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शराब नीति केस: हाईकोर्ट में सीबीआई की याचिका पर टली सुनवाई

दिल्ली हाईकोर्ट ने शराब नीति केस में अरविंद केजरीवाल और अन्य की रिहाई के खिलाफ सीबीआई की याचिका पर सुनवाई 16 जुलाई के लिए तय की है।

By अजय त्यागी
1 min read
advertisement13Aug2026%20copy.jpg प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

दिल्ली हाईकोर्ट में शराब नीति केस से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। जस्टिस मनोज जैन की पीठ ने सोमवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए इसे 16 जुलाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया है। यह याचिका निचली अदालत के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई है, जिसमें आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक समेत कई आरोपियों को मामले से मुक्त करने का निर्णय सुनाया गया था।

सुनवाई के दौरान कोर्ट का ध्यान इस बात पर केंद्रित रहा कि मामले से जुड़े तीन आप नेताओं की ओर से वकालतनामा दाखिल किया गया है। गौरतलब है कि इससे पहले इन नेताओं ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच के समक्ष सुनवाई का बहिष्कार किया था। वकालतनामा एक ऐसा आधिकारिक पत्र होता है जिसके माध्यम से कोई अधिवक्ता किसी पक्ष की पैरवी करने के लिए कोर्ट में अधिकृत होता है।[1]

कानूनी प्रक्रिया और सुनवाई

जस्टिस मनोज जैन ने कहा, "अगर उन्होंने वकालतनामा दाखिल किया है, तो अगली तारीख पर हम देख सकते हैं कि कौन सी तारीख दी जा सकती है और एक कार्यक्रम तैयार किया जा सकता है।" वर्तमान में वकीलों के काम से दूर रहने के कारण कोर्ट ने उचित प्रक्रिया के तहत इसे 16 जुलाई तक के लिए स्थगित करना उचित समझा। सीबीआई का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आग्रह किया था कि सुनवाई का कार्यक्रम तय करने के लिए मामला बुधवार को सूचीबद्ध किया जाए।

हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि वह जीवन और स्वतंत्रता से जुड़े मामलों को प्राथमिकता दे रही है। इसके अतिरिक्त, बुधवार को ईद-उल-अजहा के अवसर पर हाईकोर्ट में अवकाश घोषित किया गया है, जिसके चलते सुनवाई को आगे बढ़ाना अनिवार्य हो गया था। शराब नीति केस से जुड़ा यह मामला जस्टिस मनोज जैन की बेंच के पास तब आया जब जस्टिस शर्मा ने आप नेताओं के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू करते हुए इसे अपनी बोर्ड से मुक्त कर दिया था।

निचली अदालत का फैसला

निचली अदालत ने 27 फरवरी को अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और 21 अन्य आरोपियों को शराब नीति केस में आरोप मुक्त कर दिया था। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि यह मामला न्यायिक जांच में पूरी तरह से विफल रहा है और इसे पूरी तरह से अविश्वसनीय माना जाना चाहिए। इस फैसले के बाद से ही केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई ने हाईकोर्ट का रुख किया और इस आदेश को चुनौती दी।

सीबीआई की अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियों को प्रथम दृष्टया त्रुटिपूर्ण बताया था। मार्च महीने में जस्टिस शर्मा की बेंच ने निचली अदालत की उस सिफारिश पर रोक लगा दी थी, जिसमें सीबीआई के जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने की बात कही गई थी। कोर्ट ने सभी 23 आरोपियों को नोटिस जारी कर इस पूरे मामले पर विचार करने की आवश्यकता जताई थी।

अवमानना और सत्याग्रह

मामले के दौरान आप नेताओं द्वारा जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के समक्ष खुद या वकील के माध्यम से पेश न होने का निर्णय लिया गया था। उन्होंने इस दौरान "महात्मा गांधी के सत्याग्रह मार्ग" का पालन करने की बात कही थी। हालांकि, 14 मई को जस्टिस शर्मा ने उन पर और अन्य नेताओं पर सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए अदालत की छवि खराब करने के आरोप में आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू की थी।

आरोप है कि इन सोशल मीडिया पोस्ट में न्यायाधीशों के खिलाफ भ्रामक और अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया गया था। इस घटनाक्रम के बाद से ही कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया था कि मामले को अब एक नई बेंच के पास भेजा जाएगा। शराब नीति केस की गंभीरता को देखते हुए अब सबकी नजरें आगामी 16 जुलाई की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां बहस का भविष्य तय किया जाएगा।

आगे की कानूनी राह

सीबीआई का मुख्य तर्क यह है कि निचली अदालत ने साक्ष्यों की अनदेखी करते हुए आरोपियों को रिहा किया है। दूसरी ओर, बचाव पक्ष का कहना है कि यह मामला पूरी तरह से राजनीतिक प्रेरित है और इसमें कोई ठोस सबूत मौजूद नहीं है। हाईकोर्ट अब इस पर विस्तृत विचार करेगा कि निचली अदालत का फैसला न्यायिक मानकों पर खरा उतरता है या नहीं। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला आने वाले महीनों में और अधिक पेचीदा हो सकता है।

अंत में, न्याय व्यवस्था के लिए यह एक महत्वपूर्ण परीक्षा है क्योंकि इसमें राजनीतिक हस्तियां और गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप शामिल हैं। कोर्ट का यह फैसला देश की जांच एजेंसियों और राजनीतिक पारदर्शिता के बीच संतुलन के लिए भी अहम होगा। हाईकोर्ट की पीठ यह सुनिश्चित करेगी कि कानून के दायरे में रहकर इस जटिल मामले का निष्पक्ष समाधान निकाला जा सके। न्याय की प्रक्रिया में देरी से बचने के लिए अगली तारीख पर सुनवाई का कार्यक्रम स्पष्ट होना अत्यंत आवश्यक है।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

इस रिपोर्ट में दी गई जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स और प्राप्त शुरुआती विवरणों पर आधारित है। लेखक, प्रकाशक एवं संपादक इस सामग्री के लिए किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं होंगे। यह रिपोर्ट केवल जनहित में सूचना साझा करने के लिए तैयार की गई है।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

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