समीक्षा

विकास का कंक्रीट और प्रकृति की मूक चीत्कारों का यथार्थ- अजय त्यागी 

आर्थिक विकास हेतु पर्यावरण की अनदेखी आत्मघाती है। खाद्य सुरक्षा, गिरता भूजल और प्रदूषण रोकने हेतु विकेंद्रीकृत जल संचयन व कड़े नीतिगत फैसले अनिवार्य हैं।

By अजय त्यागी

प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India (AI)

आज 21वीं सदी का भारत जब वैश्विक मंच पर 'आर्थिक महाशक्ति' बनने के महत्वाकांक्षी स्वप्न देख रहा है, ठीक उसी समय देश के पर्यावरण का बुनियादी ढांचा एक मूक और विनाशकारी पतन की ओर बढ़ रहा है। विकास की अंधी दौड़ में हमने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के आंकड़ों को तो चमका लिया, लेकिन जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं—सांस, पानी और शांति—को दांव पर लगा दिया। जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता का तेजी से होता ह्रास और प्रशासनिक उदासीनता के कारण उत्पन्न प्रदूषण, अब केवल पर्यावरणविदों के विमर्श का हिस्सा नहीं हैं। यह हमारी न्यायपालिका के कटघरे और आम आदमी की चौखट पर आ खड़ा हुआ एक अत्यंत क्रूर संकट है।

1. चरम मौसम और ऊर्जा-नीति के अंतर्विरोध
इस संकट का सबसे प्रत्यक्ष और जानलेवा रूप वर्तमान में चरम मौसमी घटनाओं (Extreme Weather Events) के रूप में सामने आ रहा है। उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में गर्मियों का पारा लगातार रिकॉर्ड तोड़ रहा है, तो वहीं दूसरी ओर बेमौसम भारी बारिश और सर्दियों के चक्र में आए अप्रत्याशित बदलावों ने देश की पूरी कृषि व्यवस्था और खाद्य सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है। भारत सरकार द्वारा कार्बन उत्सर्जन को कम करने के उद्देश्य से ऊर्जा सुरक्षा के तहत इथेनॉल सम्मिश्रण (Ethanol Blending) की दिशा में अभूतपूर्व प्रयास किए जा रहे हैं। पर्यावरण और ईंधन की दृष्टि से यह एक सराहनीय कदम है, लेकिन वर्तमान में पहली पीढ़ी (1G) के स्रोतों, जैसे खाद्यान्न (चावल और मक्का) और गन्ने का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा रहा है। नीति आयोग की चिंताओं के आलोक में, यह सीधे तौर पर हमारी खाद्य और जल सुरक्षा को प्रभावित कर रहा है। समय आ गया है कि हम पराली और कृषि अवशेषों पर आधारित दूसरी पीढ़ी (2G) के इथेनॉल उत्पादन की ओर रणनीतिक रूप से बढ़ें, ताकि पर्यावरण और पेट के बीच का संतुलन पूरी तरह न बिगड़ जाए।

2. न्यायिक सक्रियता बनाम प्रशासनिक विफलता: पानी का संकट
देश के कोने-कोने से आ रही जल संकट की तस्वीरें हमारे भविष्य की सबसे डरावनी झांकी पेश करती हैं। भूजल का स्तर रसातल में जा चुका है और नीति आयोग के पुराने 'समग्र जल प्रबंधन सूचकांक' (CWMI) के डरावने संकेत अब हकीकत में बदलते दिख रहे हैं। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने हाल ही में देश के कई राज्यों में हो रहे अवैध भूजल दोहन और उद्योगों द्वारा नियमों के उल्लंघन पर बेहद सख्त रुख अपनाया है। उदाहरण के लिए, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) द्वारा जुलाई 2025 में दिल्ली जल बोर्ड (DJB) पर बार-बार स्थगन मांगने और होटलों द्वारा किए जा रहे अवैध भूजल दोहन को न रोक पाने के कारण ₹50,000 का हर्जाना लगाया जाना यह साबित करता है कि हमारे पास कानून तो हैं, लेकिन क्रियान्वयन का ढांचा पूरी तरह खोखला हो चुका है। इसी प्रकार, मई 2026 में मध्य प्रदेश के शहडोल में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) द्वारा अल्ट्राटेक सीमेंट को प्रभावित ग्रामीण क्षेत्रों में भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) संरचनाएं अनिवार्य रूप से बनाने का आदेश देना यह दर्शाता है कि उद्योग पानी का अत्यधिक दोहन कर रहे हैं और स्थानीय समुदाय बूंद-बूंद को तरस रहे हैं।

