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बोधगया में मिला विशाल बौद्ध विहार: सामने आए दुर्लभ पुरातात्विक साक्ष्य

बिहार के गया जिले के डब्बा गाँव में पुरातत्वविदों ने करीब 1200 वर्ष पुराने एक विशाल बौद्ध मठ और प्राचीन मानव बस्ती के अवशेष खोजे हैं।

By अजय त्यागी
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सामने आए दुर्लभ पुरातात्विक साक्ष्य

बिहार के ऐतिहासिक और धार्मिक जिले गया से एक अत्यंत विस्मयकारी और युगांतकारी पुरातात्विक सफलता की खबर सामने आई है। पुरातत्वविदों की एक विशेषज्ञ टीम ने बोधगया से लगभग 30 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम और राजधानी पटना से 140 किलोमीटर की दूरी पर स्थित डब्बा गाँव में लगभग 1200 वर्ष पुराने एक अत्यंत विशाल बौद्ध मठ के पुरातात्विक अवशेषों को खोज निकाला है। प्रारंभिक विधिक और वैज्ञानिक अवलोकनों से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि इस सुदूर स्थल पर ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के कालखंड से ही एक अत्यंत समृद्ध और विकसित मानव बस्ती फल-फूल रही थी। लगभग एक वर्ग किलोमीटर के विशाल दायरे में फैली इस प्राचीन साइट से खुदाई के दौरान भारी मात्रा में ऐतिहासिक प्राचीन कलाकृतियां, मृदभांड (मिट्टी के बर्तन), प्राचीन मूर्तियां और मन्नत स्तूप (वोटिव स्तूप) प्राप्त हुए हैं। विधिक विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में जैसे-जैसे इस विस्तृत क्षेत्र का और अधिक वैज्ञानिक उत्खनन और अन्वेषण किया जाएगा, इस ऐतिहासिक साइट का भौगोलिक दायरा और अधिक विस्तारित हो सकता है।

मगध विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ दल को मिली विधिक स्वीकृति

इस अत्यंत महत्वपूर्ण और गौरवशाली खोज को मगध विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय और एशियाई अध्ययन विभाग की एक समर्पित शोध टीम ने अंजाम दिया है। केंद्रीय पुरातत्व सलाहकार बोर्ड (काबा) से आधिकारिक उत्खनन लाइसेंस और आवश्यक विधिक अनुमति प्राप्त करने के बाद, इस टीम ने आगामी 9 मई से इस विशेष स्थान पर वैज्ञानिक पद्धति से खुदाई का कार्य विधिवत रूप से प्रारंभ किया था। उत्खनन के दौरान अब तक जमीन के भीतर दबी हुई ईंटों की विशाल संरचनाएं, दीवारों में बने छोटे आले (ताखे) वाले कक्ष या कमरे, और पत्थरों व ईंटों से निर्मित सुंदर मन्नत स्तूप मुख्य रूप से प्राप्त हुए हैं। इन प्राचीन कमरों के भीतर विधिक रूप से दो अलग-अलग प्रकार के फर्श भी पाए गए हैं, जिनमें से एक पूरी तरह सुरक्षित है जबकि दूसरा आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त है। ईंटों की मजबूत नींव पर बने इन फर्शों पर चूने के प्लास्टर (लाइम प्लास्टर) की एक बेहद चिकनी और चमकदार फिनिशिंग देखी जा सकती है, जो उस दौर की उत्कृष्ट निर्माण कला और वास्तुकला को बयां करती है।

