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बिजली विभाग में कर्मचारियों की मौतों का सिलसिला: मची खलबली

बिजली विभाग में कर्मचारियों की मौतों का सिलसिला लगातार बढ़ रहा है। स्टाफ की कमी और अनस्किल्ड कर्मचारियों से काम लेना पड़ रहा है भारी।

By अजय त्यागी
1 min read
advertisement13Aug2026%20copy.jpg प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

(लखनऊ, उत्तर प्रदेश)। बिजली विभाग में कर्मचारियों की मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है, जो विभागीय प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। पिछले 37 दिनों के भीतर राज्य में 36 बिजली कर्मियों को गंभीर रूप से झुलसने की घटनाओं का सामना करना पड़ा है, जिनमें से 22 कर्मचारियों ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि यह केवल आधिकारिक आंकड़ा है, जबकि हकीकत इससे कहीं अधिक भयावह है।

कर्मचारी संगठनों का दावा है कि इन हादसों का मुख्य कारण विभाग में कर्मचारियों की भारी कमी है। साल 2017 में जब उपभोक्ताओं की संख्या 1.5 करोड़ थी, तब प्रत्येक सबस्टेशन पर 36 कर्मचारियों की तैनाती का मानक तय किया गया था। लेकिन अब उपभोक्ताओं की संख्या दोगुनी होने के बावजूद, कर्मचारियों की संख्या आधी कर दी गई है। नए अनुबंधों के जरिए स्टाफ में कटौती ने काम के दबाव को कई गुना बढ़ा दिया है।[1]

अकुशलता बनी मौत का कारण

कर्मचारियों का कहना है कि बिजली विभाग में कर्मचारियों की मौतों का सिलसिला इसी कारण बढ़ रहा है क्योंकि विभाग द्वारा अकुशल कर्मियों से बिजली के खंभों पर काम कराया जा रहा है, जो सीधे तौर पर हादसों को न्योता दे रहा है। 2017 के आदेश के अनुसार, एक फीडर लाइन पर एक कार्य गैंग होनी चाहिए थी, जिसमें एक लाइनमैन, एक पैट्रोलमैन और दो अकुशल मजदूर शामिल थे। वर्तमान में, एक फीडर पर सिर्फ एक ही कर्मचारी तैनात किया जा रहा है, चाहे वह कुशल हो या अकुशल।

विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने इस पर चिंता जताते हुए कहा:

"कर्मचारियों की जबरन छंटनी की गई है, जिससे कार्यबल काफी कम हो गया है। मौजूदा स्टाफ पर अत्यधिक दबाव है और इसी दबाव के कारण वे अपनी जान गंवा रहे हैं।"

मुआवजे पर भी विवाद

हादसों के बाद मिलने वाला मुआवजा भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। नियमों के अनुसार, दुर्घटना की स्थिति में बीमा कंपनी से 10 लाख रुपये मिलने चाहिए, लेकिन कई जिलों में अभी भी केवल 7.5 लाख रुपये ही दिए जा रहे हैं। कई परिवारों को तो अब तक मुआवजा भी नहीं मिला है। कर्मचारी संगठनों ने इस भेदभावपूर्ण रवैये के खिलाफ 1 जून से चरणबद्ध आंदोलन और 24 जून को शक्ति भवन पर बड़े प्रदर्शन की घोषणा की है।

वहीं, दूसरी ओर उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। प्रबंधन का दावा है कि सुरक्षा उपकरणों (PPE) पर 28.30 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। कॉरपोरेशन के निदेशक (प्रबंधन एवं प्रशासन) डॉ. जॉन मथाई के अनुसार:

"हमने सुरक्षित कार्य वातावरण सुनिश्चित करने के लिए अत्याधुनिक सुरक्षा उपकरणों का वितरण किया है। इन संस्थागत उपायों के परिणामस्वरूप पिछले वित्तीय वर्ष में बिजली दुर्घटनाओं में 31 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है।"

सुरक्षा मानकों पर सवाल

प्रबंधन के दावों के विपरीत, धरातल पर स्थिति बेहद तनावपूर्ण है। मध्यांचल क्षेत्र में एक ही दिन में हजारों आउटसोर्सिंग कर्मचारियों को हटाना और अनुभवी स्टाफ की छंटनी करना विभाग की कार्यक्षमता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। जब तक कार्यबल अपनी पूरी अधिकृत क्षमता तक नहीं पहुंचता, तब तक इन हादसों को रोकना एक बड़ी चुनौती बना रहेगा। विभाग के भीतर मची यह अफरा-तफरी कर्मचारियों के सुरक्षा कवच को पूरी तरह से नष्ट कर रही है।

अंततः, राज्य के हर जिले में अब इन दिवंगत आत्माओं को श्रद्धांजलि देने के लिए सभाएं आयोजित की जा रही हैं। कर्मचारी संगठन अपनी मांगों पर अड़े हैं और आंदोलन की तैयारी में हैं। बिजली विभाग में कर्मचारियों की मौतों का सिलसिला यदि इसी गति से जारी रहा, तो यह न केवल विभाग के लिए बल्कि राज्य के बुनियादी ढांचे के लिए भी एक बड़ा संकट बन जाएगा। सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन ही एकमात्र समाधान है।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

Editor-in-Chief
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