केदारनाथ यात्रा मार्ग पर मंडराया हिमस्खलन का संकट, वैज्ञानिक अलर्ट
केदारनाथ यात्रा मार्ग के लिंचोली क्षेत्र में सालाना हिमस्खलन का गंभीर खतरा मंडरा रहा है, जिससे हजारों तीर्थयात्रियों की सुरक्षा दांव पर है।
केदारनाथ धाम
उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित बाबा केदारनाथ धाम की प्रसिद्ध तीर्थयात्रा के मुख्य रास्तों को लेकर भू-वैज्ञानिकों ने एक बेहद चौंकाने वाला और चिंताजनक खुलासा किया है। केदारनाथ यात्रा मार्ग पर स्थित लिंचोली क्षेत्र को भू-वैज्ञानिक अध्ययन में हिमस्खलन (एवलांच) के लिहाज से अत्यधिक संवेदनशील और खतरनाक क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया गया है। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वरिष्ठ ग्लेशियोलॉजिस्ट (हिमनद वैज्ञानिक) डॉ. मनीष मेहता द्वारा किए गए एक ताजा वैज्ञानिक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि इस दुर्गम पैदल मार्ग पर प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम लगातार बढ़ता जा रहा है। उनके शोध के निष्कर्ष हाल ही में 'जियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया' के प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशित हुए हैं।[1]
अतीत के भीषण हादसे
हिमालयी क्षेत्रों में आए दिन होने वाली बर्फबारी और तापमान में आने वाले उतार-चढ़ाव की वजह से अतीत में कई दर्दनाक हादसे हो चुके हैं।
वैज्ञानिक रिपोर्ट में पुरानी घटनाओं का संदर्भ देते हुए बताया गया है कि 23 अप्रैल 2021 को आए एक भीषण हिमस्खलन ने सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) के एक अस्थायी शिविर को पूरी तरह तबाह कर दिया था, जिसमें 16 लोगों की जान चली गई थी, जबकि मुस्तैद सुरक्षा बलों ने 384 लोगों को सुरक्षित निकाल लिया था। इसके बाद उसी साल 2 अक्टूबर 2021 को माउंट त्रिशूल के पास आए एक अन्य हिमस्खलन में सात पर्वतारोहियों की असमय मौत हो गई थी।
केदारनाथ धाम सुरक्षित
वैज्ञानिकों के अनुसार इस अध्ययन में केदारनाथ धाम की मुख्य मंदिर संरचना को लेकर कुछ राहत भरी बातें भी कही गई हैं।
अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 2021 और 2024 के बीच केदारनाथ के उत्तर दिशा में लगातार कई बार हिमस्खलन दर्ज किए गए थे। हालांकि, इन घटनाओं से मुख्य मंदिर परिसर को कोई सीधा नुकसान या खतरा नहीं हुआ, क्योंकि ये सभी भूगर्भीय हलचलें मुख्य ग्लेशियर के संचय क्षेत्र (एकुमुलेशन जोन) के भीतर गहराई में घटित हुई थीं। लेकिन, इसके विपरीत जो श्रद्धालु मुख्य मंदिर की तरफ पैदल आगे बढ़ते हैं, उनके लिए यह पूरा सफर काफी जोखिम भरा हो गया है।
लिंचोली में सक्रिय एवलांच
इस वैज्ञानिक रिपोर्ट की मानें तो केदारनाथ यात्रा के मुख्य पड़ाव लिंचोली के पास एक अत्यधिक सक्रिय हिमस्खलन क्षेत्र मौजूद है।
यह खतरनाक क्षेत्र हर साल सर्दियों की शुरुआत से लेकर शुरुआती गर्मियों (अप्रैल से जून) तक पूरी तरह सक्रिय रहता है। यह समय वही होता है जब देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु चारधाम यात्रा के लिए उत्तराखंड पहुंचते हैं। सर्दियों में लिंचोली से करीब 500 मीटर ऊपर ऊपरी ढलानों पर भारी मात्रा में सूखी बर्फ जमा हो जाती है। इसके बाद गर्मियों में तापमान बढ़ने से यह बर्फ अस्थिर होकर पाउडर स्नो और गीले हिमस्खलन के रूप में नीचे गिरने लगती है।