भगवान बुद्ध और देवी तारा की दुर्लभ मूर्तियां बरामद

उत्खनन स्थल पर बने एक कक्ष की दीवार के आले में रखी हुई बौद्ध देवी-देवताओं की तीन प्राचीन पाषाण प्रतिमाएं अत्यंत सुरक्षित अवस्था में प्राप्त हुई हैं। काले बेसाल्ट पत्थर (ब्लैक बेसाल्ट स्टोन) से बेहद नक्काशीदार ढंग से तराशी गई इन ऐतिहासिक मूर्तियों में बौद्ध धर्म की प्रसिद्ध देवी माँ तारा की प्रतिमा और भगवान बुद्ध की विख्यात 'भूमिस्पर्श मुद्रा' (धरती को छूती हुई मुद्रा) वाली अलौकिक प्रतिमा विशेष रूप से शामिल है। इसके अलावा, प्राचीन बोतलों या बर्तनों को बंद करने के लिए उपयोग में लाया जाने वाला कमल की कली के आकार का एक बेहद खूबसूरत टेराकोटा 'स्टॉपर' और मिट्टी के अनगिनत प्राचीन मनके (बीड्स) भी इस साइट से बरामद किए गए हैं। इस बेहद महत्वपूर्ण खुदाई कार्य की शुरुआत से पहले, उत्खनन निदेशक और मगध विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर शंकर शर्मा के कुशल नेतृत्व में एक महीने तक व्यापक सतह अन्वेषण (सरफेस एक्सप्लोरेशन) का विधिक कार्य चलाया गया था।

प्राचीन नालंदा महाविहार जैसी संरचनाओं से समानता

इस ऐतिहासिक खोज की तकनीकी विशेषताओं और बनावट पर प्रकाश डालते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) में एक लंबा और समृद्ध विधिक अनुभव रख चुके उत्खनन निदेशक प्रोफेसर शंकर शर्मा ने मीडिया के समक्ष अपने आधिकारिक बयान में कहा कि, “ये सेल या छोटे कमरे अब तक खोजे गए अन्य प्राचीन मठों से मिलते-जुलते हैं, जिनमें नालंदा महाविहार (प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय) भी शामिल है। ऐसा प्रतीत होता है कि वहां रहने वाले भिक्षु या विद्वान उनका उपयोग ध्यान और आराम के लिए करते थे। चूने के प्लास्टर का फर्श एक त्रुटिहीन फिनिश दिखाता है, जो निर्माण गतिविधियों में उत्कृष्टता का संकेत देता है।” इसके अलावा, इस पूरी साइट पर सबसे बड़ा आकर्षण एक 35 फीट ऊंचा विशाल मिट्टी का टीला है, जिसके गर्भ में ईंटों की एक विशालकाय और अद्भुत ऐतिहासिक संरचना पूरी तरह से दफन है। वर्तमान में इस टीले के एक बहुत छोटे से हिस्से को ही विधिक रूप से उजागर किया जा सका है, जिससे टेराकोटा ईंटों की एक भीमकाय दीवार साफ दिखाई दे रही है।

सदियों पुराना सांस्कृतिक अनुक्रम और भविष्य की योजनाएं

टीले के चारों ओर बिखरे हुए पत्थरों के विशाल स्तंभ इस बात का पुख्ता विधिक प्रमाण हैं कि प्राचीन काल में यहाँ एक बेहद भव्य और चमत्कारी वास्तुकला का निर्माण किया गया था। इस टीले की असीम संभावनाओं को लेकर प्रोफेसर शंकर शर्मा ने आगे कहा कि, “जैसा कि उजागर ईंट की दीवार से संकेत मिलता, यह विशेष टीला बहुत आशाजनक लगता है। हमें यकीन है कि इससे मठ या बौद्ध मंदिर से जुड़ी एक बड़ी संरचना की खोज होगी। हम मानसून के बाद इसका खुलासा करेंगे।” उत्खनन की गहरी खाइयों में दिखाई देने वाले सांस्कृतिक अनुक्रम (स्ट्रैटिफिकेशन) के आधार पर पांच अलग-अलग ऐतिहासिक परतें स्पष्ट रूप से देखी जा सकती हैं। सबसे निचली परत से ईसा पूर्व तीसरी और दूसरी शताब्दी के उत्तरी काले पॉलिश वाले मृदभांड (एनबीपीडब्ल्यू) और ब्लैक स्लिप्ड वेयर प्राप्त हो रहे हैं। मध्य परतें गुप्तोत्तर काल की हैं, जबकि सबसे ऊपरी दो परतें पाल राजवंश (8वीं से 12वीं शताब्दी ईस्वी) के वैभव को दर्शाती हैं।

