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बरी के फैसलों पर पुनर्विचार: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की जिम्मेदारियों को पुनर्परिभाषित किया

बरी के फैसलों पर पुनर्विचार: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की जि

By अजय त्यागी
1 min read
advertisement13Aug2026%20copy.jpg सुप्रीम कोर्ट - Photo : Rex TV India

सुप्रीम कोर्ट - Photo : Rex TV India

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि आपराधिक मामलों में बरी किए गए अभियुक्तों के खिलाफ अपील की अनुमति देने के संदर्भ में हाईकोर्ट की भूमिका क्या होनी चाहिए। यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया में पीड़ितों के अधिकारों और न्याय के संतुलन को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

धारा 378(3) सीआरपीसी: अपील की अनुमति की आवश्यकता
दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 378(3) के अनुसार, राज्य सरकार को किसी अभियुक्त के बरी होने के आदेश के खिलाफ अपील करने से पहले हाईकोर्ट से अनुमति लेना आवश्यक है। यह प्रावधान न्यायिक प्रणाली में अनावश्यक अपीलों को रोकने और न्यायालयों पर भार कम करने के लिए बनाया गया है। हालांकि, इस अनुमति को देने या न देने में हाईकोर्ट को किस प्रकार के मानदंडों का पालन करना चाहिए, इस पर स्पष्टता की आवश्यकता थी।

मामले की पृष्ठभूमि: बॉम्बे हाईकोर्ट का निर्णय
इस संदर्भ में, बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक मामले में राज्य सरकार की अपील की अनुमति के आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा लिया गया बरी करने का निर्णय एक 'संभावित दृष्टिकोण' था, जिसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। हाईकोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट का निर्णय साक्ष्यों के आधार पर लिया गया एक संभावित निष्कर्ष था, इसलिए अपील की अनुमति देने का कोई आधार नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप: उच्च न्यायालय की भूमिका पर पुनर्विचार
इस निर्णय के खिलाफ, शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन शामिल थे, ने इस मामले की सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट का दृष्टिकोण त्रुटिपूर्ण था और उसे केवल यह नहीं देखना चाहिए था कि बरी करने का आदेश पलटा जाएगा या नहीं, बल्कि यह विचार करना चाहिए था कि क्या प्रथम दृष्टया मामला बनता है या तर्कपूर्ण मुद्दे उठाए गए हैं। 

न्यायिक दृष्टिकोण: प्रथम दृष्टया मामला और तर्कपूर्ण मुद्दे
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में महाराष्ट्र राज्य बनाम सुजय मंगेश पोयारेकर (2008) 9 एससीसी 475 मामले का संदर्भ दिया, जिसमें कहा गया था कि अपील की अनुमति देने के प्रश्न पर विचार करते समय, हाईकोर्ट को यह देखना चाहिए कि क्या प्रथम दृष्टया मामला बनता है या तर्कपूर्ण मुद्दे उठाए गए हैं, न कि यह कि बरी करने का आदेश रद्द किया जाएगा या नहीं। इस दृष्टिकोण से, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के निर्णय को अस्वीकार कर दिया और मामले को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया।

पीड़ितों के अधिकार: धारा 372 सीआरपीसी का संदर्भ
यहां यह उल्लेखनीय है कि सीआरपीसी की धारा 372 के तहत पीड़ितों को यह अधिकार दिया गया है कि वे आरोपी के बरी होने, कम सजा दिए जाने, या अपर्याप्त मुआवजा के आदेश के खिलाफ अपील कर सकते हैं। हालांकि, इस अधिकार का उपयोग करने के लिए हाईकोर्ट से अनुमति लेना आवश्यक है, जैसा कि धारा 378(3) में उल्लेखित है। सुप्रीम कोर्ट ने सत्यपाल सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में इस बात को स्पष्ट किया कि धारा 372 द्वारा पीड़ितों को दिया गया अपील का अधिकार और धारा 378(3) का प्रक्रियात्मक नियम एक साथ काम करते हैं। 

न्यायिक प्रक्रिया में संतुलन की आवश्यकता
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया में संतुलन बनाए रखने के महत्व को रेखांकित करता है। यह हाईकोर्टों को यह निर्देश देता है कि वे अपील की अनुमति के मामलों में सतर्कता से विचार करें और यह सुनिश्चित करें कि न्याय के हित में उचित निर्णय लिए जाएं। यह निर्णय पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा और न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

Editor-in-Chief