इस प्रशासनिक ढुलमुलपन के बीच हमें जल शासन (Water Governance) के दो विपरीत वैचारिक मॉडलों को समझना होगा, जो हमारे भविष्य की दिशा तय करते हैं:

[जल शासन का भविष्य: केंद्रीयकृत बनाम विकेंद्रीकृत]
  प्रशासनिक आदेश (अपर-डाउन) > क्रियान्वयन विफलता > शून्य जनभागीदारी (विनाश)
  जल शक्ति अभियान (बॉटम-अप) > वर्षा जल संचयन > जन भागीदारी (सतत भविष्य)

पहला मॉडल प्रशासनिक आदेश (Top-Down) का है, जो जल शासन की पारंपरिक और विकृत नौकरशाही व्यवस्था को दर्शाता है। इसमें जल प्रबंधन की नीतियां और नियम वातानुकूलित कमरों में बैठे उच्च अधिकारियों द्वारा तय किए जाते हैं। स्थानीय भौगोलिक, सामाजिक और व्यावहारिक परिस्थितियों को समझे बिना ऊपर से आदेश थोप दिए जाते हैं। चूंकि इन योजनाओं में स्थानीय समाज की वास्तविक आवश्यकताओं की उपेक्षा होती है, इसलिए ज़मीन पर यह 'क्रियान्वयन विफलता' का शिकार हो जाती है। परिणाम यह होता है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी नहरें सूखी रह जाती हैं और जलाशय केवल कागज़ों पर बनते हैं। जब आम जनता को लगता है कि यह केवल सरकारी काम है, तो समाज में 'शून्य जनभागीदारी' की स्थिति पैदा होती है। लोग पानी की संपत्तियों को अपनी जिम्मेदारी नहीं मानते और जनता की यही बेरुखी अंततः जलस्रोतों के सूखने और पूर्ण 'विनाश' (जल संकट) के रूप में सामने आती है।

इसके विपरीत, दूसरा मॉडल विकेंद्रीकृत शासन (Bottom-Up) का है, जो आधुनिक, लोकतांत्रिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण को रेखांकित करता है। केंद्र सरकार की योजना जल शक्ति अभियान: कैच द रेन (JSA: CTR) इसी 'बॉटम-अप' सिद्धांत पर काम करती है। यह प्रशासन को निर्देश देने के बजाय स्थानीय समुदायों और पंचायतों को अपनी जल-संरचनाएं खुद तय करने और उनका जीर्णोद्धार करने की स्वायत्तता देती है। इस मॉडल का मुख्य तकनीकी व सामाजिक हथियार 'वर्षा जल संचयन' (Rainwater Harvesting) है। जब स्थानीय लोग खुद शामिल होते हैं, तो वे अपनी मिट्टी को पहचानते हैं; वे जानते हैं कि गाँव का कौन सा तालाब गहरा करना है और कहाँ चेक डैम बनाना है। जब आम नागरिक खुद श्रमदान करते हैं, तो उनमें जलस्रोतों के प्रति एक मजबूत 'जन भागीदारी' और स्वामित्व का भाव पैदा होता है। यही भागीदारी पानी के दीर्घकालिक रखरखाव को सुनिश्चित करती है, जो अंततः देश को एक 'सतत और सुरक्षित भविष्य' की ओर ले जाती है।

हालाँकि, ज़मीनी हकीकत यह भी है कि यह अभियान अक्सर बेसिन-स्तरीय (River Basin-level) योजना के बजाय जिला-स्तरीय सीमाओं में सिमट कर रह जाता है, जिससे इसका वास्तविक पारिस्थितिक लाभ सीमित हो जाता है। हमें पूरी तरह 'सतत जल शासन' की ओर बढ़ना होगा, जहाँ उद्योगों और बहुमंजिला शहरी इमारतों में उपयोग किए गए पानी की 100% रीसाइक्लिंग अनिवार्य हो और वर्षा जल संचयन प्रत्येक नागरिक का कानूनी दायित्व बने।

