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हर घर नल से जल योजना फेल: कागजों पर दावों की पोल

गुजरात के साबरकांठा में हर घर नल से जल योजना के दावों के विपरीत चिखला गाँव के लोग भीषण गर्मी में पानी के लिए मीलों भटकने को मजबूर हैं।

By अजय त्यागी
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advertisement13Aug2026%20copy.jpg The reality of Har Ghar Nal Se Jal scheme in Gujarat's Chikhla village (ETV Bharat)

The reality of Har Ghar Nal Se Jal scheme in Gujarat's Chikhla village (ETV Bharat)

गुजरात सरकार के जल आपूर्ति और सीवरेज बोर्ड की आधिकारिक वेबसाइट पर केंद्र सरकार के जल जीवन मिशन के अंतर्गत वर्ष 2019 में शुरू की गई महत्वाकांक्षी 'हर घर नल से जल' योजना की सफलता के बड़े-बड़े दावे गर्व से प्रदर्शित किए जाते हैं। हर छोटे-बड़े चुनाव से ठीक पहले शासन-प्रशासन द्वारा पूरे राज्य के प्रत्येक सुदूर घर तक पीने का साफ पानी पहुँचाने का ढिंढोरा पूरी ताकत से पीटा जाता है। परंतु यदि इन भारी-भरकम और आकर्षक सरकारी नारों तथा विज्ञापनों के आवरण को हटाकर देखा जाए, तो अंदर की हकीकत बेहद कड़वी और चिंताजनक नजर आती है। इस योजना में व्याप्त कथित भ्रष्टाचार को लेकर जब देश की संसद में सवाल उठाए गए, तो केंद्रीय जल शक्ति राज्य मंत्री वी सोमन्ना ने बेहद संक्षिप्त जवाब देते हुए कहा था कि कुछ चुनिंदा मामलों की जांच स्थानीय राज्य पुलिस द्वारा की जा रही है। वास्तविक सच्चाई जानने के लिए जब प्रशासनिक फाइलों से बाहर निकलकर देखा जाता है, तो दावों की कलई पूरी तरह खुल जाती है।

चिखला गाँव का दर्द: करोड़ों के खर्च के बाद भी सूखे नल

साबरकांठा जिले के खेदब्रह्मा तालुका के अंतर्गत आने वाले बेहद सुदूर और दुर्गम चिखला गाँव की स्थिति आज सरकारी दावों को पूरी तरह मुंह चिढ़ा रही है। यहाँ के स्थानीय निवासी इस भीषण गर्मी में जब तापमान 43 डिग्री सेल्सियस को पार कर रहा है, तब पीने के पानी की तलाश में हर रोज पांच किलोमीटर से अधिक का लंबा और थका देने वाला सफर पैदल तय करते हैं। ग्रामीणों के अनुसार, वर्ष 2020-21 के दौरान इस क्षेत्र में पाइपलाइन बिछाने, नल के कनेक्शन देने और बड़ी पानी की टंकियां बनाने के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए गए थे। इस निर्माण को देखकर आदिवासियों और स्थानीय लोगों के मन में यह आस जगी थी कि अब उनके घरों तक पानी पहुँचेगा। परंतु आज पांच साल बीत जाने के बाद भी इन नलों से पानी की एक बूंद तक नहीं टपकी है। ग्रामीणों का स्पष्ट मानना है कि यह पूरी योजना केवल कुछ भ्रष्ट ठेकेदारों और अधिकारियों के लिए अवैध कमाई का जरिया बनकर रह गई है। इस प्रशासनिक विफलता को लेकर गाँव के एक निराश निवासी अमीभाई कटारिया ने व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि, “जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं है और तालुका से लेकर जिला और राज्य स्तर के अधिकारियों से अपील करने के बावजूद, उनके पास इस संकट का कोई समाधान नहीं है। यह योजना कुछ ठेकेदारों और अधिकारियों के लिए पैसा कमाने का जरिया बन गई है।”

