मरुस्थलीकरण को रोकने और दम तोड़ते पर्यावरण को बचाने के लिए शुरू हुआ अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट वास्तव में अरावली की संजीवनी साबित होगा।
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India
'अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट', प्रकृति के अंधाधुंध दोहन और इंसानी लालच के कारण कंक्रीट के मरुस्थल में तब्दील हो रही देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला के लिए यह महाअभियान वस्तुतः अरावली की संजीवनी बनकर सामने आया है। इस पूरे संवेदनशील क्षेत्र की आबोहवा को बदलने और दम तोड़ते पारिस्थितिकी तंत्र को नई जिंदगी देने के उद्देश्य से अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट की रूपरेखा तैयार की गई है। अफ्रीका की ऐतिहासिक 'ग्रेट ग्रीन वॉल' की तर्ज पर शुरू की गई यह महायोजना केवल कागजी दावों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश में कार्बन सिंक के दायरे को बढ़ाने का एक अभूतपूर्व और भगीरथ प्रयास है। पर्यावरणविदों की मानें तो इस महाअभियान को धरातल पर पूरी तरह उतारने के लिए केवल रस्मी घोषणाओं की नहीं, बल्कि फौलादी प्रशासनिक इच्छाशक्ति और निरंतर वित्तीय प्रवाह की सख्त दरकार है।
गुजरात के ऐतिहासिक पोरबंदर से शुरू होकर हरियाणा के पानीपत की सीमाओं को छूने वाला यह विशाल हरित गलियारा करीब चौदह सौ किलोमीटर की लंबाई में एक अभेद्य सुरक्षा कवच की तरह आकार लेगा। पांच किलोमीटर की चौड़ाई में विकसित होने वाली यह सघन वन पट्टी थार मरुस्थल के पूर्व की ओर बढ़ते कदमों पर हमेशा के लिए ब्रेक लगा देगी। इतना ही नहीं, यह कॉरिडोर उत्तर भारत के आसमान में छाने वाले जानलेवा धूल भरे तूफानों की रफ्तार को रोककर जहरीले वायु प्रदूषण को सोखने के लिए एक महा-फिल्टर की तरह काम करेगा। इस विस्तृत योजना के माध्यम से कायाकल्प की एक नई इबारत लिखने, बंजर भूमि को दोबारा उपजाऊ बनाने और पाताल में जा चुके भूजल स्तर को रीचार्ज करने का एक बड़ा लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
करोड़ों वर्षों से भारत के भूगोल और पर्यावरण की रक्षक रही अरावली पर्वत श्रृंखला आज खुद अपने अस्तित्व की अंतिम सांसें गिन रही है। अनियोजित शहरीकरण, जंगलों की अंधाधुंध कटाई और जलवायु परिवर्तन के घातक गठजोड़ ने इस प्राकृतिक ढाल को भीतर से पूरी तरह खोखला और जर्जर कर दिया है। यदि वक्त रहते इस विनाशलीला को थामने के लिए कोई ऐतिहासिक कदम नहीं उठाया गया, तो दिल्ली-एनसीआर समेत पूरा उत्तर भारत बहुत जल्द एक तपते हुए मरुस्थल में तब्दील हो जाएगा।
इसी डरावने और आसन्न संकट के बीच 'अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट' [योजना] देश के लिए एक नई उम्मीद और चेतना बनकर उभरा है। यह महज कुछ लाख पौधे रोप देने का कोई रस्मी सरकारी कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह इस पूरी पट्टी के भूगोल और नियति को बदलने का एक ऐतिहासिक महाअभियान है। इस महत्वाकांक्षी पहल की कामयाबी पर न केवल राजस्थान का बल्कि इसके पड़ोसी राज्यों की एक बहुत बड़ी आबादी का भविष्य और जीवन दांव पर लगा है।