3. ध्वनि प्रदूषण: एक स्वीकृत सामाजिक महामारी
इन सब के बीच, एक ऐसा प्रदूषण हमारे समाज में महामारी की तरह फैल चुका है जिसे हम प्रदूषण की श्रेणी में रखने को भी तैयार नहीं हैं—वह है ध्वनि प्रदूषण। वायु और जल प्रदूषण पर तो फिर भी थोड़ी-बहुत कानूनी और सामाजिक बहस देखने को मिलती है, लेकिन राजनीतिक रैलियों, लाउडस्पीकरों, शादी-ब्याह के उत्सवों और अनियंत्रित निर्माण कार्यों से होने वाले तीव्र शोर को भारतीय समाज ने 'उत्साह और जीवंतता' का प्रतीक मानकर मौन स्वीकृति दे दी है। यह केवल एक असुविधा नहीं, बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य संकट है, जो उच्च रक्तचाप, मानसिक अवसाद, अनिद्रा और बहरेपन जैसी समस्याओं को जन्म दे रहा है। भारत के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के कड़े नियम और माननीय सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट दिशा-निर्देश होने के बावजूद, पुलिस और स्थानीय प्रशासन का प्रवर्तन तंत्र (Enforcement Mechanism) इस मोर्चे पर पूरी तरह पंगु नजर आता है। जब तक ध्वनि प्रदूषण को एक सामाजिक अपराध और गंभीर स्वास्थ्य जोखिम के रूप में रेखांकित नहीं किया जाएगा, तब तक एक स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण असंभव है।

4. जैव-विविधता और पारिस्थितिकी का पतन
जलवायु परिवर्तन और बढ़ते शहरीकरण का सबसे क्रूर प्रहार हमारी जैव-विविधता पर हो रहा है। हाल ही में पर्यावरण मंत्रालय के विमर्शों में यह बात सामने आई है कि जंगलों के अंधाधुंध कटान और कंक्रीट के अनियंत्रित विस्तार के कारण देश में मानव-वन्यजीव संघर्ष (Man-Animal Conflict) की घटनाएं चरम पर पहुंच गई हैं। आर्द्रभूमियों (Wetlands) का संकट इसका एक बड़ा उदाहरण है, जो बाढ़ नियंत्रण और भूजल पुनर्भरण की रीढ़ होती हैं। उदाहरण के तौर पर, दिसंबर 2025 में पर्यावरण मंत्रालय की अधिकार प्राप्त टास्क फोर्स की बैठक में उत्तर प्रदेश की 40 और बिहार की 19 उच्च प्राथमिकता वाली आर्द्रभूमियों (Wetlands) को तत्काल कानूनी संरक्षण देने की आवश्यकता पर बल दिया गया था, क्योंकि ये पर्यावरण संतुलन की अंतिम रक्षा पंक्ति हैं। जैव-विविधता का यह नुकसान केवल कुछ प्रजातियों के विलुप्त होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे इकोसिस्टम को कमजोर कर रहा है, जिससे भविष्य में कोविड-19 जैसी अन्य ज़ूनोटिक महामारियों का खतरा और अधिक बढ़ जाता है।

निष्कर्ष
अब समय केवल सम्मेलनों में बैठकर चिंता जताने या घोषणापत्र जारी करने का नहीं, बल्कि अत्यंत कड़े और अप्रिय नीतिगत फैसले लेने का है। सतत विकास लक्ष्यों (SDG-2030) के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को यदि वास्तव में पूरा करना है, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि पर्यावरण और विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। यदि हमारा पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र ही ढह गया, तो आठ या नौ प्रतिशत की जीडीपी (GDP) विकास दर और गगनचुंबी कंक्रीट की इमारतें मानव सभ्यता को बचाने नहीं आएंगी। प्रकृति हमें चरम मौसम और न्यायपालिका के माध्यम से लगातार अपनी अंतिम चेतावनियां दे रही है; यदि हम अब भी अपनी जीवनशैली और प्रशासनिक नीतियों में क्रांतिकारी बदलाव नहीं लाए, तो इतिहास हमारी इस आत्मघाती प्रगति को कभी माफ नहीं करेगा।

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