समीक्षा

युद्ध की असली कीमत? जीत का जश्न या जिंदगियों का मातम -अजय त्यागी 

द्वितीय विश्व युद्ध को दुनिया ने जीत और हार के तराजू पर तौला, मगर सवाल यह है कि इस विजय के नीचे कितनी जिंदगियां दफन हुईं और किसने युद्ध की असली कीमत चुकाई।

By अजय त्यागी 1 min read
Twitter Facebook WhatsApp

प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India (AI)

1 सितंबर यानी आज का दिन विश्व के इतिहास में उस भयावह अध्याय की याद दिलाता है जब इंसान ने अपनी ताकत दिखाने के जुनून में पूरी दुनिया को बारूद के ढेर पर बैठा दिया था। इसी दिन 1939 में पोलैंड पर जर्मन हमले के साथ द्वितीय विश्व युद्ध का आगाज हुआ था। करीब 6 साल तक चले इस महायुद्ध ने करोड़ों जिंदगियों को निगल लिया। इतिहास इसे सैन्य जीत और हार के आंकड़ों में दर्ज करता है, लेकिन युद्ध की असली कीमत उन परिवारों ने चुकाई जिनके घरों से लौटने वाले कभी लौटकर नहीं आए।

मौत का हिसाब

अब जरा आंकड़ों की भाषा में बात करते हैं। National WWII Museum के एक विस्तृत आकलन के मुताबिक द्वितीय विश्व युद्ध में करीब 60 million यानी 6 करोड़ लोगों की मौत हुई। इनमें करीब 15 million यानी 1.5 करोड़ battle deaths और करीब 45 million यानी 4.5 करोड़ civilian deaths शामिल थे। यानी युद्ध का बड़ा हिस्सा, युद्ध की असली कीमत उन्होंने चुकाई जो युद्ध लड़ भी नहीं रहे थे। कितनी अजीब व्यवस्था थी। बंदूक किसी और के हाथ में थी और मौत का बिल आम नागरिकों के घर भेज दिया गया। 

और यह 6 करोड़ भी कोई अंतिम पत्थर पर खुदा हुआ आंकड़ा नहीं है। अलग अलग देशों के रिकॉर्ड, नागरिक मौतों के अनुमान और युद्ध से जुड़ी अकाल तथा बीमारी जैसी परिस्थितियों को गिनने के तरीके अलग होने के कारण कुल संख्या के आकलन में बड़ा अंतर मिलता है। यानी इंसान ने करोड़ों लोगों को मार दिया, फिर उनकी मौत गिनने में भी पूरी तरह सहमति नहीं बना पाया। इतिहास का इससे ज्यादा कड़वा व्यंग्य शायद मुश्किल है। मौतें इतनी थीं कि आंकड़े भी उनके बोझ तले लड़खड़ा गए।

नरसंहार का चेहरा

इन करोड़ों मौतों के बीच होलोकॉस्ट मानवता के सबसे भयावह अपराधों में दर्ज है। Nazi Germany और उसके सहयोगियों तथा सहयोगियों ने 60 लाख यहूदियों की व्यवस्थित हत्या की। यह कोई युद्ध में हुई सामान्य जनहानि नहीं थी। यह नस्लीय घृणा पर आधारित राज्य संचालित नरसंहार था। यानी सत्ता ने पहले इंसानों को उनकी पहचान में बांटा, फिर उनकी इंसानियत छीन ली और आखिर में उनकी जिंदगी। करीब 60 लाख यहूदी इस नफरत की मशीन के शिकार बने। 

और जीत पाने का जूनून देखिए! जिस दौर में दुनिया आधुनिक विज्ञान, उद्योग और प्रशासन की उपलब्धियों पर गर्व कर रही थी उसी दौर में एक सरकार ने इन्हीं व्यवस्थाओं का इस्तेमाल लोगों को पकड़ने, छांटने, निर्वासित करने और मारने के लिए किया। Auschwitz जैसे हत्या केंद्रों में करीब 10 लाख यहूदी मारे गए। इतिहास हमें यह बताता है कि तकनीक अपने आप सभ्य नहीं होती। उसके हाथ में सत्ता और नफरत आ जाए तो वही तकनीक इंसान को बचाने के बजाय इंसान को मिटाने का औजार बन सकती है। 

विजय का तमाशा

फिर मित्र राष्ट्रों की जीत का दौर आया। D Day, यूरोप की मुक्ति और आखिरकार Nazi Germany की हार ने दुनिया को राहत दी। नाजी तानाशाही की हार निश्चित रूप से मानवता के पक्ष में जरूरी जीत थी। लेकिन सवाल यह है कि विजय की तस्वीर में कितने चेहरे दिखाई दिए। सैनिकों के हाथ में झंडा था, नेताओं के चेहरों पर संतोष था और शहरों में जश्न था। मगर जिन 4.5 करोड़ नागरिक मौतों का अनुमान दर्ज है उनके लिए विजय का मतलब अक्सर घर का दरवाजा खुला रह जाना और लौटने वाले का इंतजार करते रह जाना था। क्या यही है युद्ध की असली कीमत? 

