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हीटवेव से मौतों का खतरा: शोध में हुआ बड़ा और डरावना खुलासा

हीटवेव से मौतों का खतरा भारत में लगातार बढ़ रहा है। एक नए शोध के अनुसार, भीषण गर्मी के पांच दिनों में 30 हजार से ज्यादा मौतें संभव हैं।

By अजय त्यागी
1 min read
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

(दिल्ली)। हीटवेव से मौतों का खतरा भारत में अब एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुका है, जिसकी पुष्टि हाल ही में एक नए शोध में हुई है। यूसी बर्कले के इंडिया एनर्जी एंड क्लाइमेट सेंटर के शोधकर्ताओं पीयूष नारंग और अशोक गाडगिल द्वारा किए गए इस अध्ययन के अनुसार, देश में अत्यधिक गर्मी के एक दिन में लगभग 3,400 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। यदि यह लू पांच दिनों तक जारी रहती है, तो मरने वालों का आंकड़ा 30,000 के करीब पहुंच सकता है।

शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में 'अतिरिक्त मौत' (Excess deaths) के मानक का उपयोग किया है, जो किसी विशिष्ट अवधि के दौरान कुल मौतों और ऐतिहासिक डेटा के आधार पर अपेक्षित मौतों के बीच का अंतर है। यह अध्ययन फ्रंटियर्स इन एनवायर्नमेंटल हेल्थ जर्नल में प्रकाशित हुआ है, जिसमें 2024 के जनसंख्या अनुमान और जिला-स्तरीय मृत्यु दर के आंकड़ों को एकीकृत किया गया है।[1]

उत्तर भारत में संकट

पिछले कुछ दिनों से मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया है, जिससे वहां भीषण लू जैसी स्थिति बनी हुई है। शोधकर्ताओं का कहना है कि हीटवेव से मौतों का खतरा केवल एक सामान्य मौसमी समस्या नहीं है, बल्कि यह देश के संरचनात्मक ढांचे पर सीधा प्रहार है। अकेले उत्तर प्रदेश में पांच दिनों की लू के दौरान लगभग 8,100 अतिरिक्त मौतें होने का अनुमान लगाया गया है।

इस अध्ययन के निष्कर्षों पर शोधकर्ताओं ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा:

"हमारा अनुमान है कि अत्यधिक गर्मी का एक दिन राष्ट्रीय स्तर पर लगभग 3,400 अतिरिक्त मौतें पैदा करता है; पांच दिन की हीटवेव लगभग 30,000 मौतों का कारण बनती है।"

आर्थिक असमानता और मौतें

अध्ययन में एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि मृत्यु दर के बोझ और आर्थिक क्षमता के बीच 2.3 गुना का अनुपात है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्य, जो देश की कुल अतिरिक्त मौतों में 66 प्रतिशत का योगदान देते हैं, देश की जीडीपी में केवल 29 प्रतिशत ही योगदान दे पाते हैं। यह स्पष्ट करता है कि हीटवेव से मौतों का खतरा उन राज्यों में सबसे ज्यादा है, जिनके पास गर्मी से निपटने के लिए वित्तीय संसाधन सबसे कम हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार, संघीय निवेश को अब जनसंख्या के बजाय उन राज्यों को प्राथमिकता देनी चाहिए जहां मौतों का बोझ अधिक है और जीडीपी कम है। हीटवेव से मौतों का खतरा अब प्रशासनिक क्षमता की तुलना में संरचनात्मक आर्थिक कमजोरी से जुड़ गया है। जिन 100 शीर्ष जिलों को शोध में शामिल किया गया है, वे भारत की एक-तिहाई जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं और पांच दिनों की हीटवेव की कुल मौतों का 44 प्रतिशत इन्हीं में होता है।

नीतिगत बदलाव की आवश्यकता

भारत में लू के कारण बढ़ती मृत्यु दर को देखते हुए तत्काल हीट रेजिलिएंस आर्किटेक्चर को फिर से डिजाइन करने की आवश्यकता है। यह केवल आपदा प्रबंधन का हिस्सा नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना के साथ जोड़कर प्रभावी ढंग से लागू करना होगा। हीटवेव से मौतों का खतरा दक्षिण एशिया में विशेष रूप से भारत के लिए अधिक है, क्योंकि यहां की भौगोलिक स्थिति और आर्थिक परिस्थितियां इसे अत्यधिक संवेदनशील बनाती हैं।

अंततः, यह अध्ययन नीति निर्माताओं के लिए एक चेतावनी है कि हीट-रेजिलिएंस में निवेश अब और टाला नहीं जा सकता। यदि हमने समय रहते स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे को लू की चुनौतियों के अनुसार तैयार नहीं किया, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और भी भयावह हो सकती है। सरकार और स्थानीय निकायों को मिलकर उन जिलों पर ध्यान केंद्रित करना होगा, जहां हीटवेव से मौतों का खतरा सबसे अधिक है।

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह रिपोर्ट एक वैज्ञानिक शोध अध्ययन पर आधारित है। इसे केवल जनहित और जागरूकता के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। भीषण गर्मी या लू से संबंधित किसी भी स्वास्थ्य संबंधी समस्या के लिए तुरंत स्थानीय स्वास्थ्य विभाग के दिशानिर्देशों का पालन करें और चिकित्सीय सलाह लें। इस लेख की जानकारी से जुड़ी किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी लेखक, प्रकाशक एवं संपादक की नहीं है।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

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