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अजब - गजब

कडप्पा में बुजुर्ग ने पत्नी की कब्र के पास बनवाया खुद का मकबरा

आंध्र प्रदेश के कडप्पा में पी राममोहन राजू ने अपनी दिवंगत पत्नी के प्रति अटूट प्रेम दिखाते हुए उनकी कब्र के ठीक बगल में अपनी समाधि बनाई है।

By अजय त्यागी
1 min read
पत्नी की कब्र के पास बनवाया खुद का मकबरा

पत्नी की कब्र के पास बनवाया खुद का मकबरा

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सच्चे और शाश्वत प्रेम की मिसाल देने के लिए दुनिया आज भी शाहजहाँ द्वारा बनवाए गए ताजमहल को याद करती है, लेकिन आधुनिक दौर में एक पति ने अपनी पत्नी के प्रति अगाध प्रेम को दर्शाने के लिए एक बेहद अनोखा और भावुक कदम उठाया है। आंध्र प्रदेश के कडप्पा में एक श्मशान घाट के भीतर दो कब्रें बिल्कुल पास-पास बनी हुई हैं। इनमें से एक समाधि वरिष्ठ चिकित्सा शिक्षा अधिकारी राजलक्ष्मी की है, जिनकी कई वर्ष पहले कैंसर से मौत हो गई थी। वहीं दूसरी समाधि उनके पति पी. राममोहन राजू ने खुद बनवाई है, जो वर्तमान में पूरी तरह जीवित और स्वस्थ होने के बावजूद मृत्यु के बाद अपनी पत्नी के बगल में हमेशा के लिए सोने की इच्छा रखते हैं।

तीन दशकों का साथ

सेवानिवृत्त भविष्य निधि अधिकारी राममोहन राजू के लिए यह कदम केवल मृत्यु की तैयारी या किसी डर के बारे में नहीं है।

यह निर्णय अपनी उस जीवनसंगिनी के प्रति उनकी गहरी निष्ठा को दर्शाता है, कडप्पा में जिनके साथ उन्होंने अपने जीवन के बेहद खूबसूरत 30 से अधिक वर्ष बिताए थे। दोनों का विवाह वर्ष 1978 में हुआ था। उनके रिश्तेदारों और करीबियों के अनुसार, दोनों ने मिलकर एक बेहद स्नेहपूर्ण, सामंजस्यपूर्ण और सुखी पारिवारिक जीवन की नींव रखी थी। राममोहन राजू जहां वर्ष 2016 में भविष्य निधि (पीएफ) कार्यालय से सेवानिवृत्त हुए, वहीं राजलक्ष्मी आंध्र प्रदेश में चिकित्सा शिक्षा सहायक निदेशक के पद पर कार्यरत थीं।

बेटियों ने तोड़ी परंपरा

इस आदर्श दंपती ने अपनी चार बेटियों की परवरिश बहुत ही शानदार ढंग से की और उन्हें उच्च शिक्षित बनाकर समाज में एक बेहतरीन मुकाम हासिल कराया।

सभी बेटियां आज पेशेवर और व्यक्तिगत जीवन में पूरी तरह स्थापित हैं। लेकिन इस हंसते-खेलते परिवार की खुशियों को उस वक्त ग्रहण लग गया, जब राजलक्ष्मी को कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का पता चला। एक लंबी और दर्दनाक लड़ाई के बाद वर्ष 2011 में राजलक्ष्मी का निधन हो गया, जिसने राममोहन राजू को पूरी तरह तोड़ दिया। उस समय मसाबपेटा के हिंदू श्मशान घाट में अंतिम संस्कार के दौरान उनकी चारों बेटियों ने मां की अर्थी को कंधा देकर और मुखाग्नि देकर समाज की पुरानी रूढ़िवादी परंपरा को तोड़ दिया था।

कब्र के पास मांगी जगह

अपनी पत्नी की जुदाई के गम से राममोहन राजू कभी पूरी तरह उबर नहीं पाए और उन्होंने मन ही मन तय कर लिया कि वे मौत के बाद भी अपनी पत्नी से अलग नहीं होंगे।

