
मामले की पृष्ठभूमि:
यह मामला 14 अप्रैल 2009 को दर्ज एक एफआईआर से संबंधित है, जिसमें पांच व्यक्तियों पर भारतीय दंड संहिता की धाराओं 147, 148, 149 और 302 के तहत हत्या के आरोप लगाए गए थे। प्रारंभ में, पुलिस ने दो आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया, जबकि अन्य के खिलाफ जांच जारी रही। 27 अक्टूबर 2009 को ट्रायल कोर्ट ने आरोप तय किए, जिससे इरशाद और इरफान की 2011 में दोषसिद्धि हुई। इसके बाद, 2010 में धारा 319 सीआरपीसी के तहत अतिरिक्त आरोपियों को समन करने के लिए आवेदन किया गया, जिसे ट्रायल कोर्ट ने खारिज कर दिया। 2021 में, उच्च न्यायालय ने पुनरीक्षण अधिकार क्षेत्र में इस आवेदन पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया, जिसके परिणामस्वरूप 2024 में अतिरिक्त आरोपियों को समन जारी किया गया।
मुख्य मुद्दे:
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय:
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने इन प्रश्नों पर विचार करते हुए महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले। कोर्ट ने कहा कि यदि उच्च न्यायालय अपने पुनरीक्षण अधिकार का उपयोग करते हुए ट्रायल कोर्ट के आदेश को संशोधित या रद्द करता है, तो यह आदेश ट्रायल कोर्ट के मूल आदेश की तिथि से प्रभावी माना जाएगा। इसका अर्थ है कि यदि ट्रायल के दौरान धारा 319 सीआरपीसी के तहत आवेदन खारिज किया गया और बाद में उच्च न्यायालय ने इसे पुनर्विचार के लिए कहा, तो ट्रायल समाप्त होने के बाद भी ट्रायल कोर्ट इस पर विचार कर सकता है। यह निर्णय न्यायालय की उस शक्ति को रेखांकित करता है जो यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी दोषी व्यक्ति न्याय से बच न सके।
धारा 319 सीआरपीसी की शक्ति:
सुप्रीम कोर्ट ने धारा 319 सीआरपीसी की शक्ति को स्पष्ट करते हुए कहा कि यह प्रावधान न्यायालय को यह अधिकार देता है कि यदि ट्रायल के दौरान नए साक्ष्य सामने आते हैं जो यह संकेत देते हैं कि कोई अन्य व्यक्ति अपराध में शामिल है, तो उसे भी आरोपी के रूप में समन किया जा सकता है। यह शक्ति न्यायालय को यह सुनिश्चित करने में सक्षम बनाती है कि सभी दोषी व्यक्तियों को न्याय के कटघरे में लाया जा सके, चाहे वे प्रारंभिक जांच में शामिल हुए हों या नहीं।
समय की बाध्यता:
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 319 सीआरपीसी के तहत समन जारी करने की शक्ति ट्रायल के किसी भी चरण में प्रयोग की जा सकती है, बशर्ते कि नए साक्ष्य प्रस्तुत हों। यह निर्णय इस धारणा को खारिज करता है कि ट्रायल समाप्त होने के बाद अतिरिक्त आरोपियों को समन नहीं किया जा सकता। उच्च न्यायालय के पुनरीक्षण आदेश के बाद, ट्रायल कोर्ट की शक्ति पुनर्स्थापित हो जाती है और वह नए सिरे से मामले पर विचार कर सकता है।
न्यायिक प्रक्रिया में संतुलन:
यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया में संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है। एक ओर, यह सुनिश्चित करता है कि दोषी व्यक्ति कानूनी प्रक्रियाओं का लाभ उठाकर न्याय से बच न सकें, वहीं दूसरी ओर, यह भी सुनिश्चित करता है कि न्यायालय अपनी शक्तियों का उचित और न्यायसंगत उपयोग करें। यह निर्णय न्यायालयों को यह याद दिलाता है कि उनकी प्राथमिकता न्याय की सेवा करना है, न कि केवल प्रक्रियात्मक तकनीकीताओं का पालन करना।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय न्यायिक प्रणाली में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह न केवल धारा 319 सीआरपीसी की व्याख्या को स्पष्ट करता है, बल्कि न्यायालयों की शक्तियों और जिम्मेदारियों को भी पुनर्परिभाषित करता है। यह निर्णय यह सुनिश्चित करता है कि न्याय की प्रक्रिया में कोई भी दोषी व्यक्ति बच न सके और न्यायालय अपनी शक्तियों का उचित उपयोग करते हुए न्याय की सेवा करें।