जनहानि की बड़ी आशंका
भौगोलिक आंकड़ों के अनुसार, यह विनाशकारी हिमस्खलन लगभग 4,160 मीटर की ऊंचाई से शुरू होकर नीचे 3,250 मीटर के एलिवेशन तक आता है।
यह पूरा डेंजर ट्रैक करीब 1.5 किलोमीटर लंबा है और इसका प्रभाव लगभग 3,00,000 वर्ग मीटर के विशाल क्षेत्र पर पड़ता है। चारधाम यात्रा के दौरान मई और जून के महीनों में करीब 60 प्रतिशत श्रद्धालु बाबा के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। रामबाड़ा से केदारनाथ मंदिर के बीच के 6 किलोमीटर लंबे मार्ग पर हर एक मिनट में 100 से 200 तीर्थयात्री इस डेंजर जोन से होकर गुजरते हैं। ऐसे में अचानक हिमस्खलन होने पर यहाँ बड़े पैमाने पर जनहानि होने की आशंका बनी रहती है।
सुरक्षा हेतु अहम सुझाव
इस आसन्न संकट से निपटने और तीर्थयात्रियों के जीवन की रक्षा के लिए वैज्ञानिकों ने सरकार को कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं।
रिपोर्ट में स्पष्ट सिफारिश की गई है कि केदारनाथ यात्रा मार्ग के लिए प्रस्तावित नई रोपवे परियोजना के खंभों (टावर्स) का निर्माण मुख्य हिमस्खलन क्षेत्र से कम से कम 200 से 300 मीटर की सुरक्षित दूरी पर ही किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, मुख्य मार्ग के अवरुद्ध होने की स्थिति से निपटने के लिए एक वैकल्पिक पैदल मार्ग का विकास तुरंत किया जाना चाहिए। वैज्ञानिकों का मानना है कि वर्ष 2013 की आपदा के बाद नदी तल के पास बने पुराने रास्तों को दोबारा खोलने पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
जोखिम प्रबंधन जरूरी
ग्लेशियर क्षेत्र की अत्यधिक तीव्र ढलान के कारण इसके उद्गम स्थल (सोर्स जोन) पर किसी भी प्रकार का पक्का सुरक्षात्मक निर्माण करना पूरी तरह असंभव है।
ऐसी कठिन परिस्थिति में वैज्ञानिकों का सुझाव है कि केदारनाथ यात्रा मार्ग के मध्य और निचले हिस्सों में मजबूत चेक डैम और डायवर्जन स्ट्रक्चर (मोड़ने वाली दीवारें) बनाए जाने चाहिए। ये कंक्रीट के ढांचे ऊपर से तेजी से गिरने वाली बर्फ और मलबे की गति को धीमा कर देंगे और उसके बहाव को सुरक्षित दिशा में मोड़ देंगे। केदारनाथ यात्रा मार्ग पर आस्था, पर्यटन और उत्तराखंड की पूरी अर्थव्यवस्था टिकी हुई है, इसलिए इस धार्मिक क्षेत्र में मजबूत वैज्ञानिक जोखिम प्रबंधन को तत्काल लागू करना समय की सबसे बड़ी मांग है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
यह समाचार रिपोर्ट वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ Himalayan Geology के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध और Geological Society of India में प्रकाशित प्राथमिक वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है। केदारनाथ यात्रा मार्ग की भौगोलिक स्थितियां, मौसम और सुरक्षा दिशा-निर्देश समय-समय पर प्रशासनिक स्तर पर बदलते रहते हैं। तीर्थयात्रियों को यात्रा पर निकलने से पहले उत्तराखंड सरकार और आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा जारी आधिकारिक एडवाइजरी का पालन अवश्य करना चाहिए। लेखक और प्रकाशक/संपादक इस रिपोर्ट के आधार पर होने वाले किसी भी यात्रा निर्णय या प्राकृतिक घटना के परिणामों के लिए कानूनी रूप से उत्तरदायी नहीं हैं।