इस ऐतिहासिक परियोजना का अंतिम लक्ष्य एक ऐसा अभेद्य और जीवंत हरित कवच तैयार करना है जो प्रकृति के साथ सदियों से हो रहे खिलवाड़ की पूरी भरपाई कर सके। अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट के केंद्र में उस उपजाऊ कृषि भूमि को मरुस्थल बनने से बचाना है, जो हर साल रेगिस्तानी बवंडरों की भेंट चढ़ती जा रही है। यह कॉरिडोर प्रकृति और इंसान के बीच खो चुके संतुलन को वापस बहाल करने की एक गंभीर वैज्ञानिक कोशिश है।
इसके व्यापक रणनीतिक लक्ष्यों में इतने विशाल सघन वनों का निर्माण शामिल है जो देश के सबसे बड़े 'CARBON SINK' के रूप में स्थापित हो सकें। जब यह चौदह सौ किलोमीटर लंबी पट्टी पूरी तरह घने जंगलों से ढक जाएगी, तो स्थानीय स्तर पर मानसून के बिगड़े मिजाज में भी अप्रत्याशित सुधार होगा। यह हरित दीवार न केवल कड़ाके की गर्मियों में तापमान को बढ़ने से रोकेगी, बल्कि आने वाले कल के लिए मौसम को भी अनुकूल बनाएगी।
इस महायोजना की नींव मुख्य रूप से वर्ष 2023 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा रखी गई थी, जब मरुस्थलीकरण की विभीषिका को रोकने के लिए इसका विस्तृत खाका तैयार हुआ था। इसके बाद विश्व पर्यावरण दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर 5 जून 2025 को माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इसका आधिकारिक और बड़े स्तर पर शुभारंभ किया गया। इस हाई-प्रोफाइल लॉन्चिंग के बाद से ही इस महत्वाकांक्षी अभियान ने रफ्तार पकड़ी और मैदानी स्तर पर जमीनी काम को बेहद तेज कर दिया गया।
यह दूरगामी अभियान एक व्यवस्थित चरणबद्ध योजना के तहत आगे बढ़ रहा है, जिसे 2025 से 2034 तक यानी पूरे 10 वर्षों की लंबी अवधि में चरणबद्ध तरीके से पूरा करने का लक्ष्य है। इस भगीरथ प्रयास को मजबूत वित्तीय आधार देने के लिए इसके पहले चरण के वास्ते 16,053 करोड़ रुपये का एक भारी-भरकम बजट भी आवंटित किया जा चुका है। वर्तमान में यह योजना पूरी तरह सक्रिय है और इसके अंतर्गत राजस्थान, हरियाणा, गुजरात व दिल्ली के प्रभावित जिलों में अत्याधुनिक नर्सरी बनाने, बंजर भूमि को नया जीवन देने और स्थानीय जल निकायों को पुनर्जीवित करने का काम युद्धस्तर पर जारी है।
इस महाकाय और दूरगामी लक्ष्य को केवल वातानुकूलित कमरों में बैठकर या बड़े-बड़े विज्ञापनों के जरिए हासिल करना कतई मुमकिन नहीं है। धरातल पर सबसे पहली और सबसे बड़ी चुनौती अरावली के सीने को छलनी करने वाले अवैध और माफिया संचालित खनन पर पूरी तरह पूर्णविराम लगाने की है। दशकों से बेखौफ जारी इस दोहन ने अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट के मार्ग की पहाड़ियों का लगभग पच्चीस प्रतिशत हिस्सा हमेशा के लिए नक्शे से मिटा दिया है।
इसके साथ ही, पहाड़ों को काटकर बनाई जा रही आलीशान अवैध इमारतों, फार्महाउसों और रियल एस्टेट के अनियंत्रित अतिक्रमण पर प्रशासन को कड़ा बुलडोजर चलाना होगा। सच कहा जाए तो इन विनाशकारी ताकतों को रोके बिना अरावली की संजीवनी का धरातल पर असर देखना असंभव है। जब तक इस बेहद नाजुक इको-सेंसिटिव जोन में इंसानी दखलंदाजी, अनियोजित निर्माण और अंधाधुंध व्यावसायिक गतिविधियों को कानून की ताकत से पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं किया जाता, तब तक जमीन पर कोई भी हरियाली स्थाई रूप से पनप नहीं पाएगी।
