संस्कार प्रकल्प (स्वामी विवेकानंद सत्र): सनातन मूल्यों की नई पाठशाला
संस्कार प्रकल्प (स्वामी विवेकानंद सत्र) के जरिए बच्चों को सनातन संस्कृति और नैतिक मूल्यों से जोड़ा जा रहा है, जो आधुनिक दौर में एक बड़ी पहल है।
संस्कार प्रकल्प (स्वामी विवेकानंद सत्र)
भीलवाड़ा, राजस्थान। भारत विकास परिषद एवं काशीपुरी वकील कॉलोनी महेश समिति की ओर से बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए एक बेहद सराहनीय और प्रेरणादायक पहल की गई है। परिषद द्वारा राम धाम के पीछे स्थित माहेश्वरी भवन में आयोजित संस्कार प्रकल्प (स्वामी विवेकानंद सत्र) के तहत नई पीढ़ी को सनातन संस्कृति और नैतिक मूल्यों से जोड़ने का अनूठा प्रयास किया गया है। यह आयोजन उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो आज के दौर में बच्चों को केवल आधुनिकता की अंधी दौड़ में झोंक रहे हैं।
विवेकानंद शाखा के अध्यक्ष गिरीश अग्रवाल ने बताया कि कार्यक्रम में सनातन हिंदू जनजागृति संस्थान के कार्यवाहक जगदीश आनंद लाखोटिया सहित प्रबुद्ध मातृशक्ति ने बच्चों को जीवनोपयोगी और सनातन संस्कारों से जोड़ा है। आज जब बच्चे अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं, तब इस तरह के सत्र उन्हें यह याद दिलाते हैं कि नैतिक मूल्यों के बिना शिक्षा का कोई अर्थ नहीं है। यह पहल स्पष्ट करती है कि संस्कृति को बचाना ही भविष्य को सुरक्षित करना है।
संस्कारों की नींव
संस्कार प्रकल्प (स्वामी विवेकानंद सत्र) के इस विशेष सत्र में 7 से 15 वर्ष तक के बालकों को विद्यार्थी जीवन में आने वाली चुनौतियों, दुखों और असमंजस के पलों में धैर्यपूर्वक सामना करने की सीख दी गई है। सत्र के दौरान बच्चों को अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देते हुए बताया गया कि हम सभी का जन्म किसी न किसी कुल में हुआ है, इसलिए हमें अपने कुलदेवता का निरंतर जाप करना चाहिए, जिससे आत्मिक बल मिलता है।
"सत्र के दौरान बच्चों को अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देते हुए बताया गया कि हम सभी का जन्म किसी न किसी कुल में हुआ है, इसलिए हमें अपने कुलदेवता का निरंतर जाप करना चाहिए, जिससे आत्मिक बल मिलता है।" - संस्कार प्रकल्प (स्वामी विवेकानंद सत्र) के वक्ता।
वक्ताओं ने बच्चों को अच्छे विद्यालयों में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के साथ-साथ सत्संग से जुड़े रहने के लिए प्रेरित किया, ताकि वे हर प्रकार के व्यसनों और बुरी आदतों की लत से दूर रह सकें। यह सलाह उन लोगों पर सीधा प्रहार है जो किताबी ज्ञान को तो सब कुछ मानते हैं, लेकिन बच्चों के चरित्र निर्माण में पूरी तरह विफल रहते हैं।
व्यावहारिक ज्ञान
आधुनिक दौर में बच्चों को दैनिक व्यावहारिक ज्ञान देते हुए सुबह उठकर बड़ों को प्रणाम करने की सही विधि सिखाई गई है। साथ ही, विद्या अध्ययन के दौरान शरीर और मस्तिष्क को ऊर्जावान बनाए रखने के लिए सूर्य नमस्कार का अभ्यास कराया गया और मस्तक पर तिलक लगाने की विधि व उसके महत्व को समझाया गया। यह अनुशासन ही आने वाले समय में बच्चों को एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में विकसित करेगा।
कार्यक्रम को रोचक बनाने के लिए बच्चों में उत्साह और आपसी प्रेम जगाने के उद्देश्य से सामूहिक गीत गाए गए और कई हल्के-फुल्के मनोरंजक खेल खिलाए गए, जिसमें बच्चों ने पूरी ऊर्जा के साथ सहभागिता की। यह स्पष्ट है कि जब शिक्षा में आनंद और संस्कार का मेल होता है, तभी एक सर्वांगीण व्यक्तित्व का विकास संभव है। यह आयोजन निश्चित ही नई पीढ़ी को एक सही राह दिखाने का सार्थक प्रयास है।