विकास और पर्यावरण के संतुलन पर प्रबुद्धजनों का गंभीर मंथन। जानिए कैसे कंक्रीट का अनियंत्रित विस्तार हमारे भविष्य के लिए एक बड़ा संकट बन रहा है।
प्रबुद्धजनों का मंथन
आज 21वीं सदी का भारत जब वैश्विक मंच पर 'आर्थिक महाशक्ति' बनने का स्वप्न देख रहा है, तब एक संपादक और एक जागरूक नागरिक के रूप में मुझे देश के पर्यावरण का बुनियादी ढांचा विनाशकारी पतन की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। मैंने दिनांक 15 मई को अपने आलेख "विकास का कंक्रीट और प्रकृति की मूक चीत्कारों का यथार्थ"[आलेख] में यह तर्क दिया था कि विकास की अंधी दौड़ ने जीडीपी के आंकड़े तो चमकाए हैं, लेकिन हमारी सांस, पानी और शांति को दांव पर लगा दिया है। मेरे द्वारा उठाए गए इस वैचारिक प्रश्न पर जब प्रबुद्ध वर्ग ने मंथन किया, तो जो निष्कर्ष निकलकर आए, वे मेरे उन तर्कों की पुष्टि करते हैं जिन्हें अब सामूहिक संकल्प में बदलने की आवश्यकता है। आइए जानते हैं कि किसने क्या कहा-
स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के अंतर्संबंधों का विश्लेष्ण करते हुए डॉ. गुंजन सोनी, विकास और पर्यावरण की अनदेखी के गंभीर दुष्परिणामों पर प्रकाश डालते हैं:
“पर्यावरण संरक्षण आज केवल एक वैचारिक विमर्श नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन चुका है। पत्रकार अजय त्यागी द्वारा प्रस्तुत यह आलेख विकास और प्रकृति के बीच बिगड़ते संतुलन का अत्यंत यथार्थपूर्ण विश्लेषण करता है। लेख में जल संकट, ध्वनि प्रदूषण, जैव-विविधता के क्षरण और प्रशासनिक उदासीनता जैसे मुद्दों को जिस तथ्यात्मक और संवेदनशील दृष्टिकोण से रखा गया है, वह समाज और नीति निर्माताओं दोनों के लिए एक बड़ी चेतावनी है। वास्तविकता यह है कि विकास की अंधी दौड़ में हम अपनी प्राथमिकताओं को भूलते जा रहे हैं। यदि अब भी सतत विकास, जल संरक्षण और अपनी पर्यावरणीय जिम्मेदारी को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो आने वाली पीढ़ियों को इसके गंभीर दुष्परिणाम भुगतना पड़ेगा। त्यागी की यह चिंता हम सभी के लिए एक आईना है, जो हमें कागजी दुनिया से बाहर निकलकर धरातल पर कार्य करने का संदेश देती है। अतः यह हमारा परम कर्तव्य है कि हम सामूहिक प्रयासों द्वारा पर्यावरण को संरक्षित करें। प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना ही एकमात्र विकल्प है, क्योंकि बिना इसके कोई भी प्रगति अंततः आत्मघाती सिद्ध होगी। हमें विकास के साथ-साथ प्रकृति की रक्षा के संकल्प को अपनी जीवनशैली में उतारना ही होगा ताकि एक सुरक्षित भविष्य का निर्माण हो सके।”
डॉ. गुंजन सोनी
सतत समाधानों के पक्षधर प्रोफेसर डॉ. अजय जोशी, विकास और पर्यावरण के बीच सामंजस्य स्थापित करने का मार्ग सुझाते हैं:
“वर्तमान परिवेश में विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों ही जरूरी हैं और इन दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। उदाहरण के लिए, सरकार सौर ऊर्जा को बढ़ावा दे रही है और इसके लिए अनुदान भी प्रदान कर रही है। सोलर सिस्टम लगाने में पेड़ कटना स्वाभाविक है और पेड़ कटने से पर्यावरण संतुलन बिगड़ना भी स्वाभाविक है। इन दोनों चुनौतीपूर्ण स्थितियों के बीच सामंजस्य स्थापित करने हेतु एक प्रभावी उपाय यह किया जा सकता है कि सोलर सिस्टम लगाते समय यदि पेड़ों को काटना अनिवार्य हो, तो उनके बदले अन्य उपयुक्त स्थानों पर उतने ही या उससे अधिक संख्या में पेड़ लगाकर इस पर्यावरणीय क्षति की भरपाई की जाए और संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया जा सकता है। इसी तरह के अन्य नवाचारी उपाय करके विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों में संतुलन स्थापित किया जा सकता है। हमें यह समझना होगा कि विकास की गति और प्रकृति की सुरक्षा एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक होने चाहिए। यदि हम सही योजना और वृक्षारोपण की प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ें, तो हम प्रगति के लक्ष्यों को प्राप्त करते हुए अपनी पृथ्वी को हरा-भरा रख सकते हैं, जो भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक है।”
