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भारत के लिए नई आतंकी साजिश: बेनकाब हो रही आईएसआई

भारत के लिए नई आतंकी साजिश अब छद्म युद्ध का एक ऐसा घातक रूप ले चुकी है, जहाँ दुश्मन संगठन का नाम नहीं, बल्कि विचारधारा के जाल से दहशत का बीज बो रहा है।

By अजय त्यागी
1 min read
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

नई दिल्ली, भारत। भारत के लिए नई आतंकी साजिश अब उस मोड़ पर आ खड़ी हुई है, जहाँ हमलावर का चेहरा धुंधला और मंसूबे कहीं अधिक खतरनाक हैं। सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान अब अपने पुराने मोहरों—जैसे लश्कर या जैश—के नाम का इस्तेमाल करने के बजाय 'अनाम' मॉड्यूल खड़ा कर रहा है। यह महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक सोची-समझी कूटनीतिक चाल है, ताकि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वह खुद को 'सज्जन' साबित कर सके और अंदर ही अंदर भारत की शांति को अस्थिर करने का एजेंडा बदस्तूर जारी रहे।[1]

एफएटीएफ (FATF) की ग्रे लिस्ट का डर पाकिस्तान के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं रहा है। अपनी चरमराई अर्थव्यवस्था को बचाने की मजबूरी ने उसे आतंकवाद का 'वेरिएंट' बदलने पर मजबूर कर दिया है। अब वह प्रत्यक्ष तौर पर संगठनों का समर्थन करने के बजाय, गैंगस्टर नेटवर्क और स्थानीय कट्टरपंथी समूहों को ऑक्सीजन दे रहा है। यह परोक्ष कटाक्ष उन देशों पर भी है, जो पाकिस्तान को 'आतंकवाद का शिकार' मानकर वित्तीय मदद देते हैं, जबकि असल में वह इसी पैसे का इस्तेमाल भारत के खिलाफ नई आतंकी साजिश रचने में कर रहा है।

आतंक का बदलता चेहरा

भारत के लिए नई आतंकी साजिश का सबसे डरावना पहलू यह है कि इसमें कोई एक तयशुदा आतंकी ढांचा नहीं है। पहले की जांचों में एजेंसियों के पास लश्कर या अल-कायदा जैसे ज्ञात नेटवर्क का 'वर्किंग पैटर्न' होता था, जिससे कड़ी-से-कड़ी जोड़ना आसान था। लेकिन अब ये नए मॉड्यूल जैश, आईएस और अल-कायदा की विचारधाराओं का एक विचित्र 'कॉकटेल' पेश कर रहे हैं। इससे जांच एजेंसियों के लिए मुख्य सूत्रधार तक पहुँचना एक नामुमकिन सी पहेली बन गया है।

युवाओं को कट्टरपंथ की भट्टी में झोंकने के लिए जिस तरह के डिजिटल प्रचार साहित्य का उपयोग किया जा रहा है, वह प्रशासन की साइबर चौकसी पर भी सवाल खड़ा करता है। जब विचारधाराएं आपस में मिल जाती हैं, तो अपराध का 'हस्ताक्षर' (Modus Operandi) पहचानना मुश्किल हो जाता है। पाकिस्तान की आईएसआई इस भ्रम की स्थिति का भरपूर लाभ उठा रही है, ताकि भारत की सुरक्षा एजेंसियां एक ऐसे दुश्मन से लड़ती रहें जिसका कोई निश्चित पता या आधिकारिक कार्यालय है ही नहीं।

प्रशासनिक और खुफिया चुनौती

भारत के लिए नई आतंकी साजिश को लेकर सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि यह लड़ाई अब केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि विचारधाराओं के स्तर पर लड़ी जानी है। पाकिस्तान की यह हताशा कि वह खुलेआम युद्ध नहीं जीत सकता, उसे ऐसे छद्म युद्धों की ओर धकेल रही है। यदि भारत के भीतर पनपने वाला कोई भी नया समूह पाकिस्तान की सरपरस्ती में फल-फूल रहा है, तो यह स्पष्ट है कि दुश्मन ने अपने तौर-तरीके भले ही बदल लिए हों, पर उनकी नफरत की आग आज भी उसी पड़ोसी जमीन से आ रही है।

"खुफिया ब्यूरो के एक अधिकारी ने कहा कि यह सब जानते हैं कि पाकिस्तान इन आतंकी गतिविधियों को वित्तीय सहायता देता है। एक ओर वह भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों को जारी रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर वह एफएटीएफ जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की निगरानी में भी नहीं आना चाहता।"

भविष्य में सुरक्षा एजेंसियों को और अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है, क्योंकि ऐसे मॉड्यूलों का भंडाफोड़ करना तब तक कठिन रहेगा जब तक कि हम केवल 'संगठन' आधारित जांच पर केंद्रित रहेंगे। हमें उस 'इकोसिस्टम' को निशाना बनाने की जरूरत है जो इन मॉड्यूल को वित्तपोषित और प्रेरित कर रहा है। अगर समय रहते इस नई आतंकी साजिश के ताने-बाने को नहीं तोड़ा गया, तो आने वाले समय में देश के भीतर की शांति को बनाए रखना एक बड़ी अग्निपरीक्षा होगी।

राजनीति और कूटनीति के दांव-पेच अपनी जगह हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता करने वाली कोई भी नीति अंततः घातक ही साबित होती है। पाकिस्तान की इस नई आतंकी साजिश को विफल करने के लिए केवल बंदूकें काफी नहीं, बल्कि ऐसी खुफिया तकनीक और राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है जो दुश्मन के हर नए दांव को उसके चलने से पहले ही बेअसर कर दे।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

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