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ऑनलाइन गेमिंग और कसीनो जीएसटी: जीत-हार से नहीं अब दांव से कटेगा टैक्स

ऑनलाइन गेमिंग और कसीनो जीएसटी: सुप्रीम कोर्ट ने दांव लगाने के समय टैक्स को अनिवार्य किया, अब कंपनियों की दलीलें और लाभ की दलीलें होंगी खारिज।

By अजय त्यागी
1 min read
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

(दिल्ली)। ऑनलाइन गेमिंग और कसीनो जीएसटी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा कड़ा रुख अख्तियार किया है, जिसने वर्चुअल सट्टेबाजी की दुनिया में हलचल मचा दी है। देश की सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कसीनो और ऑनलाइन गेमिंग में जीएसटी की गणना खेल के नतीजे या कंपनियों के अंतिम मुनाफे के आधार पर नहीं, बल्कि उसी क्षण होगी जब खिलाड़ी अपनी जेब से दांव लगाता है। कंपनियों का यह तर्क कि 'जीत की राशि देने के बाद जो बचेगा, उसी पर टैक्स लगेगा', अदालत ने सीधे तौर पर खारिज कर दिया है।

यह फैसला केवल कानूनी व्याख्या नहीं, बल्कि उन कॉर्पोरेट घरानों के मुंह पर एक तमाचा है जो मुनाफे को निजी और नुकसान को जनता का मानकर टैक्स चोरी के रास्ते तलाशते रहे हैं। अदालत का मानना है कि कर योग्य आपूर्ति (टैक्सेबल सप्लाई) का संबंध खिलाड़ी के दांव से है, न कि कसीनो ऑपरेटर के वित्तीय पोर्टफोलियो से। अब कंपनियों को अपनी बैलेंस शीट के साथ-साथ अपनी टैक्स चोरी की संभावनाओं को भी सीमित करना होगा।[1]

दांव लगाते ही टैक्स का खेल

न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने यह साफ कर दिया कि चिप्स या टोकन खरीदना ही कर योग्य लेनदेन की शुरुआत है। जैसे ही खिलाड़ी ने दांव लगाया, सरकारी खजाने का हिस्सा सुरक्षित हो गया। अदालत के अनुसार, खिलाड़ी जीते या हारे, इससे जीएसटी की देनदारी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यह स्पष्टीकरण उस भ्रम को तोड़ता है, जिसका सहारा लेकर कंपनियां अब तक कर भुगतान से बचती रही थीं।

"जीएसटी किसी कारोबारी के लाभ या हानि पर नहीं, बल्कि कर योग्य आपूर्ति होने पर लगाया जाता है। खेल का नतीजा आने या खिलाड़ी के जीतने-हारने का इंतजार करने की जरूरत नहीं है।"

कंपनियों का तर्क था कि यदि खिलाड़ी जीतता है और उन्हें नुकसान होता है, तो टैक्स का कोई सवाल नहीं उठता। लेकिन अदालत ने उनकी इस गणितीय चतुराई को 'अपारदर्शी' करार देते हुए यह सुनिश्चित किया है कि अब दांव के हर एक पैसे पर सरकारी नजर रहेगी।

पारदर्शिता की अनिवार्य शर्त

अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब कसीनो मुनाफा कमाता है तो उसे अपनी कमाई बताता है, लेकिन नुकसान होने पर टैक्स छूट मांगता है। यह दोहरा मापदंड अब कानूनी रूप से खत्म कर दिया गया है। ऑनलाइन गेमिंग और कसीनो जीएसटी को लेकर सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि इस नई व्यवस्था से कर प्रणाली में पारदर्शिता आएगी, जिससे कंपनियों द्वारा कर देयता को कम दिखाने की गुंजाइश खत्म हो जाएगी।

खेल की प्रकृति चाहे कैसी भी हो, वह खिलाड़ी के जीतने या हारने से नहीं बदलती। सुप्रीम कोर्ट के इस रुख ने उन कंपनियों की धरातल हिला दी है, जो ऑनलाइन गेमिंग और फैंटेसी स्पोर्ट्स को 'कौशल का खेल' बताकर टैक्स बचाने की जुगाड़ में लगी थीं। अब दांव लगाने वाला हर व्यक्ति अनजाने में ही सही, लेकिन टैक्स अनुपालन का एक हिस्सा बन चुका है।

नीतिगत और कड़वी सच्चाई

ऑनलाइन गेमिंग और कसीनो जीएसटी पर यह फैसला राजनीति की उन गलियों को भी आईना दिखाता है, जहाँ इन खेलों को 'एंटरटेनमेंट' का नाम देकर युवाओं को लत की ओर धकेला जा रहा है। कंपनियों का अब तक का मॉडल ही यह था कि नुकसान को टैक्स के जरिए ढका जाए। अदालत के फैसले के बाद अब कंपनियां इस आधार पर कर चोरी का सहारा नहीं ले पाएंगी कि उन्होंने खिलाड़ी को बड़ी राशि का भुगतान किया है।

अंततः, ऑनलाइन गेमिंग और कसीनो जीएसटी पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर यह बताती है कि अब सट्टेबाजी के डिजिटल प्लेटफार्मों को अपनी व्यावसायिक रणनीति बदलनी होगी। कंपनियों के लिए अब 'मुनाफे का खेल' पहले जैसा आसान नहीं रहा। यह कड़वा फैसला उन लोगों के लिए जरूर सुखद है जो यह मानते थे कि सट्टेबाजी और ऑनलाइन गेमिंग के नाम पर कंपनियों को मनमानी नहीं करने दी जानी चाहिए।

अस्वीकरण

यह रिपोर्ट केवल सामान्य सूचना के उद्देश्य से है और इसमें दी गई कानूनी व्याख्या न्यायिक फैसलों पर आधारित है। व्यवसाय, कराधान या वित्तीय निर्णयों से संबंधित किसी भी कदम के लिए पेशेवर सलाह लें। लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी प्रकार के प्रत्यक्ष या परोक्ष वित्तीय प्रभाव या कानूनी कार्रवाई के लिए जिम्मेदार नहीं हैं।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

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