1945 में जर्मनी की हार के बाद भी दुनिया ने विनाश का आखिरी अध्याय नहीं लिखा था। हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए गए। हिरोशिमा शहर के आधिकारिक आकलन के अनुसार दिसंबर 1945 के अंत तक करीब 140000 लोग मारे जा चुके थे। सटीक संख्या आज भी ज्ञात नहीं है। नागासाकी में भी भारी जनहानि हुई और विकिरण के प्रभाव लंबे समय तक लोगों को झेलने पड़े। विज्ञान ने उस दिन मानव क्षमता का चरम दिखाया और इंसान ने उसी क्षमता से यह भी साबित किया कि वह एक शहर को पलक झपकते राख में बदल सकता है। 

शांति का सबक

युद्ध खत्म हुआ तो दुनिया को शांति की याद आई। 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र अस्तित्व में आया। उद्देश्य था अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को मजबूत करना। यह अच्छी बात थी। मगर इतिहास का व्यंग्य यहां भी पीछा नहीं छोड़ता। पहले दुनिया के करीब 6 करोड़ मौतों से युद्ध की असली कीमत चुकाई, फिर बैठकर तय किया कि आगे बातचीत से विवाद सुलझाए जाएंगे। यानी मानवता ने आग में हाथ जलने के बाद यह महान खोज की कि आग से हाथ जलता है। काश यह ज्ञान कुछ करोड़ जिंदगियां बचने से पहले आ गया होता।

लेकिन हथियारों को विदाई नहीं मिली। अमेरिका और सोवियत संघ के बीच तनाव ने शीत युद्ध को जन्म दिया। दुनिया फिर शक्ति के खेमों में बंट गई और परमाणु हथियारों की होड़ शुरू हुई। युद्ध समाप्त हो गया था, मगर युद्ध की मानसिकता ने इस्तीफा नहीं दिया था। बंदूकें कुछ समय शांत हुईं तो मिसाइलें तैयार होने लगीं। सुरक्षा के नाम पर विनाश की क्षमता बढ़ाई गई। इंसान ने पिछली तबाही से शायद यही सीखा कि अगली तबाही के लिए उससे ज्यादा शक्तिशाली हथियार पहले से तैयार रखे जाएं।

आज का आईना

आज भी जब किसी युद्ध में जीत की घोषणा होती है तो टीवी स्क्रीन पर विजय के झंडे दिखाई देते हैं। नेता भाषण देते हैं। सैनिकों की बहादुरी गिनाई जाती है। लेकिन कैमरा उस परिवार पर कम जाता है जिसके घर में ताबूत पहुंचता है। नागरिक मौतों के लिए नुकसान शब्द इस्तेमाल करना भी कमाल का राजनीतिक आविष्कार है। नुकसान यानी जैसे कोई कार टूट गई हो। कोई इमारत गिर गई हो। असल में वहां किसी की मां मरती है, किसी का बेटा मरता है, किसी की बेटी मरती है और किसी का पूरा भविष्य मर जाता है। यही युद्ध की असली कीमत है।

इसलिए इतिहास का सबसे जरूरी सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन जीता। सवाल यह होना चाहिए कि जीतने के बाद इंसानियत के पास बचा क्या। द्वितीय विश्व युद्ध ने नाजी तानाशाही को हराया और दुनिया को नई वैश्विक व्यवस्था दी, लेकिन करीब 6 करोड़ मौतों के आंकड़े में हर संख्या के पीछे एक इंसान था। 60 लाख यहूदी होलोकॉस्ट में मारे गए और करोड़ों नागरिक युद्ध की आग में झुलसे। युद्ध में जीत का बिगुल बजाने वाले शायद भूल जाते हैं कि उस बिगुल की आवाज के नीचे कितनी चीखें दफन होती हैं। युद्ध की असली कीमत किसी विजय पदक पर नहीं लिखी जाती। वह उन खाली कुर्सियों में लिखी होती है जिन पर बैठने वाला कभी लौटकर नहीं आया।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह विश्लेषण विश्वस्त ऐतिहासिक स्रोतों और उपलब्ध तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। द्वितीय विश्व युद्ध में जनहानि के आंकड़ों के अलग अलग ऐतिहासिक आकलन उपलब्ध हैं और 6 करोड़ का आंकड़ा National WWII Museum के विस्तृत अनुमान पर आधारित है। होलोकॉस्ट में 60 लाख यहूदियों की हत्या का आंकड़ा United States Holocaust Memorial Museum के स्थापित ऐतिहासिक आकलन पर आधारित है। परमाणु हमलों में मृतकों की सटीक संख्या को लेकर भी ऐतिहासिक स्रोतों में अनुमान का अंतर है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।

#WorldWarII #SecondWorldWar #WWIIHistory #WarAndPeace #Holocaust #Hiroshima #Nagasaki #NeverAgain #Peace
Read Full Article on RexTV India