हालात की भयावहता को देखते हुए न्यायपालिका और प्रशासन ने इस संकट से निपटने के लिए कुछ बेहद कड़े और स्वागत योग्य कदम उठाए हैं। देश की सर्वोच्च अदालत ने स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए अरावली क्षेत्र में सभी नए खनन पट्टों के आवंटन पर पूरी तरह रोक लगा दी है। न्यायालय ने सभी राज्यों के लिए पहाड़ियों की एक समान परिभाषा भी तय कर दी है ताकि नियमों के लूपहोल्स का फायदा उठाकर पहाड़ों को न काटा जा सके।
जमीनी स्तर पर भी वन विभागों ने संवेदनशील और अतिक्रमण की जद में आए क्षेत्रों की फेंसिंग और अत्याधुनिक डिजिटल मैपिंग का काम तेज कर दिया है। हालांकि इन कानूनी बंदिशों और अदालती हंटर के कारण वर्तमान में माफियाओं के हौसले कुछ हद तक पस्त जरूर हुए हैं, लेकिन इस दुर्गम और विशाल पर्वत श्रृंखला की चौबीसों घंटे अचूक निगरानी के लिए अभी भी जमीन पर कड़े पहरे की भारी कमी खल रही है।
इस महाअभियान को कागजी फाइलों से निकालकर हकीकत में बदलने के लिए हमें अपनी पुरानी और पारंपरिक गलतियों को दोहराने से बचना होगा। पर्यावरणविदों का स्पष्ट मत है कि अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हम वहाँ किस प्रकार के पौधे लगा रहे हैं। विदेशी या मिट्टी का पानी सोखने वाली आक्रामक प्रजातियों के बजाय केवल और केवल अरावली की मूल देशी प्रजातियों के वृक्षों को ही प्राथमिकता देनी होगी।
इसके अलावा, इस अभियान को वन विभाग के दफ्तरों से बाहर निकालकर एक जन-आंदोलन का रूप देना होगा। जब तक इस पर्वत श्रृंखला के आंचल में रहने वाले ग्रामीण समुदायों, आदिवासियों और स्थानीय नौजवानों को इस प्रोजेक्ट का हिस्सेदार नहीं बनाया जाता, तब तक लगाए गए पौधों की सुरक्षा मुमकिन नहीं है। यही जनभागीदारी इस पूरी योजना में प्राण फूंकने का काम करेगी और इसे अरावली की संजीवनी के असली स्वरूप में स्थापित करेगी।
चौदह सौ किलोमीटर लंबे और पांच किलोमीटर चौड़े इस महाकाय हरित साम्राज्य को स्थापित करना और उसकी निरंतर सुरक्षा सुनिश्चित करना किसी भी सरकार के लिए अकेले संभव नहीं है। इसके लिए एक विशाल और बेहद अनुशासित समर्पित ग्रीन टास्क फोर्स यानी मैनपावर की भारी जरूरत होगी। इस अभियान के तहत स्थानीय बेरोजगार युवाओं को प्रशिक्षित करके 'पर्यावरण रक्षक' के रूप में तैनात किया जाना चाहिए, जिससे बड़े पैमाने पर हरित रोजगार पैदा होंगे।
संसाधनों की इस सूची में सबसे अहम कड़ी है निरंतर और बिना किसी रुकावट के मिलने वाला भारी-भरकम बजट। इस तरह के दीर्घकालिक प्रोजेक्ट्स अक्सर धन की कमी के कारण दम तोड़ देते हैं। इसलिए सरकार को सरकारी खजाने के अलावा देश के बड़े कॉरपोरेट घरानों को इस अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट से जोड़ना होगा और उनके सीएसआर फंड का एक बड़ा हिस्सा सीधे इस अभियान में झोंकना होगा।