कडप्पा में उन्होंने श्मशान घाट के प्रबंधन के पास जाकर एक बेहद अजीबोगरीब लेकिन भावुक विधिक अनुरोध किया। उन्होंने अपनी पत्नी की कब्र के ठीक बगल में अपने लिए भी एक छोटी सी जमीन आरक्षित करने की अनुमति मांगी। मामले की संवेदनशीलता और उनके सच्चे प्रेम को देखते हुए श्मशान समिति ने उन्हें सहर्ष अनुमति दे दी। इसके बाद उन्होंने खुद खड़े रहकर अपनी पत्नी की समाधि के ठीक बगल में अपने अंतिम विश्राम स्थल का निर्माण कार्य पूरा करवाया।

सदैव साथ रहने का संकल्प

आज यह बनकर तैयार ढांचा न केवल उनके अमर प्रेम का प्रतीक है, बल्कि राममोहन राजू को यह सुकून भी देता है कि वे अनंत काल तक अपनी पत्नी के साथ रहेंगे।

स्थानीय लोगों और ग्रामीणों को अपने इस फैसले के पीछे की वजह बताते हुए राममोहन राजू ने भावुक होकर कहा कि, “कडप्पा में हम दशकों तक एक साथ बेहद खुशी-खुशी रहे; उनके जाने के बाद मुझे गहराई से महसूस हुआ कि मुझे हमेशा के लिए उनके बगल में ही रहना चाहिए।” उन्होंने अपनी बेटियों के साथ भी मृत्यु और अपनी अंतिम इच्छाओं के बारे में पूरी तरह खुलकर बात की है और उन्हें इस कब्र में ही दफनाने के कड़े निर्देश दिए हैं।

अंतिम विदाई का जश्न

अंतिम संस्कारों में होने वाले अत्यधिक शोक को कम करने के लिए भी इस बुजुर्ग ने एक अनोखा और व्यावहारिक इंतजाम पहले से ही कर दिया है।

पारिवारिक सूत्रों के अनुसार, उन्होंने अपनी पेंशन की बचत से लगभग 4 लाख रुपये केवल अपने अंतिम संस्कार के खर्चों के लिए अलग रखे हैं और यह रकम अपनी बेटियों को अग्रिम सौंप दी है। इसके अलावा उन्होंने अपने दो बेहद करीबी दोस्तों को 50,000-50,000 रुपये एडवांस दिए हैं और उनसे अनुरोध किया है कि वे उनकी मृत्यु पर अत्यधिक विलाप करने के बजाय, उनके अंतिम सफर को एक शांतिपूर्ण विदाई और जीवन के जश्न के रूप में मनाएं।

मृत्यु एक शाश्वत सत्य

राममोहन राजू का मानना है कि मृत्यु जीवन का सबसे बड़ा और अनिवार्य सत्य है, जिससे किसी भी रूप में डरा नहीं जाना चाहिए।

उन्होंने अपने मित्रों और शुभचिंतकों से कहा कि, “मृत्यु हर किसी के लिए अपरिहार्य है; अंतहीन शोक मनाने के बजाय, मैं चाहता हूं कि मेरी अंतिम यात्रा को लोग शांति और सुकून के साथ याद रखें।” आंध्र प्रदेश के कडप्पा में रहने वाले स्थानीय नागरिक इस पूरी दास्तां को बेहद दुर्लभ और गहरा आध्यात्मिक प्रेम मान रहे हैं। लोगों का कहना है कि यह दंपती वास्तव में जीवन के साथ भी और जीवन के बाद भी एक-दूसरे के साथ रहने के लिए ही नियत था।[1]

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

यह मानवीय सरोकार की समाचार रिपोर्ट आंध्र प्रदेश के कडप्पा जिले से प्राप्त वास्तविक स्थानीय विवरणों, पारिवारिक साक्षात्कारों और संबंधित व्यक्ति के आधिकारिक बयानों पर आधारित है। इस रिपोर्ट का उद्देश्य मृत्यु से जुड़े किसी भी सामाजिक अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है, बल्कि एक पति के व्यक्तिगत प्रेम और उसकी अंतिम इच्छाओं को मानवीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत करना है। लेखक और प्रकाशक/संपादक इस जानकारी के आधार पर पाठकों द्वारा बनाए जाने वाले किसी भी व्यक्तिगत या विधिक दृष्टिकोण के परिणामों के लिए कानूनी रूप से उत्तरदायी नहीं हैं।

Thanks to all the readers for their 3+ Years of dedication and trust
Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

Editor-in-Chief
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