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निर्जन क्षेत्र में कोर्ट शिफ्टिंग का विरोध: वकीलों ने खोला मोर्चा

भीलवाड़ा के अधिवक्ता तस्वारिया में आवंटित नवीन न्यायालय परिसर की 62 बीघा दुर्गम भूमि को निरस्त कराने हेतु एकजुट होकर आंदोलन की राह पर निकल पड़े हैं।

By अजय त्यागी
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Advertisement002309202602.jpg advertisement13Aug2026%20copy.jpg रजिस्ट्रार जनरल, राजस्थान उच्च न्यायालय के नाम एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा

रजिस्ट्रार जनरल, राजस्थान उच्च न्यायालय के नाम एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा

भीलवाड़ा (पंकज पोरवाल)। राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में प्रस्तावित नवीन न्यायालय परिसर के लिए किए गए भूमि आवंटन ने एक बड़े विवाद का रूप ले लिया है। जिला प्रशासन द्वारा शहर से काफी दूर तस्वारिया ग्राम में आवंटित की गई भूमि के विरोध में अधिवक्ताओं ने एकजुट होकर “भीलवाड़ा जिला न्यायालय परिसर अधिवक्ता संघर्ष समिति” का गठन किया है। इस समिति के बैनर तले बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश के माध्यम से रजिस्ट्रार जनरल, राजस्थान उच्च न्यायालय के नाम एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा। अधिवक्ताओं का स्पष्ट मत है कि आवंटित भूमि न्याय व्यवस्था की मूल भावना और न्याय प्राप्त करने के लिए आने वाले आम नागरिकों के हितों के पूरी तरह प्रतिकूल है। इस एकजुटता ने प्रशासन के निर्णय के प्रति भारी रोष प्रकट किया है।

तस्वारिया ग्राम की चारागाह भूमि पर आवंटन का विरोध

संघर्ष समिति के संयोजक राकेश जैन ने भूमि आवंटन से जुड़ी तकनीकी और व्यवहारिक समस्याओं पर प्रकाश डालते हुए बताया कि हाल ही में तस्वारिया ग्राम स्थित चारागाह भूमि में से लगभग 62 बीघा भूमि नवीन न्यायालय परिसर हेतु आवंटित की गई है। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह प्रस्तावित स्थान भीलवाड़ा शहर के मुख्य केंद्र से लगभग 12 किलोमीटर दूर एक दुर्गम और निर्जन क्षेत्र में स्थित है। लगभग 650 से अधिक अधिवक्ताओं ने हस्ताक्षर कर इस आवंटन का कड़ा विरोध किया है। वकीलों का तर्क है कि इतनी दूर न्यायालय परिसर ले जाने से न केवल कानूनी प्रक्रिया जटिल होगी, बल्कि गरीब और ग्रामीण परिवेश से आने वाले वादकारियों के लिए न्याय तक पहुँच पाना असंभव सा हो जाएगा।

सुगम न्याय व्यवस्था बनाम निर्जन क्षेत्र में विस्थापन

बार काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व को-चेयरमैन सुरेश चंद्र श्रीमाली ने इस मुद्दे पर सरकार की दोहरी नीति की आलोचना की। उन्होंने कहा कि एक ओर सरकारें 'सुगम और सस्ते न्याय' की बात करती हैं, वहीं दूसरी ओर न्यायालय जैसे महत्वपूर्ण संस्थान को शहर की मुख्य आबादी से दूर किसी निर्जन क्षेत्र में स्थापित करने का निर्णय दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि जिला बार एसोसिएशन के सदस्यों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं को विश्वास में लिए बिना ही जिला प्रशासन द्वारा इस प्रकार का गोपनीय आवंटन कर दिया गया। अधिवक्ताओं का मानना है कि जिला न्यायालय शहर की आत्मा और पहचान है, जिसे इस तरह विस्थापित करना शहर की गरिमा के साथ भी खिलवाड़ है।