यदि अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट अपनी पूरी कार्यक्षमता के साथ धरातल पर साकार हो जाता है, तो यह उत्तर भारत के भूगोल के लिए किसी ईश्वरीय वरदान से कम नहीं होगा। दिल्ली-एनसीआर समेत इसके दायरे में आने वाले दर्जनों शहरों का वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी एक्यूआई हमेशा के लिए सुधर जाएगा और करोड़ों लोगों को प्रदूषण जनित बीमारियों से मुक्ति मिलेगी। सघन हरियाली के कारण समूचे उत्तर भारत के बढ़ते तापमान में भारी गिरावट आएगी।
यह विशाल वन क्षेत्र गिरते भूजल स्तर के लिए एक प्राकृतिक रीचार्ज स्पंज की तरह काम करेगा, जिससे सूख चुके जलस्रोत दोबारा पानी से लबालब हो जाएंगे। इसके साथ ही, नष्ट हो चुके जंगलों के दोबारा जीवित होने से लुप्तप्राय वन्यजीवों को अपना खोया हुआ आशियाना वापस मिलेगा। यह कॉरिडोर आने वाले समय में इको-टूरिज्म और पर्यावरण अनुकूल ग्रामीण आजीविका का एक बेहद समृद्ध वैश्विक मॉडल बनकर उभरेगा।
इसके विपरीत, यदि यह महायोजना भी इच्छाशक्ति की कमी, राजनीतिक उदासीनता या भ्रष्टाचार की भेंट चढ़कर विफल हो जाती है, तो आने वाला कल किसी प्रलय से कम नहीं होगा। थार मरुस्थल बिना किसी प्राकृतिक रुकावट के सीधे देश की सबसे उपजाऊ कृषि भूमि को निगलते हुए दिल्ली की सीमाओं को पार कर जाएगा, जिससे देश के सामने अन्न और भुखमरी का एक अभूतपूर्व संकट खड़ा हो सकता है।
इस विफलता के कारण भूजल का स्तर पाताल में चला जाएगा और उत्तर भारत की प्यास बुझाने वाली नदियां और तालाब पूरी तरह दम तोड़ देंगे। प्रदूषण का स्तर इतना जानलेवा हो जाएगा कि शहरों में सांस लेना भी मौत को दावत देने जैसा होगा। वन्यजीव हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएंगे और हमारी आने वाली पीढ़ियां एक बंजर, बेजान और जलती हुई धरती पर रहने के लिए अभिशप्त होंगी।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के अनुसार, "अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट पर्यावरण सुधार की दिशा में एक बेहद जरूरी कदम है लेकिन यह केवल एक उपचार की तरह है। अरावली को पूरी तरह बचाने के लिए मूल खतरों जैसे अवैध खनन और अनियंत्रित शहरीकरण को रोकना ही सबसे प्रभावी रोकथाम साबित होगी।"
निष्कर्ष के तौर पर, अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट प्रकृति को उसका खोया हुआ गौरव लौटाने का भारत का अब तक का सबसे साहसिक और निर्णायक कदम है। इसकी कामयाबी सरकार के विज़न, प्रशासन की कड़ाई और आम जनता के सहयोग के मजबूत त्रिकोण पर टिकी हुई है। समय की सुइयां तेजी से घूम रही हैं और अरावली को बचाने के लिए इस हरित दीवार को अभेद्य बनाना अब हमारी मजबूरी भी है और जिम्मेदारी भी। बहरहाल अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट का धरातल पर फलीभूत होना ही अरावली की संजीवनी है।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह सरकारी योजना "अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट" की एक समीक्षात्मक रिपोट है। यह अरावली क्षेत्र के पर्यावरण और सरकारी नीतियों की समीक्षा से संबंधित है। इसमें दिए गए विचार लेखक के अपने हैं। इनसे किसी अन्य का सहमत होना आवश्यक नहीं है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक उत्तरदायी नहीं हैं।