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प्रादेशिक

वृद्धजन आश्रय स्थल में बदहाली और सिस्टम की लापरवाही से बुजुर्ग बेहाल

वृद्धजन आश्रय स्थल में बदहाली और सिस्टम की लापरवाही के कारण बुजुर्ग भूख और बीमारी से जूझ रहे हैं। सम्मानजनक बुढ़ापे के सरकारी दावों की खुली पोल।

By अजय त्यागी
1 min read
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

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वृद्धजन आश्रय स्थल में बदहाली और सिस्टम की लापरवाही ने उन दावों की कलई खोलकर रख दी है, जो कभी संवेदनशीलता और मानवता के नाम पर किए गए थे। बरियारपुर स्थित इस स्थल में अब बुजुर्गों को सुविधा नहीं, बल्कि रोटी और दवा के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। जिन हाथों ने कभी अपनों को सहारा दिया था, आज वे हाथ भूख और उपेक्षा की मार झेल रहे हैं। सिस्टम की इस उदासीनता ने बुजुर्गों की आंखों में उम्मीद की जगह केवल दर्द छोड़ दिया है।

करीब दो साल पहले जब इस वृद्धजन आश्रय स्थल में बदहाली और सिस्टम की लापरवाही के विपरीत, इसे एक आदर्श मॉडल के रूप में पेश किया गया था, तब अधिकारियों ने बड़े-बड़े दावे किए थे। उस समय ग्यारह कमरे, आधुनिक आरओ सिस्टम और वॉशिंग मशीन जैसी सुविधाओं के साथ इसे बुजुर्गों के लिए एक स्वर्ग जैसा बताया गया था। अधिकारियों के भोजन करने और फोटो खिंचवाने का दौर तब काफी चर्चा में रहा था, लेकिन वह प्रचार अब केवल फाइलों और सोशल मीडिया तक ही सीमित होकर रह गया है।[1]

व्यवस्था ठप और संवेदनहीनता

वर्तमान स्थिति यह है कि पिछले दो महीनों से इस स्थल में भोजन और दवा की सरकारी व्यवस्था पूरी तरह से बंद हो चुकी है। जिन बुजुर्गों को परिवार से तिरस्कार मिला था, उन्हें अब सरकारी सिस्टम ने भी उनके हाल पर छोड़ दिया है। देखभाल के नाम पर अब यहां सिर्फ सन्नाटा और बदहाली है। वृद्ध अपनी तकलीफों को बयां करने के लिए भी किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं पाते जो उनकी बात को प्रशासनिक कानों तक पहुंचा सके।

प्रशासन का कहना है कि बुजुर्गों को अब बेतिया के नए आश्रय में शिफ्ट किया जाएगा। हालांकि, यहां रह रहे वृद्ध वहां जाने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि मोतिहारी ही उनका घर है और यहीं उन्हें अपनापन मिला था। शिफ्टिंग की यह जिद और स्थानीय स्तर पर सुविधाओं को बहाल न करना, वृद्धजन आश्रय स्थल में बदहाली और सिस्टम की लापरवाही का एक और बड़ा उदाहरण है।

सिस्टम पर गंभीर सवाल

सामाजिक संगठनों ने इस पूरे घटनाक्रम को प्रशासन की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा बताया है। उनका तर्क है कि योजनाएं सिर्फ कागजी विज्ञापनों और उद्घाटन के फीते काटने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जैसे ही शुरुआती प्रचार का शोर थमता है, बुजुर्गों की समस्याएं वैसे ही नजरअंदाज कर दी जाती हैं। यह स्थिति उस हर व्यक्ति के लिए शर्मनाक है, जो सत्ता और प्रशासन के गलियारों में बैठकर मानवता के बड़े-बड़े दावे करता है।

"क्या यही है सम्मानजनक बुढ़ापा? जिन बुजुर्गों ने अपनी पूरी जिंदगी समाज के लिए समर्पित कर दी, उनका बुढ़ापा अब भूख और उपेक्षा के सहारे रह गया है।" - सामाजिक कार्यकर्ता।

मोतिहारी का यह केंद्र अब मात्र एक सरकारी इमारत नहीं, बल्कि इंसानियत की परीक्षा बन चुका है। प्रशासन को यह समझना होगा कि बुजुर्गों का जीवन किसी फाइल का हिस्सा नहीं है। यदि समय रहते इन सुविधाओं को बहाल नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ी को यह हमेशा याद रहेगा कि किस तरह वृद्धजन आश्रय स्थल में बदहाली और सिस्टम की लापरवाही ने एक समाज के रूप में हमारी नैतिकता को तार-तार कर दिया।

इंसानियत की परीक्षा का दौर

अंततः, सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या सरकारी मशीनरी को बुजुर्गों की गरिमा का ख्याल है? जब भी वृद्धजन आश्रय स्थल में बदहाली और सिस्टम की लापरवाही का मुद्दा उठता है, तो अधिकारी सिर्फ स्थानांतरण का बहाना ढूंढते हैं। समाधान वास्तव में उन बुजुर्गों को सुविधाएं देने में है, जिन्हें समाज ने पहले ही ठुकरा दिया है। सरकार को अपनी नीतियों को केवल प्रचार तक सीमित न रखकर धरातल पर क्रियान्वित करने की आवश्यकता है, ताकि बुढ़ापा सिर्फ एक संघर्ष न बनकर रह जाए।

अस्वीकरण

यह रिपोर्ट उपलब्ध स्थानीय सूत्रों और सार्वजनिक परिस्थितियों पर आधारित एक सूचनात्मक लेख है। लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था या सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर आधिकारिक विभागीय जांच और नियमों को ही अंतिम मानते हैं।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

Editor-in-Chief
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