ये महंगाई की मार नहीं जनस्वास्थ्य अभियान है, बढ़ती कीमतों के जरिए सरकार जनता की सेहत सुधार रही है, जनता व्यर्थ परेशान ना हो।
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India
ये महंगाई की मार नहीं जनस्वास्थ्य अभियान है, लेकिन देश की भोली जनता इसे बेवजह महंगाई समझकर सरकार को कोस रही है। सरकार आखिर जनता का कितना ध्यान रखे? ट्रेन का किराया बढ़ा दिया ताकि लोग बेकार की यात्राएं कम करें। अब हर तीसरे दिन रिश्तेदारी में जाकर मुफ्त की चाय पीने की आदत पर लगाम लगेगी। आदमी घर में रहेगा, थकेगा कम, बीमार कम पड़ेगा। इसे कहते हैं दूरदर्शी सोच।
पेट्रोल और डीजल महंगे कर दिए गए ताकि लोग पैदल चलना शुरू करें। सरकार समझ चुकी है कि जनता योग नहीं करेगी, जिम नहीं जाएगी, सुबह दौड़ेगी नहीं। इसलिए जेब पर ऐसा प्रहार किया गया कि आदमी खुद ही बाइक निकालने से पहले दो बार सोचने लगे। अब लोग पैदल सब्जी लेने जाएंगे, साइकिल चलाएंगे, पेट अंदर होगा और देश फिट बनेगा। इतनी चिंता आजकल पत्नी भी नहीं करती।
रसोई गैस महंगी कर दी गई ताकि लोग कम खाएं। ज्यादा खाना वैसे भी बीमारियों की जड़ माना जाता है। सरकार ने बिना किसी डॉक्टर की फीस लिए पूरे देश का डाइट प्लान लागू कर दिया। अब रोटियां गिनी जा रही हैं, सब्जियां नापकर बन रही हैं और पेट अपने आप कंट्रोल में आ रहा है। जनता परेशान है लेकिन सरकार उसके पाचन तंत्र को मजबूत बनाने में लगी है इसलिए कहता हूँ, "ये महंगाई की मार नहीं जनस्वास्थ्य अभियान है।"
खाने का तेल महंगा हुआ तो कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल में आने लगा। चीनी महंगी हुई तो डायबिटीज का खतरा घटने लगा। बिजली महंगी हुई तो लोग जल्दी सोने लगे। रातभर एसी चलाकर बीमारी बुलाने वालों को सरकार ने सीधा संदेश दिया कि सूरज के साथ उठो और स्वस्थ रहो। कुल मिलाकर सरकार वह सब कर रही है जो घर वाले सालों समझाकर नहीं कर पाए।
अमेरिका-ईरान तनाव ने दुनिया की अर्थव्यवस्था हिला दी तो भारत में भी दाम बढ़ गए। गैस, तेल, दूध, दाल और सब्जियां सब ऊपर चली गईं। आम आदमी का बजट ऐसा बिगड़ा जैसे बरसात में सरकारी सड़क। लेकिन सरकार विरोधियों को यह कौन समझाए कि यह आर्थिक संकट नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुधार योजना का हिस्सा है।
भुजिया, कचौड़ी, समोसे और मिर्ची बड़े के दाम बढ़ गए तो लोग दुखी हो गए। अरे भाई, यही चीजें तो डॉक्टर खाने से मना करते हैं। सरकार ने सोचा होगा कि जब जनता समझाने से नहीं मानेगी तो जेब के रास्ते ही सुधारना पड़ेगा। अब आदमी सौ बार सोचेगा कि समोसा खाऊं या बच्चों के लिए दूध ले जाऊं। यानी फिटनेस अपने आप आएगी क्योंकि "ये महंगाई की मार नहीं जनस्वास्थ्य अभियान है।"
प्रधानमंत्री ने ईंधन बचाने की अपील की तो नेताओं में सादगी की लहर दौड़ गई। कोई स्कूटर पर दिखा, कोई साइकिल पर। एक कलेक्टर साहब तो साइकिल से दफ्तर पहुंच गए। हालांकि पीछे सुरक्षा में दो गाड़ियां भी चल रही थीं। जनता इसे नौटंकी कह रही है, लेकिन जनता भावनाओं को समझती ही कहां है। त्याग कैमरे में दिखना भी तो जरूरी है।
अगर सादगी की शुरुआत करनी ही थी तो संसद से होती, जहां खाना आज भी आम आदमी की थाली से सस्ता मिलता है। मुफ्त यात्रा, मुफ्त ठहराव और मुफ्त सुविधाओं के बीच जनता को त्याग का पाठ पढ़ाना अपने आप में लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रेरणादायक दृश्य है। सत्ता और विपक्ष भले टीवी पर लड़ते हों, लेकिन सुविधाओं का मामला आते ही दोनों का हृदय मिल जाता है।
एक दौर लाल बहादुर शास्त्री, गुलजारी लाल नंदा और एपीजे अब्दुल कलाम जैसे नेताओं का था, जिनकी सादगी दिखती नहीं थी बल्कि जी जाती थी। शास्त्री जी ने उपवास की अपील की तो खुद भी पालन किया। कलाम साहब राष्ट्रपति होकर भी सामान्य जीवन जीते रहे। इसीलिए ये नेता आज भी दिलों में बसते हैं।
ज़्यादा दूर जाने की भी जरूरत नहीं है। बीकानेर ने भी मुरलीधर व्यास, प्रो. केदार और महबूब अली जैसे नेताओं को देखा है, जिनकी पहचान सरकारी काफिलों से नहीं बल्कि सादगी और ईमानदारी से होती थी। ये लोग अखबारों में जगह खरीदकर नहीं, लोगों के दिलों में जगह बनाकर राजनीति करते थे। आज भी लोग उन्हें सम्मान से याद करते हैं क्योंकि उन्होंने राजनीति को व्यापार नहीं बनने दिया।
लेकिन, आज राजनीति सेवा कम और स्थायी निवेश योजना ज्यादा लगती है। एक बार कुर्सी मिल जाए तो सात पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित माना जाता है। पुराने नेता इतिहास में सम्मान से याद किए जाते हैं और नए नेता रोज अखबारों में फोटो के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं।
बहरहाल, ये महंगाई की मार नहीं जनस्वास्थ्य अभियान है, बस जनता अभी इसकी गहराई समझ नहीं पा रही। सरकार आपका ध्यान आपकी पत्नी से भी ज्यादा रख रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि पत्नी प्यार से समझाती है और सरकार सीधे जेब से।— अजय त्यागी