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भारतीय रेलवे में नियम बदलाव: वेटिंग टिकट पर सफर अब बीते दिनों की बात

भारतीय रेलवे में नियम बदलाव के तहत अब वेटिंग टिकट पर स्लीपर और एसी में सफर नहीं कर पाएंगे यात्री, 1 जून 2026 से लागू होंगे कड़े नियम।

By अजय त्यागी
1 min read
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

(दिल्ली)। भारतीय रेलवे में नियम बदलाव के नाम पर यात्रियों की कमर तोड़ने की तैयारी पूरी हो चुकी है। आगामी 1 जून 2026 से भारतीय रेलवे ने अपनी यात्रा नीति में आमूलचूल परिवर्तन करते हुए वेटिंग टिकट धारकों के लिए स्लीपर और एसी कोच के दरवाजे पूरी तरह बंद कर दिए हैं। रेलवे का तर्क है कि इससे कोचों में बढ़ती भीड़ नियंत्रित होगी और कन्फर्म टिकट वाले यात्रियों को राहत मिलेगी। अब वेटिंग वाले यात्रियों को विवश होकर सामान्य श्रेणी के डिब्बों में ही भीड़ का हिस्सा बनना पड़ेगा।

भीड़ कम करने की आड़ में लिया गया यह फैसला उन यात्रियों के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है, जिन्हें अंतिम समय में यात्रा की आवश्यकता होती है। रेलवे का यह दावा कि इससे यात्रा सुगम होगी, जमीनी हकीकत के सामने कितना टिक पाएगा, यह तो समय ही बताएगा। ट्रेनों में बढ़ती भीड़ का असली कारण सुविधाओं का विस्तार न करना है, लेकिन व्यवस्था अपनी असफलता का ठीकरा यात्रियों पर फोड़ने में माहिर है।[1]

जुर्माने का नया फरमान

नए नियमों के अनुसार, यदि कोई यात्री स्लीपर कोच में वेटिंग टिकट के साथ पकड़ा जाता है, तो उसे 250 रुपये जुर्माना चुकाना होगा। वहीं, यदि यही स्थिति थर्ड या सेकंड एसी में पाई गई, तो जुर्माने की राशि 440 रुपये तक हो सकती है, साथ ही यात्री से पूरा किराया भी वसूला जाएगा।

टीटीई के पास अब यह अधिकार होगा कि वह यात्री को जनरल कोच में धकेल दे या उसे बीच रास्ते में ही ट्रेन से उतार दे। रेलवे के इन कड़े प्रावधानों के बाद बिना टिकट यात्रा करने पर 1,000 रुपये का जुर्माना और जेल की सजा का प्रावधान भी बरकरार है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह सख्ती सिर्फ कागज पर रहेगी या आम यात्री को इसका सीधा दंश झेलना पड़ेगा।

एडवांस बुकिंग में कटौती

सिर्फ कोच में बैठने तक ही नहीं, बल्कि भारतीय रेलवे में नियम बदलाव ने टिकट बुकिंग की समय सीमा भी सिकोड़ दी है। अब एडवांस रिजर्वेशन पीरियड को 120 दिन से घटाकर मात्र 60 दिन कर दिया गया है। यानी अब आपको अपनी यात्रा की योजना दो महीने पहले ही बनानी होगी। इसके अलावा टिकट अपग्रेडेशन के नियमों में भी पेंच फंसाया गया है, जिससे रिफंड के मामले में अब यात्रियों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है।

अपग्रेडेशन के बाद यदि टिकट रद्द होता है, तो रिफंड मूल श्रेणी के आधार पर मिलेगा, न कि अपग्रेड की गई श्रेणी के आधार पर। साथ ही, फर्स्ट एसी में सीधे अपग्रेड की सुविधा बंद कर दी गई है। यह स्पष्ट है कि रेलवे अपनी कमाई बढ़ाने और सुविधाओं में कटौती करने के लिए हर संभव कोशिश कर रही है, भले ही इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़े।

प्रशासनिक दावों की पोल

भले ही ये नियम सुनने में बड़े कड़े और अनुशासित लग रहे हों, लेकिन असल चुनौती इन्हें जमीन पर लागू करने की है। क्या भीड़भाड़ वाली ट्रेनों में टीटीई हर यात्री के टिकट की सघन जांच कर पाएगा? यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है। भारतीय रेलवे में नियम बदलाव के पीछे का विजन यदि केवल यात्रियों को हतोत्साहित करना है, तो यह नीति अपने उद्देश्यों में जरूर सफल होगी, लेकिन यदि यात्रा सुगम बनाना ध्येय है, तो यह केवल एक दिखावा मात्र है।

रेलवे तंत्र में जब तक बुनियादी ढांचे और ट्रेनों की संख्या में इजाफा नहीं होगा, तब तक इस तरह के नियमों से भीड़ कम होने के बजाय बढ़ेगी ही। टीटीई की मनमानी और निगरानी की कमजोरी के बीच, आम यात्री पिसता रहेगा और व्यवस्था कागजी फरमान जारी करती रहेगी। भारतीय रेलवे में नियम बदलाव के इस दौर में देखना होगा कि क्या यह व्यवस्था वास्तव में यात्रियों के हित में है या फिर सिर्फ अव्यवस्था को ढंकने का एक सरकारी प्रयास।

अस्वीकरण

यह रिपोर्ट सामान्य सूचना और आधिकारिक घोषणाओं पर आधारित है। किसी भी प्रकार के यात्रा संबंधी निर्णय लेने से पहले रेलवे के आधिकारिक पोर्टल या संबंधित अधिकारियों से पुष्टि करना आवश्यक है। लेखक, प्रकाशक एवं संपादक इस रिपोर्ट में दी गई जानकारी के उपयोग से होने वाली किसी भी असुविधा या वित्तीय नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होंगे।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

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