भारत में एआई डेटा सेंटर बन रहे हैं ऊर्जा के लिए नए संकट का कारण, बिजली और पानी की भारी मांग से भविष्य पर मंडरा रहे हैं गंभीर सवाल।
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India
भारत में एआई डेटा सेंटर की स्थापना का शोर चारों ओर है, लेकिन इस डिजिटल चमक-धमक के पीछे एक ऐसी खामोश त्रासदी पल रही है, जिस पर अभी किसी का ध्यान नहीं गया है। हम एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) के माध्यम से एक वैश्विक महाशक्ति बनने की दौड़ में हैं, लेकिन इस दौड़ में हमारी असली चुनौती सॉफ्टवेयर नहीं, बल्कि बिजली और पानी जैसी प्राकृतिक संपदाएं हैं। हर बार जब हम एआई से एक सवाल पूछते हैं, तो हम अक्सर यह नहीं सोचते कि परदे के पीछे क्या हो रहा है और हम कितनी ऊर्जा का उपयोग कर रहे हैं।[1]
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की डिजिटल प्रगति के लिए डेटा सेंटर अनिवार्य हैं, लेकिन इनकी भूख ने अब बुनियादी ढांचे को हिला कर रख दिया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस लॉ के विशेषज्ञ साक्षर दुग्गल ने ठीक ही कहा है कि ये सेंटर विशाल कारखानों की तरह हैं, जो स्टील नहीं, बल्कि एआई के जवाब बनाते हैं। लेकिन ये जवाब हमारी धरती के संसाधनों की कीमत पर आ रहे हैं। क्या हमने कभी सोचा है कि एक सवाल का जवाब हमें किस कीमत पर मिल रहा है?
भारत में एआई डेटा सेंटर का दायरा जैसे-जैसे बढ़ रहा है, ऊर्जा का संकट विकराल होता जा रहा है। पारंपरिक डेटा सेंटर के मुकाबले एआई के लिए इस्तेमाल होने वाले ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (GPUs) और बड़े लैंग्वेज मॉडल कई गुना अधिक बिजली की खपत करते हैं। अगर हम एक स्कूटर के इंजन को जेट इंजन से बदल दें, तो यह उस ऊर्जा के अंतर को समझने जैसा है, जिसे आज का एआई इंफ्रास्ट्रक्चर डेटा सेंटरों में लेकर आ रहा है।
उद्योग के अनुमानों के अनुसार, भारत के डेटा सेंटर वर्तमान में लगभग 1.2 गीगावाट बिजली की खपत कर रहे हैं, जो आने वाले वर्षों में बढ़कर 13.56 गीगावाट तक पहुंच सकता है। यह एक ऐसी वृद्धि है जिसे सामान्य बिजली ग्रिड संभाल नहीं पाएंगे। यह विकास की एक ऐसी दौड़ है, जहां हम भविष्य को तो सुरक्षित कर रहे हैं, लेकिन वर्तमान के उन संसाधनों को जला रहे हैं जो शायद आने वाली पीढ़ियों के लिए कम पड़ जाएंगे।
मोहित कपूर, इंफ्रास्ट्रक्चर और सस्टेनेबिलिटी कमेंटेटर, का कहना है कि 'क्लाउड' शब्द केवल मार्केटिंग की एक सफल चाल है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हमारा डेटा हवा में तैर रहा है, जबकि वास्तविकता यह है कि यह इमारतों में बंद सर्वरों का गुलाम है। ये सर्वर दिन-रात बिजली पर जिंदा हैं और उन्हें ठंडा रखने के लिए विशाल थर्मल-मैनेजमेंट सिस्टम की जरूरत पड़ती है। इनका बिजली पर निर्भर होना विकल्प नहीं, बल्कि इनका अस्तित्व है।
"क्लाउड शब्द डिजिटल युग के सबसे सफल मार्केटिंग आविष्कारों में से एक है। वास्तविकता इससे कहीं अधिक कठोर है। यह डिजिटल क्लाउड सर्वरों से भरी इमारतों के अंदर रहता है, जो बिजली से संचालित होते हैं और जटिल थर्मल-मैनेजमेंट सिस्टम द्वारा ठंडे किए जाते हैं," मोहित कपूर, विशेषज्ञ।
बिजली की खपत के अलावा, पानी का संकट सबसे भावुक और गंभीर मुद्दा है। पूर्व साइबर सुरक्षा समन्वयक लेफ्टिनेंट जनरल डॉ. राजेश पंत ने खुलासा किया है कि चैटजीपीटी से पांच सवाल पूछने पर लगभग 250 मिलीलीटर पानी की खपत होती है। जब देश के कई हिस्सों में पीने के पानी का संकट है, तब डेटा सेंटर के कूलिंग सिस्टम के लिए पानी की अंधाधुंध निकासी पर्यावरण के प्रति हमारी असंवेदनशीलता को दर्शाती है।
यह विडंबना ही है कि डेटा सेंटर अक्सर उन्हीं शहरों में बनाए जा रहे हैं जहां पहले से ही बिजली और पानी की भारी मांग है। यदि हम आने वाले समय में जल संरक्षण और ऊर्जा प्रबंधन पर ध्यान नहीं देते हैं, तो भारत में एआई डेटा सेंटर केवल प्रगति के स्तंभ नहीं, बल्कि संसाधनों के विनाश का कारण बन जाएंगे। नीति निर्माताओं के लिए अब डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ इन बुनियादी संसाधनों की गवर्नेंस पर ध्यान देना अनिवार्य हो गया है।
अच्छी बात यह है कि राज्यों ने अब इस गंभीर चुनौती को पहचानना शुरू कर दिया है। आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने डेटा सेंटरों के लिए समर्पित नीति बनाई है, जहां वे सीधे नवीकरणीय ऊर्जा (renewable energy) का उपयोग कर सकते हैं। यह न केवल परिचालन लागत को कम करता है, बल्कि पर्यावरण पर पड़ने वाले भार को भी संतुलित करने का एक छोटा सा प्रयास है। भारत को 2035 तक 31 बिलियन डॉलर के बाजार तक पहुंचने के लिए टिकाऊ समाधानों की आवश्यकता है।
अंत में, भारत में एआई डेटा सेंटर का भविष्य इसी बात पर निर्भर करेगा कि हम तकनीक के साथ-साथ प्रकृति के प्रति कितने जवाबदेह हैं। यह विकास तभी सार्थक है जब वह हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी और बिजली के संसाधनों को सुरक्षित रखे। हमें एक ऐसी 'इंटेलिजेंट' इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है जो न केवल स्मार्ट हो, बल्कि जिम्मेदार भी हो। प्रगति की इस दौड़ में, हमें मानवता को मशीनों के पीछे नहीं भूलना चाहिए।