प्रोफेसर डॉ. अजय जोशीसामाजिक चेतना को महत्व देने वाले प्रोफेसर डॉ. नरसिंह बिनानी, विकास और पर्यावरण के संरक्षण में व्यक्तिगत उत्तरदायित्व को रेखांकित करते हैं:
“प्रिय अजय त्यागी जी, आप द्वारा लिखा गया आलेख अत्यंत समसामयिक है। वर्तमान समय में मानव और प्रकृति के मध्य की दूरी लगातार बढ़ती जा रही है। वनों का विनाश, भूजल का अत्यधिक दोहन, सड़कों पर असंख्य पेट्रोल-डीजल गाड़ियों की रेलमपेल, और घरों में बढ़ते एसी का चलन आदि सहित अन्य अनेक ऐसे कारण हैं जो प्रदूषण को दिन-प्रतिदिन बढ़ा रहे हैं। यह एक अत्यंत गंभीर स्थिति है जिसके लिए हमें केवल सरकार पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। यह समय की मांग है कि हम सभी इस विषय की गंभीरता को समझें और व्यक्तिगत स्तर पर भी अपनी जिम्मेदारी निभाएं। प्रत्येक व्यक्ति यदि इन्हें रोकने का थोड़ा-थोड़ा प्रयास करेगा, तो ही इस बढ़ते प्रदूषण के खतरे को नियंत्रित किया जा सकेगा और पर्यावरण को पुनर्जीवित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकेंगे। प्रदूषण से निपटने के लिए सामूहिक और व्यक्तिगत भागीदारी ही एकमात्र प्रभावी समाधान है। आपके लेख ने न केवल इन समस्याओं को रेखांकित किया है, बल्कि समाज को जागरूक होने के लिए प्रेरित भी किया है। पर्यावरण संरक्षण केवल एक नीतिगत विषय नहीं, बल्कि हमारा नैतिक दायित्व है जिसे हमें पूरी ईमानदारी से निभाना होगा। यदि हम समय रहते सजग नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ी के लिए परिस्थितियाँ अत्यंत विकट हो जाएंगी।”
प्रोफेसर डॉ. नरसिंह बिनानीशैक्षिक उत्तरदायित्व को प्राथमिकता देने वाले दिग्विजय सिंह जोधा, विकास और पर्यावरण के प्रति युवा पीढ़ी को प्रेरित करने का संकल्प लेते हैं:
“The article by Ajay Tyagi, a renowned media representative, rightly highlights how blind concrete development slowly disconnects humanity from nature. In the same way, educational institutions must ensure that growth is not only about expanding buildings, branches, and profits, but also about building responsible citizens with values, ethics, and environmental awareness. As a leading education brand, Aakash Educational Services Limited has the power to inspire lakhs of students toward sustainable thinking and social responsibility. Real success is not just producing ranks and results, but nurturing a generation that respects nature, humanity, and ethical progress. Development without environmental balance eventually becomes a burden on society. It is time for institutions to integrate ecological sensitivity into their core curriculum, ensuring that the leaders of tomorrow understand the profound connection between personal success and planetary health. When education moves beyond academic excellence to encompass a commitment to our earth, it fosters a truly holistic growth. Such an approach will not only benefit the environment but also shape a more empathetic and conscious society. By prioritizing these values, we can transform our educational landscape into a catalyst for positive change, proving that our progress is meaningful only when it is sustainable and deeply rooted in a respect for the world we inhabit.”
