इसरो जल शक्ति मंत्रालय एमओयू के जरिए पानी के आकलन और प्रबंधन को मिलेगी नई दिशा, सैटेलाइट तकनीक से सुधरेगा जल संकट का हाल।
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India
(दिल्ली)। इसरो जल शक्ति मंत्रालय एमओयू के जरिए भारत के जल प्रबंधन तंत्र को एक हाई-टेक 'अमृत' का इंतजार है। अंतरिक्ष से जमीन के नीचे के जल स्तर को भांपने की यह कवायद तब शुरू हो रही है जब देश का बड़ा हिस्सा जल संकट की मार झेल रहा है। मंत्रालय और इसरो के बीच होने वाला यह समझौता यह बताने के लिए पर्याप्त है कि अब फाइलों में सिमटा जल संरक्षण, सैटेलाइट की डिजिटल आंखों से मॉनिटर किया जाएगा।
यह एमओयू महज एक रस्मी दस्तखत नहीं, बल्कि उस विफलता का स्वीकारोक्ति पत्र भी है, जिसे पिछले दशकों में जल संरक्षण के नाम पर केवल कागजों में ढाला गया है। अब जब तकनीक और सरकारी महकमों का मिलन हो रहा है, तो सवाल यह है कि क्या यह नई पहल धरातल पर प्यास बुझाएगी या फिर यह भी बजट के भारी-भरकम दावों में कहीं खो जाएगी।[1]
इस पहल के तहत 'मिशन फॉर एडवांसमेंट इन हाई-इंपैक्ट एरियाज फॉर वॉटर' को लॉन्च किया जा रहा है। इसका उद्देश्य जलवायु अनुकूलन और जल दक्षता को आधुनिक शोध के साथ जोड़ना है। मंत्रालय और नेशनल रिसर्च फाउंडेशन की यह संयुक्त पहल स्टार्टअप्स और एमएसएमई को भी साथ ला रही है, जो यह दर्शाता है कि अब समाधान के लिए सरकार अपने ही सीमित दायरे से बाहर देख रही है।
"जल संसाधन प्रबंधन, पेयजल, जलवायु अनुकूलन क्षमता और जल उपयोग दक्षता जैसे प्राथमिक क्षेत्रों में अत्याधुनिक शोध को बढ़ावा देना ही इस मिशन का मुख्य उद्देश्य है।"
इस सरकारी दांव में स्टार्टअप्स को शामिल करना यह बताता है कि पारंपरिक सरकारी ढर्रे से हटकर अब कुछ 'नवाचार' की तलाश है। हालांकि, पोर्टलों और डिजिटल मंचों की इस भीड़ में असली चुनौती यह है कि तकनीक का लाभ उन दूरदराज के क्षेत्रों तक कैसे पहुंचेगा, जहां पानी आज भी एक विलासिता है।
कार्यशाला के दौरान 'जल संचय जन भागीदारी: कैच द रेन' डिजिटल मंच को लॉन्च किया जाएगा। यह मंच नागरिकों और संस्थानों को जल संरक्षण के दस्तावेजीकरण के लिए प्रोत्साहित करेगा। सैद्धांतिक रूप से यह कदम सराहनीय है, लेकिन क्या डिजिटल प्रदर्शन से भूजल स्तर बढ़ेगा? अक्सर ऐसी सरकारी पहल में प्रदर्शन ही मुख्य उद्देश्य बन जाता है, जबकि वास्तविकता में कुओं और तालाबों के पुनर्भरण की धीमी प्रक्रिया उपेक्षित रह जाती है।
इसरो जल शक्ति मंत्रालय एमओयू का एक बड़ा हिस्सा नदी स्वरूपों और बाढ़ क्षेत्र मानचित्रण पर आधारित है। अंतरिक्ष एजेंसी इसरो अपनी रिमोट सेंसिंग तकनीकों से उन पहलुओं को उजागर करेगी, जिन्हें देखने में अब तक नौकरशाही नाकाम रही है। यदि इस बार भी तकनीक का उपयोग केवल प्रेजेंटेशन बनाने तक सीमित रहा, तो यह समझौता भी एक और चुनावी मौसम की आहट बनकर रह जाएगा।
कार्यशाला के साथ आयोजित होने वाली प्रदर्शनी स्टार्टअप्स के लिए एक अवसर है, लेकिन राजनीति से परे जाकर सोचें तो जल क्षेत्र में शोध का प्रभाव पिछले 12 वर्षों में नगण्य ही रहा है। इसरो जल शक्ति मंत्रालय एमओयू के तहत 24 प्राथमिक क्षेत्रों की पहचान की गई है, जो सुनने में बेहद आकर्षक है। उम्मीद है कि यह एमओयू केवल सरकारी अधिकारियों और उद्योगपतियों के फोटो सेशन तक सीमित न रहे।
इसरो जल शक्ति मंत्रालय एमओयू के बाद अब देखना यह है कि क्या बाढ़ के दौरान डूबने वाले शहर और गर्मी में सूखने वाले नल इस तकनीक के बाद अपनी बदहाली बदल पाएंगे? भारत में जल प्रबंधन हमेशा से एक जटिल पहेली रहा है, जिसे सुलझाने के लिए सैटेलाइट के साथ-साथ ईमानदारी की भी जरूरत है। यदि राजनीति से हटकर तकनीक को प्राथमिकता दी गई, तो शायद यह एमओयू भविष्य के जल युद्धों को टालने में सहायक हो सके।
यह लेख सरकारी घोषणाओं और सामान्य सूचनाओं पर आधारित है। जल प्रबंधन से जुड़ी परियोजनाओं में निवेश या स्टार्टअप्स को शामिल करने से पहले संबंधित आधिकारिक पोर्टल पर नियमों की समीक्षा करें। लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी प्रकार के प्रत्यक्ष या परोक्ष व्यावसायिक लाभ या हानि के लिए जिम्मेदार नहीं हैं।