AI से न्याय में मदद ली जा सकती है, लेकिन अदालतों में अंतिम फैसला मशीन नहीं कर सकती। न्यायिक निर्णय की जिम्मेदारी इंसान के पास ही रहेगी।
प्रतीकात्मक फोटो
नई दिल्ली, दिल्ली। AI से न्याय में मदद लेने को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख साफ है कि तकनीक अदालतों के काम को आसान कर सकती है, लेकिन न्यायिक फैसला लेने की जगह नहीं ले सकती। हालिया न्यायिक चर्चा में यह बात सामने आई कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बड़े पैमाने पर कानूनी और न्यायिक डेटा का विश्लेषण करने, जानकारी खोजने और दूसरे सहायक कामों में उपयोगी हो सकती है। लेकिन किसी व्यक्तिगत मामले का फैसला, गवाह की विश्वसनीयता, जमानत या आरोपी के भविष्य के व्यवहार जैसे संवेदनशील मुद्दों पर अंतिम निर्णय इंसानी न्यायिक विवेक से ही होना चाहिए। [1]
AI से न्याय में मदद लेने का सबसे बड़ा फायदा उन कामों में हो सकता है जिनमें बड़ी मात्रा में दस्तावेज और कानूनी जानकारी खंगालनी पड़ती है। कानूनी शोध, दस्तावेजों का सार तैयार करना, अनुवाद, ट्रांसक्रिप्शन और केस प्रबंधन जैसे कामों में तकनीक समय बचा सकती है। भारत की न्यायपालिका पहले से ही कुछ तकनीकी साधनों का इस्तेमाल कर रही है। ऐसे उपकरणों का मकसद जजों की जगह मशीन बैठाना नहीं बल्कि उन्हें जरूरी जानकारी जल्दी उपलब्ध कराना है। इससे न्यायिक अधिकारियों को जटिल कानूनी सवालों पर ज्यादा समय देने में मदद मिल सकती है।
अदालतों में AI के इस्तेमाल के साथ एक स्पष्ट सीमा भी जरूरी मानी जा रही है। मशीन किसी मामले से जुड़े तथ्यों और पुराने फैसलों को व्यवस्थित कर सकती है लेकिन वह मानवीय परिस्थितियों और न्यायिक विवेक को पूरी तरह नहीं समझ सकती। गवाह की विश्वसनीयता का आकलन, जमानत देने का फैसला या किसी व्यक्ति के दोबारा अपराध करने की संभावना जैसे मामलों में संदर्भ और मानवीय सोच बेहद अहम होते हैं। इसलिए AI से न्याय में मदद को सहायक भूमिका तक रखना जरूरी माना जा रहा है ताकि तकनीकी सुविधा के बावजूद न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही बनी रहे।
न्यायिक प्रक्रिया में AI के बढ़ते इस्तेमाल के बीच जवाबदेही का सवाल भी महत्वपूर्ण है। अगर किसी मशीन के सुझाव से गलत निष्कर्ष निकलता है तो जिम्मेदारी किसकी होगी, यह सवाल अदालतों में तकनीक के इस्तेमाल के साथ और गंभीर हो जाता है। AI सिस्टम गलत या भ्रामक जानकारी भी दे सकते हैं। इसलिए मशीन से मिली जानकारी को बिना जांचे स्वीकार करना जोखिम पैदा कर सकता है। न्यायिक अधिकारियों को AI के परिणामों की स्वतंत्र रूप से जांच करनी होगी और अंतिम निर्णय अपने कानूनी विवेक से लेना होगा। इस व्यवस्था में तकनीक मददगार रहेगी लेकिन निर्णायक भूमिका इंसान की ही होगी।
भारत में न्याय व्यवस्था को डिजिटल बनाने की कोशिश पहले से चल रही है और AI इस बदलाव का अगला महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। कानूनी शोध और अनुवाद से लेकर प्रशासनिक कामों तक तकनीक का इस्तेमाल अदालतों का बोझ घटाने में मदद कर सकता है। लेकिन AI से न्याय में मदद का मतलब यह नहीं कि मशीनों को न्यायिक अधिकार सौंप दिए जाएं। न्याय का अंतिम फैसला संविधान, कानून, साक्ष्यों और मानवीय विवेक के आधार पर ही होना चाहिए। यही संतुलन तकनीक के फायदे उठाते हुए न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जनता के भरोसे को बनाए रखने के लिए जरूरी है।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार स्रोतों और उपलब्ध न्यायिक जानकारी पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। AI के न्यायिक इस्तेमाल से जुड़े नियम और दिशानिर्देश समय के साथ बदल सकते हैं तथा किसी न्यायिक मामले में अंतिम निर्णय संबंधित अदालत और अधिकृत न्यायिक अधिकारी ही लेते हैं। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।