Digvijay Singh Jodhaनीतिगत विसंगतियों को गहराई से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार मोहन थानवी, विकास और पर्यावरण के प्रति प्रशासनिक ढिलाई को आत्मघाती मानते हुए अपनी बात रखते हैं:
“हमारा भारत विश्व गुरु रहा है और इस अलंकरण को फिर पाने के प्रयास तेज हैं। दिन-दूनी रात-चौगुनी प्रगति करते हुए हम अपने पुरोधाओं के मार्ग पर अग्रसर तो हैं, लेकिन लगता है कि भावी पीढ़ी तक संरक्षित-संवर्द्धित पर्यावरण सौंपने की चिंता से हम मुक्त हो रहे हैं। इसी चिंता को लेखनी के धनी अजय त्यागी ने अपने विश्लेषण को "विकास का कंक्रीट और प्रकृति की मूक चीत्कारों का यथार्थ" शीर्षक देकर रेखांकित किया है और समाज को चेताया है। उन्होंने विकास की चमक के पार्श्व में अंधेरे का साम्राज्य बना रही नीतिगत विसंगतियों की ओर नीतिकारों का ध्यानाकर्षण कराने का प्रभावी प्रयास किया है। त्यागी बल देकर सीधे-सीधे कहते हैं कि आर्थिक विकास हेतु पर्यावरण की अनदेखी आत्मघाती है। वे दो टूक मशविरा देते हैं कि खाद्य सुरक्षा, गिरता भूजल और प्रदूषण रोकने हेतु विकेंद्रीकृत जल संचयन व कड़े नीतिगत फैसले अनिवार्य हैं। त्यागी के विश्लेषण की विशेषता यह भी है कि यदि हम अपनी जीवनशैली और प्रशासनिक नीतियों में क्रांतिकारी बदलाव नहीं लाए, तो इतिहास हमारी इस आत्मघाती प्रगति को कभी माफ नहीं करेगा। निश्चय ही, अजय त्यागी की चिंता हम सभी की चिंता का आईना है। कागजी और वैचारिकी दुनिया से बाहर निकल, सामूहिक प्रयासों से धरातल पर समन्वित विकास मार्ग प्रशस्त करना आज हमारा परम दायित्व है।”
मोहन थानवीप्रकृति के प्रति संवेदनशील कवि- कथाकार राजाराम स्वर्णकार, विकास और पर्यावरण के नाम पर हो रहे विरोधाभासों को खेजड़ी वृक्षों के कटाव के संदर्भ में बताते हैं:
“आर्थिक विकास हेतु पर्यावरण की अनदेखी आत्मघाती है। खाद्य सुरक्षा, गिरता भूजल और प्रदूषण रोकने हेतु सरकार की तरफ़ से पर्यावरण एवं जल संचयन हेतु कड़े नीतिगत फैसले लेने होंगे। आज 21वीं सदी का भारत जब वैश्विक मंच पर 'आर्थिक महाशक्ति' के रूप में उभर रहा है, ठीक इसी समय देश के पर्यावरण का बुनियादी ढांचा विनाशकारी पतन की ओर बढ़ रहा है। विकास की अंधी दौड़ में सरकारी स्तर पर कई ऐसे फैसले लिए गए हैं जो मानवता हेतु विनाशकारी हैं। हमने जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं जैसे हवा, पानी और पर्यावरण को दांव पर लगा दिया है। जलवायु परिवर्तन और जैव-विविधता का तेजी से हनन हो रहा है; प्रशासनिक उदासीनता के चलते प्रदूषण अब केवल पर्यावरणविदों के विमर्श का मामला नहीं रहा, बल्कि यह आम आदमी की चौखट पर खड़ा एक अत्यंत क्रूर संकट है। सरकार एक तरफ पौधे लगाने की बात कर रही है, वहीं दूसरी तरफ सोलर प्लांट लगाने हेतु खेजड़ी जैसे धार्मिक वृक्ष बहुतायत से काटे जा रहे हैं। यह विरोधाभास मानवता हेतु संकट खड़ा कर रहा है। यदि वृक्ष कटेंगे, तो ऑक्सीजन कहां से मिलेगा? हमारी भावी पीढ़ियों हेतु यह बहुत बुरा हो रहा है। इस बारे में निजी स्तर पर संगठनात्मक कार्य हो रहे हैं मगर वे पर्याप्त नहीं हैं। अतः सरकार को भविष्य की तरफ देखते हुए नीतिगत अच्छे निर्णय लेकर जनहित हेतु कार्य करना चाहिए।”
राजाराम स्वर्णकारपर्यावरण के प्रति गंभीर चिंता रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार जयनारायण बिस्सा, विकास और पर्यावरण के असंतुलन से उपजे मौसम के संकट पर कहते हैं:
“2017 में आयी शानदार फिल्म कड़वी हवा में गुलजार साहब की मार्मिक कविता है कि बंजारे लगते हैं मौसम और वे अब बेघर होने लगे हैं। इंसान जंगल, पेड़, पहाड़, समंदर काट रहा है और ज़मी की खाल छीलकर उसे टुकड़े-टुकड़े बाँट रहा है। यदि हम पिछले 25-30 वर्षों में अपने इर्द-गिर्द हो रहे परिवर्तनों और उनके परिणामों पर दृष्टि डालें, तो कवि द्वारा रचित शब्दों का यह खेल आज के दौर में अत्यंत कटु यथार्थ सिद्ध होता है। पर्यावरण ह्रास का सीधा प्रभाव मनुष्य पर पड़ रहा है और हमारे जीवन-स्तर में वास्तविक रूप से गिरावट आती जा रही है। 2013 की केदारनाथ त्रासदी, 2017 के चक्रवात इरमा, हार्वे, 2019 का डोरियन, 2022 की यूरोप की हीट वेव और 2023 का बिपरजॉय चक्रवात सिर्फ बानगी हैं, जबकि वास्तविकता इनसे कहीं अधिक भयानक रूप धारण कर रही है। आर्थिक मुनाफे के इस युग में हम पर्यावरण संरक्षण के महत्व को तभी समझते हैं जब आर्थिक लाभ दिखें। पर्यावरण हमें जो अनमोल सेवायें देता है, उनका मौद्रिक रूपांतरण इतना अधिक होगा कि श्रेष्ठ मानव-बुद्धि व अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी द्वारा भी उसकी भरपाई करना असंभव है।”
जयनारायण बिस्साजल एवं पर्यावरण संरक्षण और प्रबंधन की विशेषज्ञ डॉ. मुदिता पोपली, विकास और पर्यावरण के लिए विकेंद्रीकृत समाधानों की वकालत करती हैं:
“यह आलेख आज के भारत के विकास मॉडल पर एक बेहद जरूरी और साहसिक प्रश्न खड़ा करता है। आर्थिक प्रगति के नाम पर जिस तरह प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हो रहा है, वह भविष्य के लिए गंभीर खतरा है। लेखक ने स्पष्ट किया है कि केवल जीडीपी वृद्धि विकास का पैमाना नहीं हो सकती, यदि नागरिक स्वच्छ हवा, सुरक्षित पानी और शांत वातावरण से वंचित हो जाए। इस आलेख की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें पर्यावरण संकट को केवल भावनात्मक मुद्दा न बनाकर नीति, न्यायपालिका और प्रशासनिक विफलताओं के संदर्भ में विश्लेषित किया गया है। इथेनॉल ब्लेंडिंग, भूजल दोहन, ध्वनि प्रदूषण और आर्द्रभूमियों के क्षरण जैसे विषयों को तथ्यात्मक आधार पर जोड़ना इसे अत्यंत प्रासंगिक बनाता है। जल शासन के ‘टॉप-डाउन’ और ‘बॉटम-अप’ मॉडल की तुलना लेख का प्रभावशाली हिस्सा है। यह स्पष्ट करता है कि सरकारी योजनाओं के साथ जनभागीदारी आधारित विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन ही भविष्य का टिकाऊ समाधान है। वर्षा जल संचयन और जल पुनर्चक्रण को कानूनी दायित्व बनाने की मांग समय की आवश्यकता है। ध्वनि प्रदूषण को सामाजिक महामारी के रूप में उठाना भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि शोर भी स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डालता है। यह आलेख केवल पर्यावरणीय चिंता व्यक्त नहीं करता, बल्कि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करने की ठोस दिशा भी सुझाता है। यह नीति-निर्माताओं, प्रशासन और आम नागरिक—सभी के लिए एक चेतावनी और आत्ममंथन का दस्तावेज है।”
डॉ मुदिता पोपलीसमाधान-मूलक दृष्टि रखने वाले शिक्षाविद रविंद्र भटनागर, विकास और पर्यावरण की समस्याओं में समाज की भूमिका को स्पष्ट करते हैं:
“ज्वलंत विषय! प्रशासन एवं समाज, दोनों का ही यह पुनीत दायित्व है कि वे आने वाली भावी पीढ़ी के लिए एक स्वच्छ एवं सुरक्षित वातावरण उपलब्ध करवाएं। स्वच्छ वायु, स्वच्छ जल, शुद्ध खाद्यान्न एवं रोजगार के अवसर उपलब्ध करवाना न केवल सरकार का संवैधानिक दायित्व है, अपितु समाज भी अपने नागरिक कर्तव्यों का पालन कर इसमें बेहद अहम भूमिका निभा सकता है। अपने पर्यावरण की रक्षा करना, स्वच्छता को जीवन में अपनाना, आधुनिक संसाधनों का अंधानुकरण न करना, अपनी भावी पीढ़ी को नशे जैसी बुराइयों से दूर रखना, समाज में सुरक्षित वातावरण उत्पन्न करना, तथा बिजली एवं पानी की बचत करना हम सभी का साझा दायित्व है। वास्तव में, मात्र दूसरों को दोष देने या केवल सरकार पर उंगलियां उठाने से इन जटिल समस्याओं का कोई स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। यदि हम वास्तव में एक बेहतर भविष्य का निर्माण करना चाहते हैं, तो समाज को स्वयं ही जागृत होना होगा। जब तक हर व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं समझेगा, तब तक व्यवस्था में वांछित परिवर्तन लाना कठिन है। अतः विकास और संरक्षण के बीच संतुलन साधते हुए, सामूहिक प्रयासों से ही हम एक स्वस्थ, सुरक्षित और समृद्ध राष्ट्र की नींव रख सकते हैं, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुखद विरासत साबित होगी।”
रविंद्र भटनागरपर्यावरणीय प्रभाव के सूक्ष्म विश्लेषक आनन्द आचार्य, विकास और पर्यावरण के बिगड़ते संतुलन के स्वास्थ्य पर प्रभावों को समझाते हैं:
“यह संकट अब केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले कुछ वर्षों में आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी को सीधे प्रभावित करेगा। पानी की कमी से खेती महंगी होगी, जिससे खाद्यान्न और सब्जियों के दाम लगातार बढ़ेंगे। भूजल स्तर गिरने से छोटे शहरों और गांवों में पीने के पानी का संकट और गहराएगा। इसके अतिरिक्त, बढ़ती गर्मी और ध्वनि प्रदूषण सीधे तौर पर लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डालेंगे, जिनमें हाई ब्लड प्रेशर, सांस संबंधी बीमारियां और मानसिक तनाव तेजी से बढ़ सकते हैं। बेमौसम बारिश और चरम मौसम का प्रतिकूल असर अगले 3 से 5 वर्षों में और अधिक स्पष्ट दिखाई देगा। यदि अभी कड़े और ठोस नीतिगत फैसले नहीं लिए गए, तो आने वाला दशक आम नागरिक के लिए महंगाई, गंभीर जल संकट और स्वास्थ्य समस्याओं का सबसे कठिन दौर बन सकता है। हमें यह समझना होगा कि पर्यावरणीय असंतुलन का सीधा संबंध हमारे जीवनयापन की लागत और शारीरिक स्वास्थ्य से है। यदि इस चुनौती को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो स्थिति हाथ से निकल जाएगी। समय की मांग है कि हम प्रशासनिक सक्रियता और व्यक्तिगत स्तर पर सावधानी बरतते हुए एक सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करने की दिशा में कार्य करें, अन्यथा आने वाली पीढ़ी के लिए जीवन अत्यंत दुष्कर हो जाएगा।”
आनन्द आचार्यभावी पीढ़ियों के हितों के रक्षक मुख्य संपादक विनय थानवी, विकास और पर्यावरण के अनियंत्रित स्वरूप पर चेतावनी देते हैं:
