सुप्रीम कोर्ट का वेश्यावृत्ति पर फैसला: जबरन पुनर्वास पर लगी रोक
सुप्रीम कोर्ट का वेश्यावृत्ति पर फैसला आया है, अब बिना मर्जी पुनर्वास केंद्र में महिलाओं को भेजना गलत, कोर्ट ने जताई पुरुषवादी सोच पर नाराजगी।
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India
(दिल्ली)। सुप्रीम कोर्ट का वेश्यावृत्ति पर फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था में एक नई बहस का आधार बन गया है। जस्टिस जे बी पारडीवाला और जस्टिस आर महादेवन की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि हर महिला जो वेश्यावृत्ति में संलग्न है, वह अनिवार्य रूप से पीड़ित या मजबूर नहीं है। कोर्ट का यह तल्ख रुख उन प्रशासनिक और कानूनी तंत्रों पर सीधा कटाक्ष है, जो दशकों से महिलाओं की स्वतंत्रता को नजरअंदाज कर उन्हें एक ही चश्मे से देखते रहे हैं। यह फैसला न केवल कानूनी बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण में बड़े बदलाव की मांग करता है।[1]
प्रज्वला बनाम भारत सरकार मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह रेखांकित किया कि वयस्क महिलाओं की मर्जी के बिना उन्हें पुनर्वास केंद्रों में धकेलना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है। जब तक कानून में इस बात का अंतर नहीं किया जाएगा कि कौन सी महिला मजबूरी में है और कौन स्वेच्छा से, तब तक न्याय अधूरा ही रहेगा। यह फैसला उन व्यवस्थाओं के लिए एक चेतावनी है जो महिला के शरीर पर उसके खुद के अधिकार को स्वीकार करने में संकोच करती हैं।
पुरुषवादी सोच पर प्रहार
अदालत ने मौजूदा 'इम्मोरल ट्रैफिक प्रिवेंशन एक्ट, 1956' की धारा 17 को आड़े हाथों लिया और इसे पितृसत्तात्मक मानसिकता का प्रतीक बताया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि कानून में यह फर्क करने की न तो समझ है और न ही इच्छा, कि महिला की वास्तविक स्थिति क्या है।
"इम्मोरल ट्रैफिक प्रिवेंशन एक्ट, 1956 की धारा 17 में हर सेक्स वर्कर महिला को एक ही नजरिए से देखा जाता है। कानून में इस बात का फर्क नहीं किया जाता कि महिला से जबरन यह काम करवाया जा रहा है या वह अपनी इच्छा से इसे कर रही है।"
कोर्ट की यह टिप्पणी उस जड़ हो चुकी व्यवस्था पर सीधा प्रहार है, जो महिलाओं की पसंद और नापसंद को अपनी सुविधा के अनुसार परिभाषित करती है।
मजिस्ट्रेट की नई जिम्मेदारी
अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि मजिस्ट्रेट की भूमिका अब केवल एक रबर स्टैंप की नहीं होगी। उन्हें पूरी सावधानी बरतनी होगी कि पुनर्वास का आदेश महिला के लिए सुरक्षा है या उसकी स्वतंत्रता पर प्रहार। मजिस्ट्रेट को यह सुनिश्चित करना होगा कि महिला का बयान किसी बाहरी दबाव में नहीं, बल्कि उसकी अपनी मर्जी से दिया गया है। यदि महिला अपनी मर्जी से वेश्यावृत्ति जारी रखना चाहती है, तो राज्य उसे जबरन किसी पुनर्वास केंद्र में कैद नहीं कर सकता।
यह फैसला इस बात की पुष्टि करता है कि राज्य का काम महिलाओं को कैद करना नहीं, बल्कि उन्हें विकल्प प्रदान करना है। यदि कोई महिला स्वयं को उस पेशे में सुरक्षित मानती है, तो उसे वहां से हटाने वाली व्यवस्था स्वयं ही शोषणकारी बन जाती है। यह एक ऐसी वास्तविकता है जिसे स्वीकारने में हमारे नीति-नियंताओं ने काफी देरी कर दी है।
स्वतंत्रता और गरिमा
इस ऐतिहासिक फैसले का मूल तत्व 'स्वतंत्रता और गरिमा' है। अदालत ने यह संदेश दिया है कि किसी भी महिला के जीवन, भविष्य और उसकी इच्छाओं को तय करने का अधिकार स्वयं उसका है, न कि किसी मजिस्ट्रेट या सरकारी योजना का। सुप्रीम कोर्ट का वेश्यावृत्ति पर फैसला उन दकियानूसी कानूनों पर एक बड़ा सवालिया निशान है जो महिलाओं को 'वस्तु' मानते हुए उनकी मर्जी की अनदेखी करते रहे हैं।
यह निर्णय कानून की उन फाइलों को धूल झाड़ने जैसा है, जो लंबे समय से जेंडर के प्रति असंवेदनशील रही हैं। समाज और प्रशासन के लिए अब यह अनिवार्य हो गया है कि वे महिलाओं की गरिमा को उनकी स्थिति से ऊपर रखकर देखें। सुप्रीम कोर्ट का वेश्यावृत्ति पर फैसला न केवल न्यायपालिका की संवेदनशीलता को दर्शाता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि अब महिलाओं की 'अपनी मर्जी' को कानून में भी जगह मिलनी चाहिए।
कानूनी सुधार की आवश्यकता
अंतिम तौर पर, सुप्रीम कोर्ट का वेश्यावृत्ति पर फैसला देश के मौजूदा कानूनी ढांचे में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता को रेखांकित करता है। जब तक कानून में 'जबरदस्ती' और 'स्वेच्छा' के बीच बारीक लकीर नहीं खींची जाएगी, तब तक न्याय के नाम पर महिलाओं का पुनर्वास भी एक प्रकार का दमन ही बना रहेगा। आशा है कि यह निर्णय भविष्य की नीतियों में बदलाव लाएगा और महिलाओं को अपनी जिंदगी खुद जीने का सम्मान मिलेगा।
अस्वीकरण
यह रिपोर्ट अदालत के हालिया फैसले और कानूनी प्रावधानों पर आधारित सामान्य सूचनात्मक लेख है। कानूनी मामलों में किसी भी प्रकार की राय या सलाह के लिए विशेषज्ञ वकील से परामर्श अवश्य लें। लेखक, प्रकाशक एवं संपादक इस विषय से जुड़ी किसी भी कानूनी जटिलता या व्यक्तिगत निर्णय के लिए जिम्मेदार नहीं होंगे।