पानी के संकट से ठप हुआ दैनिक जीवन और बढ़ा आक्रोश

गाँव के भीतर इस भीषण जल संकट का कोई ठोस समाधान न होने के कारण स्थानीय निवासियों में प्रशासनिक तंत्र के खिलाफ भारी आक्रोश और गहरी निराशा व्याप्त है। तालुका से लेकर राज्य स्तर तक के बड़े अधिकारियों ने केवल कागजी आश्वासन ही दिए हैं, जिससे स्थिति बद से बदतर होती चली गई है। जल संकट इस कदर विकराल रूप धारण कर चुका है कि गाँव के वयस्कों को अपनी दैनिक मजदूरी और कृषि कार्य छोड़कर पूरे दिन पानी की खोज में भटकना पड़ता है। चमचमाते और 'कुशल गुजरात' के बड़े दावों के बीच लोग बुनियादी सुविधाओं से पूरी तरह वंचित हैं। गाँव की महिलाओं, बुजुर्गों और छोटी बच्चियों को सिर पर जल पात्र रखकर लंबी दूरी तय करते देख एक अन्य ग्रामीण लक्ष्मण कटारिया ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि, “करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन हमें अभी तक उनसे एक बूंद पानी भी नहीं मिला है। यह योजना केवल कागज पर ही एक बड़ा वादा लगती है, क्योंकि हमें अभी तक इन नलों से पानी की एक बूंद भी टपकती नहीं दिखी है।”

महिलाओं पर बढ़ता बोझ और दम तोड़ते पारंपरिक जल स्रोत

घर के लिए पीने योग्य पानी का इंतजाम करने की यह सबसे कठिन और थका देने वाली जिम्मेदारी सीधे तौर पर परिवार की महिलाओं के कंधों पर आ गिरी है। उन्हें तड़के सुबह से ही घर का काम छोड़कर पानी के स्रोतों की खोज में निकलना पड़ता है। इस विकट स्थिति को रेखांकित करते हुए पिंकाबेन कटारिया नाम की महिला ने बेहद दुखी मन से कहा कि, “हर दिन, हम अपना काम छोड़ देते हैं और पानी की तलाश में भटकते हैं, एक बार स्रोत मिलने पर बोरवेल पर लंबी लाइनों में खड़े रहते हैं। यहाँ तक कि हमारे पालतू जानवरों को भी राशन के पानी से गुजारा करना पड़ता है।” इसके अलावा, गाँव की बुनियादी भौगोलिक स्थिति भी बेहद दयनीय है। सड़कें पूरी तरह से उबड़-खाबड़ और गड्ढों से भरी हैं, तथा रात के समय गलियों में स्ट्रीट लाइट की कोई व्यवस्था नहीं है। क्षेत्र का मुख्य खेदवा बांध और उससे जुड़ी नहरें पूरी तरह से सूख चुकी हैं, तथा छोटे तालाब और पोखर भी डरावने रूप से सूखे पड़े हैं। इस भयानक स्थिति और आने वाले दिनों की आशंकाओं को लेकर नितिन कटारिया ने अपनी चिंता जताते हुए कहा कि, “गाँव की सड़कें असमान और उबड़-खाबड़ हैं। स्ट्रीट लाइट भी नहीं हैं और खेदवा बांध और नहर सूखी पड़ी हैं। छोटे तालाब और पोखर भी लगभग सूखे हैं। हमारे पास अभी भी एक महीने से अधिक की गर्मी बची है।” इस पूरे मामले को लेकर जब प्रशासनिक अमले से संपर्क करने का प्रयास किया गया, तो उनकी तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई। अब देखना यह होगा कि क्या सोता हुआ प्रशासन जागता है या इन ग्रामीणों की किस्मत में यह प्यास ऐसे ही लिखी रहेगी।[1]

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

यह समाचार रिपोर्ट गुजरात के साबरकांठा जिले के चिखला गाँव में हर घर नल से जल योजना की जमीनी स्थिति, स्थानीय ग्रामीणों और पीड़ितों द्वारा मीडिया के समक्ष दिए गए आधिकारिक बयानों और विभिन्न क्षेत्रीय समाचार सोर्सेज द्वारा उपलब्ध कराए गए तथ्यों पर पूरी तरह आधारित है। इस विकासात्मक और ढांचागत योजना के विधिक, वित्तीय तथा प्रशासनिक पहलुओं से जुड़े किसी भी प्रकार के वैधानिक संदर्भ के लिए गुजरात जल आपूर्ति विभाग द्वारा जारी मूल दस्तावेजों को ही प्रामाणिक माना जाना चाहिए। इस लेख का मुख्य उद्देश्य केवल जनहित में ग्रामीण समस्याओं और क्षेत्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर की वर्तमान स्थिति की निष्पक्ष जानकारी प्रदान करना है। लेखक और प्रकाशक/संपादक इस रिपोर्ट के आधार पर होने वाले किसी भी व्यक्तिगत, सामाजिक या कानूनी निर्णय के परिणामों के लिए किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं हैं।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

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