बौद्ध धर्म की महायान शाखा का प्रमुख केंद्र होने का दावा

इस ऐतिहासिक खोज की धार्मिक और रणनीतिक महत्ता को साझा करते हुए, मगध विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय और एशियाई अध्ययन विभाग की अध्यक्षा और उत्खनन की सह-निदेशक प्रोफेसर अलका मिश्रा ने पूरी विधिक दृढ़ता के साथ कहा कि, “हमें डब्बा साइट के महत्व पर और शोध करने की आवश्यकता है। यह बौद्ध तीर्थयात्रा मार्ग और उत्तरापथ के करीब स्थित है, और बुद्ध या उनके किसी प्रसिद्ध शिष्य से महत्वपूर्ण रूप से जुड़ा हो सकता है।” उनके अनुसार, यह पूरा स्थल प्राचीन काल में बौद्ध धर्म की प्रसिद्ध 'महायान शाखा' का एक अत्यंत विशाल और वैश्विक केंद्र रहा होगा, जो मुख्य रूप से आत्मज्ञान और करुणामयी बोधिसत्व के महान आदर्शों के प्रचार-प्रसार के लिए जाना जाता था। विश्वविद्यालय के इस ऐतिहासिक अकादमिक कार्य की सराहना करते हुए मगध विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रोफेसर शशि प्रताप शाही ने इस पूरी खोज को राष्ट्र हित में एक युगांतकारी कदम बताया।

विश्वविद्यालय प्रशासन का पूर्ण सहयोग और वित्तीय सहायता

कुलपति प्रोफेसर शशि प्रताप शाही ने शोध टीम, संकाय सदस्यों और विद्यार्थियों को बधाई देते हुए अपने आधिकारिक विधिक संदेश में गर्व से कहा कि, “बौद्ध काल की संस्कृति और पुरातात्विक अवशेषों की खोज अद्भुत है। हमारे शिक्षकों और छात्रों ने राष्ट्रीय महत्व का ऐतिहासिक कार्य किया है। अब और बाद में खोजे जाने वाले निष्कर्ष बौद्ध धर्म पर नया प्रकाश डालेंगे।” कुलपति ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि डब्बा गाँव से प्राप्त ये बहुमूल्य निष्कर्ष पूरी वैश्विक पुरातत्व कला में एक नया भूचाल लाने की असीम विधिक क्षमता रखते हैं। उन्होंने इस शोध कार्य की निरंतरता को बनाए रखने के लिए विश्वविद्यालय की तरफ से 50巷 रुपये की प्रारंभिक वित्तीय सहायता और पूर्ण प्रशासनिक सहयोग स्वीकृत करने की भी घोषणा की। उन्होंने कहा कि यह उत्खनन विश्वविद्यालय की बढ़ती अकादमिक उत्कृष्टता और गुणवत्तापूर्ण ऐतिहासिक शोध के प्रति अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इस पूरी विधिक टीम में प्रोफेसर जनमेजय सिंह, आलोक रंजन, अनूप कुमार भारद्वाज, चंद्र प्रकाश और विजयकांत यादव जैसे प्रख्यात विद्वान तथा शोध छात्र पूरी निष्ठा से शामिल हैं।[1]

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

यह समाचार रिपोर्ट बिहार के गया जिले के डब्बा गाँव में मगध विश्वविद्यालय की विधिक टीम द्वारा किए जा रहे पुरातात्विक उत्खनन, विश्वविद्यालय के कुलपति व उत्खनन निदेशकों द्वारा मीडिया के समक्ष दिए गए आधिकारिक बयानों और विभिन्न राष्ट्रीय व क्षेत्रीय समाचार सोर्सेज द्वारा उपलब्ध कराए गए ऐतिहासिक व विधिक तथ्यों पर पूरी तरह आधारित है। इस प्राचीन साइट के विधिक कालक्रम, ऐतिहासिक पहचान और भविष्य के निष्कर्षों से जुड़े किसी भी प्रकार के वैधानिक संदर्भ के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और मगध विश्वविद्यालय द्वारा जारी मूल विधिक रिपोर्टों को ही अंतिम और प्रामाणिक माना जाना चाहिए। इस लेख का मुख्य उद्देश्य केवल जनहित में देश की प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर और पुरातात्विक विकास की निष्पक्ष जानकारी प्रदान करना है। लेखक और प्रकाशक/संपादक इस रिपोर्ट के आधार पर होने वाले किसी भी व्यक्तिगत, अकादमिक, सामाजिक या कानूनी निर्णय के परिणामों के लिए किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं हैं।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

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