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जस्टिस वी मोहना की नियुक्ति: न्यायपालिका में नया इतिहास

जस्टिस वी मोहना की नियुक्ति ने भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है, जहाँ एक वरिष्ठ वकील को सीधे सर्वोच्च न्यायालय का जज बनाया गया है।

By अजय त्यागी
1 min read
जस्टिस वी मोहना - File Photo

जस्टिस वी मोहना - File Photo

नई दिल्ली, दिल्ली। जस्टिस वी मोहना की नियुक्ति केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि उस प्रतिभा की जीत है जिसने अपनी मेहनत से बार से सीधे बेंच तक का सफर तय किया है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश पर केंद्र सरकार की मुहर के बाद वे देश की दूसरी ऐसी महिला वकील बन गई हैं, जिन्हें वकील से सीधे सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर नियुक्त किया गया है। जस्टिस इंदु मल्होत्रा के बाद उनका यह मुकाम हासिल करना न केवल उनके व्यक्तिगत संघर्षों की दास्तां है, बल्कि यह भी दिखाता है कि न्याय के मंदिर में योग्यता को अब भी प्राथमिकता दी जा रही है।[1]

वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़कर 37 हो गई है। जस्टिस वी मोहना का सुप्रीम कोर्ट की 12वीं महिला जज के रूप में कार्यभार संभालना इस बात का संकेत है कि अब न्यायपालिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व धीरे-धीरे ही सही, मगर सशक्त हो रहा है। जस्टिस बीवी नागरत्ना के साथ उनकी उपस्थिति उन ज्वलंत कानूनी बहसों में नई धार लाएगी, जो अक्सर पुरुष प्रधान सोच के घेरे में सिमटी रहती हैं। हालांकि, सवाल यह है कि दशकों बाद भी महिलाओं की संख्या दहाई के आंकड़े तक पहुँचाने में कॉलेजियम को इतना समय क्यों लगा?

इतिहास रचने वाली शख्सियत

जस्टिस वी मोहना की नियुक्ति के पीछे उनका लंबा कानूनी संघर्ष छिपा है। भारत के पहले पांच साल के इंटीग्रेटेड लॉ कोर्स की छात्रा रही मोहना ने कोयंबटूर लॉ कॉलेज से अपनी वकालत की नींव रखी थी। अपने परिवार की पहली वकील के रूप में उन्होंने जो सफर शुरू किया, वह साल 1996 में एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड बनने और फिर 2015 में वरिष्ठ वकील का दर्जा पाने के साथ और अधिक निखर गया। उनका कार्यकाल 2031 तक है, जो यह सुनिश्चित करेगा कि आने वाले वर्षों में वे कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक फैसलों का हिस्सा बनेंगी।

उनकी कानूनी यात्रा में सेना में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन दिलाने और कर्नाटक हिजाब जैसे जटिल मामलों में उनकी पैरवी ने उनकी तार्किक क्षमता का लोहा मनवाया है। वकालत के दौरान उन्होंने जिस तरह से वरिष्ठ नागरिकों के संपत्ति अधिकारों जैसे मानवीय मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद की, उससे उम्मीद बंधती है कि वे सुप्रीम कोर्ट में भी आम आदमी के हितों की प्रहरी बनी रहेंगी। लेकिन देखना यह होगा कि क्या वे जजों के बीच 'कॉलेजियम प्रणाली' के घेरे से बाहर निकलकर स्वतंत्र रूप से आम जनमानस के लिए न्याय सुनिश्चित कर पाएंगी?

न्यायपालिका की दिशा

जस्टिस वी मोहना की नियुक्ति पर चर्चा करते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि न्यायपालिका का चेहरा बदल रहा है, लेकिन रफ्तार अभी भी सुस्त है। जब हम विकसित देशों की बात करते हैं, तो वहाँ की ज्यूडिशियरी में विविधता और उम्र का संतुलन बहुत पहले से स्थापित है। यहाँ नियुक्ति के लिए उम्र का पड़ाव और सेवानिवृत्ति की नियत तारीख एक बड़ी बाधा बनी रहती है। जस्टिस मोहना के पास पाँच साल का लंबा कार्यकाल है, जो उन्हें न्यायिक सुधारों की दिशा में कुछ ठोस करने का पर्याप्त समय देता है।

सुप्रीम कोर्ट में अब जजों की संख्या बढ़ गई है, पर असली चुनौती यह है कि क्या यह बढ़ती संख्या आम आदमी को सस्ता और त्वरित न्याय दिला पाएगी? अदालतों में लंबित करोड़ों मामले आज भी न्यायपालिका की कार्यक्षमता पर सवालिया निशान खड़े करते हैं। उम्मीद है कि जस्टिस मोहना जैसे नए जजों का जुड़ना न केवल नए दृष्टिकोण लाएगा, बल्कि पुरानी फाइलों के बोझ को कम करने में भी अपनी भूमिका निभाएगा।

"जस्टिस वी मोहना, जस्टिस इंदु मल्होत्रा के बाद देश की दूसरी महिला वकील हैं, जिन्हें वकील से सीधे सुप्रीम कोर्ट की जज नियुक्त किया गया है।"

अंततः, जस्टिस वी मोहना की नियुक्ति न्याय प्रेमियों के लिए एक सुखद संकेत है। उन्हें उन मामलों की लंबी फेहरिस्त देखनी होगी जो वर्षों से न्याय के इंतजार में धूल फांक रहे हैं। राजनीतिक हस्तक्षेप और न्यायिक सक्रियता के बीच का जो बारीक संतुलन है, उसे बनाए रखना ही उनकी असली परीक्षा होगी। क्या वे एक 'जज' बनकर केवल कानूनों की व्याख्या करेंगी या एक 'न्यायविद' के रूप में समाज की कुरीतियों और अन्याय के खिलाफ अपनी कलम से तीखी धार चलाएंगी? यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन फिलहाल उनके स्वागत में न्यायपालिका का द्वार उम्मीदों के साथ खुला है।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

Editor-in-Chief
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