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राजस्थान

जयपुर की प्रसिद्ध ब्लू पॉटरी: सरकारी उपेक्षा और खोती पहचान

जयपुर की प्रसिद्ध ब्लू पॉटरी अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही है। आधुनिक चुनौतियों और सरकारी उपेक्षा से यह अनमोल विरासत विलुप्त होने की कगार पर है।

By अजय त्यागी
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जयपुर की प्रसिद्ध ब्लू पॉटरी

जयपुर की प्रसिद्ध ब्लू पॉटरी

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जयपुर, राजस्थान। जयपुर की प्रसिद्ध ब्लू पॉटरी आज अपने अस्तित्व को बचाने के लिए कड़ा संघर्ष कर रही है, क्योंकि आधुनिक दौर की चुनौतियों और नई पीढ़ी की अरुचि ने इस सदियों पुरानी कला को विलुप्त होने के कगार पर ला खड़ा किया है।

जयपुर की प्रसिद्ध ब्लू पॉटरी आज अपने अस्तित्व को बचाने के लिए कड़ा संघर्ष कर रही है, क्योंकि आधुनिक दौर की चुनौतियों और नई पीढ़ी की अरुचि ने इस सदियों पुरानी कला को विलुप्त होने के कगार पर ला खड़ा किया है। मुगल काल में ईरान से भारत आई यह 'पर्सियन आर्ट' कभी महाराजा सवाई राम सिंह द्वितीय के संरक्षण में जयपुर की सांस्कृतिक पहचान बनी थी। उस समय यह कला केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि शाही रुतबे का प्रतीक थी।[1]

लेकिन आज, जब दुनिया इस कला की सुंदरता की कायल है, स्थानीय स्तर पर इसे वह सम्मान नहीं मिल पा रहा है, जिसकी यह हकदार है। जयपुर की प्रसिद्ध ब्लू पॉटरी का यह संकट न केवल एक कला का अंत है, बल्कि उन हाथों का अपमान भी है जिन्होंने पीढ़ियों तक इसे जीवित रखा। यह उपेक्षा उस सांस्कृतिक चेतना पर एक बड़ा कटाक्ष है, जिसे सहेजने का दम हम हर मंच पर भरते हैं।

कला का ऐतिहासिक गौरव

ईटीवी भारत की एक रिपोर्ट के अनुसार जयपुर की प्रसिद्ध ब्लू पॉटरी का इतिहास काफी गौरवशाली रहा है। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता शिल्पकार अनिल डोराया बताते हैं कि सवाई राम सिंह द्वितीय ने कुम्हार समुदाय को प्रोत्साहित कर इस कला को शिखर पर पहुँचाया था। किवदंती है कि एक प्रतियोगिता में डोराया के परदादा ने महाराजा की पतंग काट दी थी, जिससे खुश होकर उन्हें ईरान भेजकर यह कला सीखने का अवसर दिया गया। तभी से जयपुर की प्रसिद्ध ब्लू पॉटरी इस शहर की पहचान बनी और स्थानीय मिट्टी की कला को नया वैश्विक आयाम मिला।

हालांकि, आज का सच यह है कि इस कला को समझने और सहेजने की जिम्मेदारी उठाने वाले लोग कम होते जा रहे हैं। जब शहर के लोग ही अपनी थाती को पहचानने के बजाय इसे दूसरे राज्यों या देशों का उत्पाद समझने की भूल कर रहे हों, तो उस कला का भविष्य अंधकारमय होना स्वाभाविक है। यह प्रशासनिक दावों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है, जो हर वर्ष हस्तशिल्प के नाम पर बजट तो जारी करते हैं, पर कला के संरक्षण में विफल रहते हैं।

निर्माण की जटिल प्रक्रिया

जयपुर की प्रसिद्ध ब्लू पॉटरी आम मिट्टी के बर्तनों से बिल्कुल अलग है। डोराया के अनुसार, इसमें क्वार्ट्ज, कांच, मुल्तानी मिट्टी, गोंद कतीरा और सेंधा नमक का जटिल मिश्रण इस्तेमाल होता है। इसे हाथ से गूंथकर, सांचों में ढालकर और फिर धूप में सुखाकर तैयार किया जाता है। इसके बाद हाथों से की गई नक्काशी और कांच की कोटिंग इसे सदियों तक बरकरार रहने वाली चमक प्रदान करती है।

"ब्लू पॉटरी केवल मिट्टी का पात्र नहीं है, यह एक जीवित इतिहास है जिसमें राजस्थान की आत्मा बसती है और संघर्षों की दास्तां हर रंग में झलकती है।"

यह कलात्मक बारीकी आज भी 45 देशों के राजदूतों और उद्योगपतियों को आकर्षित करती है, लेकिन विडंबना देखिए कि अपने ही घर में इसे वह प्रोत्साहन नहीं मिला। जयपुर की प्रसिद्ध ब्लू पॉटरी के प्रति सरकारी तंत्र की उदासीनता इस कदर है कि कारीगरों को आज बुनियादी सुविधाओं के लिए भी जूझना पड़ रहा है। अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो यह अनमोल विरासत केवल किताबों में सिमट कर रह जाएगी।

लुप्त होती विरासत

रिपोर्ट के अनुसार डोराया चेतावनी देते हैं कि अगर समय रहते सरकारी स्तर पर छात्रों को फाइन आर्ट्स के तहत इसके प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं की गई, तो अगले 10 से 20 वर्षों में यह कला पूरी तरह खत्म हो जाएगी। उन्होंने छात्रों को प्रशिक्षित करने का प्रस्ताव दिया है, लेकिन शायद प्रशासन के पास अभी फाइलों के अंबार से बाहर निकलने की फुर्सत नहीं है।

जयपुर की प्रसिद्ध ब्लू पॉटरी का संरक्षण केवल बर्तनों को बचाने की लड़ाई नहीं है, बल्कि एक गौरवशाली इतिहास के पन्ने को फटने से बचाने का प्रयास है। यदि हम आज अपनी विरासत को नहीं पहचान सके, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। यह कला मरेगी तो केवल एक शिल्प नहीं, बल्कि जयपुर का वह 'ब्लू' इतिहास हमेशा के लिए धुंधला हो जाएगा जिसे कभी महाराजा सवाई राम सिंह द्वितीय ने संजोया था।

अस्वीकरण: 

ब्लू पॉटरी एक पारंपरिक हस्तशिल्प है। इस रिपोर्ट का उद्देश्य केवल सांस्कृतिक सूचना साझा करना है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए जाने वाले किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं हैं।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

Editor-in-Chief
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