सुरक्षा चुनौतियां और बुनियादी सुविधाओं का अभाव

वरिष्ठ अधिवक्ता भेरूलाल बाफना और पूर्व अध्यक्षों—कृष्ण गोपाल शर्मा, विक्रम सिंह राठौड़ एवं ऋषि तिवारी—ने इस विस्थापन के सामाजिक और सुरक्षात्मक पहलुओं पर गंभीर सवाल उठाए हैं। आवंटित भूमि लगभग 3000 बीघा के विशाल चारागाह क्षेत्र के ठीक मध्य में स्थित है, जहाँ वर्तमान में आबादी, परिवहन, चिकित्सालय या पुलिस सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं शून्य हैं। अधिवक्ताओं ने विशेष रूप से महिला अधिवक्ताओं और महिला वादकारियों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई। शहर से इतनी दूर निर्जन स्थान पर शाम के समय या विषम परिस्थितियों में न्याय कार्य हेतु जाना किसी बड़े सुरक्षा जोखिम से कम नहीं होगा। साथ ही, चारागाह भूमि होने के कारण भविष्य में वहां निजी विकास या आबादी बसने की संभावना भी अत्यंत क्षीण है।

आमजन से अपील और आंदोलन का आह्वान

समिति के सह संयोजक अंशुल बंसल और प्रदीप व्यास ने भीलवाड़ा की जनता, सामाजिक संस्थाओं और व्यापार मंडलों से इस आंदोलन में समर्थन देने का विनम्र आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि प्रतिदिन हजारों नागरिक, जिनमें किसान, मजदूर, छात्र और ग्रामीण शामिल हैं, अपनी विधिक आवश्यकताओं जैसे नोटेरी, शपथ पत्र और अन्य न्यायिक कार्यों के लिए न्यायालय आते हैं। यदि यह परिसर शहर से 15 किलोमीटर दूर चला गया, तो न्याय पाना बहुत महंगा और थका देने वाला हो जाएगा। न्याय व्यवस्था की आत्मा 'सुलभता' में बसती है, जिसे प्रस्तावित स्थान पूरी तरह नष्ट कर देगा। ज्ञापन सौंपने के दौरान भगवती देवी शर्मा, दुर्गा चौधरी और रोशन सालवी सहित सैकड़ों अधिवक्ताओं ने हिस्सा लिया और अपनी मांगों को लेकर बुलंद आवाज की।

भविष्य की गंभीर चेतावनी और निष्कर्ष

पूर्व अध्यक्ष मोहम्मद फरजन, सुरेश चंद्र पालीवाल और गोपाल सोनी ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार यह मान रही है कि भवन निर्माण में 10 वर्ष का समय लगेगा, तो वर्तमान में इस भूमि का आवंटन करना ही गलत है। भविष्य की समस्याओं की अनदेखी कर लिया गया यह निर्णय आने वाली पीढ़ियों के लिए संकट पैदा करेगा। संघर्ष समिति ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि इस अनुचित भूमि आवंटन को तुरंत निरस्त नहीं किया गया, तो अधिवक्ता समुदाय अपने आंदोलन को और अधिक उग्र करेगा। इस ज्ञापन में रामनिवास गुप्ता, अजयपाल सनाढ्य, पुष्पा ऑर्डिया सहित जिले के शीर्ष अधिवक्ताओं की उपस्थिति यह दर्शाती है कि पूरा अधिवक्ता समाज इस मुद्दे पर आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार है।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

यह रिपोर्ट भीलवाड़ा जिला न्यायालय परिसर अधिवक्ता संघर्ष समिति द्वारा प्रस्तुत ज्ञापन और स्थानीय समाचार स्रोतों द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी पर आधारित है। भूमि आवंटन और विस्थापन संबंधी वैधानिक निर्णयों का अंतिम अधिकार न्यायालय और संबंधित सरकारी विभागों के पास सुरक्षित है। प्रस्तुत लेख का उद्देश्य जनहित और अधिवक्ताओं के दृष्टिकोण को स्पष्ट करना है। लेखक और प्रकाशक/संपादक इस जानकारी के आधार पर लिए गए किसी भी प्रशासनिक या विधिक निर्णय के परिणामों के लिए उत्तरदायी नहीं हैं।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

Editor-in-Chief