“पत्रकार अजय त्यागी का यह लेख केवल पर्यावरणीय संकट का विश्लेषण मात्र नहीं है, बल्कि यह हमारे वर्तमान विकास मॉडल पर एक गंभीर वैचारिक प्रश्न भी खड़ा करता है। लेख में जल संकट, ध्वनि प्रदूषण, जैव-विविधता के क्षरण और प्रशासनिक विफलताओं को जिस तथ्यात्मक मजबूती और संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया गया है, वह समाज और शासन, दोनों के लिए एक चेतावनी है। वर्तमान दौर में आवश्यकता केवल नई योजनाओं की घोषणा करने की नहीं, बल्कि जनभागीदारी पर आधारित सतत विकास को अपनाने की है। प्रकृति के साथ संतुलन बनाए बिना विकास की कोई भी अंधी दौड़ अंततः मानव सभ्यता को ही गहरे संकट में डाल देगी। त्यागी ने जिस स्पष्टता के साथ इन विसंगतियों को रेखांकित किया है, वह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम अपनी सुख-सुविधाओं के लिए अपनी भावी पीढ़ियों का भविष्य दांव पर लगा रहे हैं। स्पष्ट है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक होने चाहिए। यदि हमने समय रहते अपनी जीवनशैली और प्रशासनिक नीतियों में क्रांतिकारी बदलाव नहीं लाए, तो यह आत्मघाती प्रगति इतिहास में एक बड़ी भूल के रूप में दर्ज होगी। सामूहिक प्रयासों से ही धरातल पर समन्वित विकास का मार्ग प्रशस्त करना आज हमारा परम दायित्व है।”
विनय थानवीप्रशासनिक तंत्र की विफलता पर कड़ा रुख अपनाने वाले संपादक बलजीत गिल, विकास और पर्यावरण के द्वंद्व में एनजीटी की भूमिका पर टिप्पणी करते हैं:
“भारत ‘आर्थिक महाशक्ति’ बनने का सपना देख रहा है, लेकिन वास्तविकता यह है कि उसकी नदियां सूख रही हैं, हवा ज़हरीली हो रही है और ज़मीन प्यास से दरक रही है। जलवायु परिवर्तन, बेकाबू प्रदूषण और प्रशासनिक विफलताओं ने मिलकर पर्यावरणीय संकट को एक भयावह राष्ट्रीय आपदा में बदल दिया है। वर्तमान इथेनॉल नीति से देश की खाद्य और जल सुरक्षा पर निरंतर खतरा मंडरा रहा है, जबकि भूजल दोहन को रोकने के प्रयासों में सरकारें सिर्फ कागजी नोटिसों तक ही सीमित हैं। एनजीटी (NGT) की समय-समय पर दिखाई गई सख्ती यह स्पष्ट रूप से साबित करती है कि देश में कानून तो मौजूद हैं, मगर उन्हें लागू करने वाला शासन तंत्र पूरी तरह से निष्क्रिय बना हुआ है। विकास की इस अंधी दौड़ ने आज ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि यह अब नागरिकों की सांस, पानी और उनके सुनहरे भविष्य को निगल रही है। यदि हमने समय रहते इन नीतिगत विसंगतियों और पर्यावरणीय ह्रास पर ध्यान नहीं दिया, तो आर्थिक महाशक्ति बनने का हमारा सपना अधूरा रह जाएगा। हमें पर्यावरण संरक्षण को विकास का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा, ताकि हम विकास के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित, स्वच्छ और हरित परिवेश भी सुनिश्चित कर सकें, क्योंकि बिना संतुलित पर्यावरण के कोई भी आर्थिक प्रगति अंततः आत्मघाती ही सिद्ध होगी।”
बलजीत गिलएक संपादक के तौर पर, मेरा यह आलेख महज कागजी चिंता नहीं, बल्कि प्रकृति की उन मूक चीत्कारों को सुनने का एक प्रयास था जिन्हें विकास की चकाचौंध में दबाया जा रहा है। आज इन सभी प्रबुद्ध जनों के विचारों को अपने लेख में समाहित करते हुए मैं यह विश्वास के साथ कह सकता हूं कि अब जागना ही एकमात्र विकल्प है। यदि हमने समय रहते अपने विकास मॉडल को प्रकृति के अनुकूल नहीं ढाला, तो आने वाली पीढ़ियां हमें ऐसी सभ्यता के रूप में याद करेंगी जिसने सोने के महल तो बनाए, लेकिन सांस लेने के लिए स्वच्छ हवा नहीं छोड़ी। अब समय संवाद का नहीं, संकल्प का है—क्योंकि प्रकृति की कोख से खिलवाड़ कर हम केवल प्रगति नहीं, बल्कि अपनी आत्मघाती विदाई की पटकथा लिख रहे हैं। आइए संकल्प लें, ताकि कल की सुबह आज से कहीं अधिक उज्ज्वल और सुरक्षित हो।