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प्रादेशिक

बेटी सौदेबाजी की वस्तु नहीं है, आटा साटा प्रथा पर हाईकोर्ट सख्त

बेटी सौदेबाजी की वस्तु नहीं है, इस महत्वपूर्ण टिप्पणी के साथ राजस्थान हाई कोर्ट ने आटा साटा कुप्रथा पर कड़ा प्रहार करते हुए तलाक की डिक्री मंजूर की है।

By अजय त्यागी
1 min read
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

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बेटी सौदेबाजी की वस्तु नहीं है और बेटियों को वैवाहिक सौदेबाजी के साधन के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, यह ऐतिहासिक और बेहद कड़ा रुख राजस्थान हाई कोर्ट ने अख्तियार किया है। प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में पैर पसार चुकी सदियों पुरानी आटा-साटा कुप्रथा पर तीखी और गंभीर टिप्पणी करते हुए हाई कोर्ट की जोधपुर पीठ ने स्पष्ट किया कि महिलाओं के अधिकारों और उनके मानवीय गौरव के साथ किसी भी परंपरा के नाम पर खिलवाड़ नहीं होने दिया जाएगा।[1]

बीकानेर का पारिवारिक विवाद

इस संवेदनशील मामले के कानूनी विवरण के अनुसार, राजस्थान के बीकानेर जिले की रहने वाली एक पीड़ित महिला ने बीकानेर के स्थानीय पारिवारिक न्यायालय (फैमिली कोर्ट) के एक पुराने फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

पारिवारिक न्यायालय ने महिला की तलाक की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि पत्नी ने पारिवारिक विवाद के बाद अपनी मर्जी से स्वेच्छा से अपना ससुराल छोड़ा है, इसलिए उसे तलाक का विधिक अधिकार नहीं दिया जा सकता।

दहेज प्रताड़ना का गंभीर आरोप

निचली अदालत के इस फैसले के खिलाफ पीड़ित महिला ने उच्च न्यायालय की शरण ली और न्याय की गुहार लगाई।

महिला ने अपनी अपील में आरोप लगाया था कि शादी के तुरंत बाद से ही ससुराल पक्ष के लोगों द्वारा उसे अतिरिक्त दहेज के लिए लगातार शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा था। इस प्रताड़ना से तंग आकर उसने ससुराल छोड़ा था और इस संबंध में स्थानीय थाने में एक नामजद प्राथमिकी (एफआईआर) भी दर्ज करवाई गई थी।

खंडपीठ के समक्ष हुई सुनवाई

हाई कोर्ट के प्रशासनिक निर्देशानुसार इस अपील पर न्यायमूर्ति अरुण मोंगा और न्यायमूर्ति सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने गहन सुनवाई की।

पीड़ित महिला के अधिवक्ता डी.के. गौड़ ने अदालत को तमाम साक्ष्यों से अवगत कराया। सुनवाई के दौरान पति के वकील ने दलील दी कि उनका वैवाहिक जीवन बिल्कुल सामान्य चल रहा था और उनकी शादी समाज की प्रचलित 'आटा साटा' प्रथा के अनुसार हुई थी, जिसके तहत उसकी बहन की शादी महिला के भाई से हुई थी। जिस पर उच्च अदालत ने टिप्पणी की कि 'बेटी सौदेबाजी की वस्तु नहीं है।' 

मुकलावा रस्म और उपजा विवाद

पति पक्ष ने अदालत को बताया कि विवाद की असली शुरुआत तब हुई जब मुकलावा (गौना) की रस्म का समय आया।

उस समय पति की बहन ने अपने ससुराल यानी महिला के भाई के घर जाने से साफ तौर पर इनकार कर दिया। इसके बाद दोनों परिवारों के बीच इस मुद्दे को लेकर भयंकर तनाव और दबाव की स्थिति पैदा हो गई। इसी विवाद के बीच पत्नी अपने मायके चली गई और पति के खिलाफ दहेज उत्पीड़न का आपराधिक मामला दर्ज करवा दिया।

कुप्रथा पर कोर्ट का प्रहार

दोनो पक्षों की दलीलें सुनने के बाद राजस्थान हाई कोर्ट की खंडपीठ ने बीकानेर फैमिली कोर्ट के 24 सितंबर 2025 के आदेश को पूरी तरह खारिज (सेट-असाइड) कर दिया।

जोधपुर हाई कोर्ट ने क्रूरता के आधार पर महिला के पक्ष में नई सिरे से तलाक की डिक्री जारी करने के आदेश दिए। कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि, “जिसे अक्सर एक सामाजिक परंपरा के रूप में चित्रित किया जाता है, वह वास्तव में मानव जीवन से जुड़ा हुआ एक वित्तीय सौदा मात्र है। बेटी सौदेबाजी की वस्तु नहीं है।”

स्वतंत्र सहमति का अभाव

अदालत ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि बचपन से सामाजिक दबाव और कंडीशनिंग के साए में पली-बढ़ी लड़कियों द्वारा वयस्क होने पर दी गई वैवाहिक सहमति को किसी भी सूरत में स्वतंत्र सहमति नहीं माना जा सकता।

खंडपीठ ने साफ किया कि, “कोई युवा लड़की इस तरह के पारस्परिक सौदे की कीमत नहीं हो सकती; और न ही कोई बेटी किसी दूसरे बेटे की शादी को बचाने के लिए दी जाने वाली कोई गारंटी या बंधक वस्तु है।”

बाल अधिकारों का खुला हनन

अदालत ने समाज को आईना दिखाते हुए कहा कि आटा-साटा जैसी रूढ़िवादी प्रथाएं सीधे तौर पर बाल अधिकारों और मानवीय गरिमा का खुला उल्लंघन करती हैं, जिन्हें आधुनिक सभ्य समाज में हर हाल में खारिज किया जाना चाहिए।

इस प्रकार, बेटी सौदेबाजी की वस्तु नहीं है, उच्च न्यायालय की इस गंभीर और दूरगामी टिप्पणी के बाद राजस्थान में महिलाओं को सामाजिक बेड़ियों से मुक्त कराने और उनके मानवाधिकारों की रक्षा करने की दिशा में एक नया कानूनी मील का पत्थर स्थापित हुआ है।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

यह वैवाहिक विवाद और उच्च न्यायालय के न्यायिक आदेश से जुड़ी समाचार रिपोर्ट अन्य समाचार स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इस सामाजिक कुप्रथा से जुड़े कानूनी पहलुओं और अंतिम तलाक की डिक्री का निष्पादन पूरी तरह से माननीय न्यायालय के स्थापित नियमों के अधीन है। लेखक और प्रकाशक/संपादक इस जानकारी के आधार पर पाठकों द्वारा बनाए जाने वाले किसी भी दृष्टिकोण के परिणामों के लिए कानूनी रूप से उत्तरदायी नहीं हैं।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

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