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अवैध खनन पर एनजीटी की फटकार: पारिस्थितिकी तंत्र हुआ तबाह

अवैध खनन पर एनजीटी की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा। सरकारी एजेंसियों की भारी लापरवाही से बिगड़ा पर्यावरण, तबाही के कगार पर नदी।

By अजय त्यागी
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advertisement13Aug2026%20copy.jpg प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

बडगाम, जम्मू-कश्मीर। अवैध खनन पर एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) की ताजा रिपोर्ट ने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। जम्मू-कश्मीर के बडगाम जिले में सुखनाग धारा के किनारे चल रहे अंधाधुंध खनन पर बनी विशेष समिति ने अपनी जांच में 'गंभीर संस्थागत विफलताओं' का पर्दाफाश किया है। रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि जिन सरकारी एजेंसियों पर पर्यावरण की सुरक्षा और खनन पर निगरानी की जिम्मेदारी थी, वे पूरी तरह नाकाम रही हैं। यह खुलासा उस याचिका के बाद हुआ है जिसमें नदी के प्राकृतिक बहाव को बदलने और पारिस्थितिकी तंत्र को तबाह करने के गंभीर आरोप लगे थे।

यह मामला वर्षों से पर्यावरणविदों और स्थानीय निवासियों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, रेत, बजरी और नदी के तल से अन्य खनिजों का जरूरत से ज्यादा निष्कर्षण न केवल नदी के किनारों को कमजोर कर रहा है, बल्कि आसपास की कृषि योग्य भूमि को भी बंजर बना रहा है। एनजीटी की दो-सदस्यीय विशेषज्ञ समिति ने जब मौके का मुआयना किया, तो उन्हें खनन गतिविधियों से फैली बर्बादी का मंजर देखकर गहरा धक्का लगा।[1]

अंधेरे में सरकारी तंत्र

अवैध खनन पर एनजीटी की समिति ने अपनी जांच में पाया कि जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का या तो पालन नहीं हुआ, या फिर उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। राजस्व, वन, बाढ़ नियंत्रण, मत्स्य पालन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जैसे विभागों के बीच समन्वय का पूरी तरह अभाव दिखा। समिति ने पाया कि एजेंसियों की मिलीभगत और सुस्त निगरानी के कारण ही यह अवैध धंधा फलता-फूलता रहा। क्या यह सब महज लापरवाही है, या फिर इसके पीछे एक बड़ा संगठित भ्रष्टाचार का जाल है?

"विभिन्न एजेंसियों ने खनन कार्यों की प्रभावी ढंग से निगरानी करने और पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों के अनुपालन को सुनिश्चित करने में विफलता दिखाई है।" - एनजीटी गठित समिति की रिपोर्ट।

रिपोर्ट में इस बात पर गहरा दुख जताया गया है कि स्थानीय लोगों की शिकायतों को बार-बार दरकिनार किया गया। पर्यावरण कार्यकर्ता राजा मुजफ्फर भट द्वारा दायर याचिका के बाद हुई इस फील्ड निरीक्षण ने उन दावों की पुष्टि कर दी है कि सुखनाग धारा का अस्तित्व खतरे में है। स्थानीय निवासियों ने समिति के सामने अपना दर्द बयां किया और बताया कि कैसे अवैध खनन ने न केवल उनके जल स्रोतों को दूषित किया है, बल्कि उनकी आजीविका पर भी संकट खड़ा कर दिया है।

खतरे में पारिस्थितिकी तंत्र

अवैध खनन पर एनजीटी की findings इस बात को पुख्ता करती हैं कि कैसे कमजोर प्रवर्तन और लालच ने एक पूरे क्षेत्र के पर्यावरण को तबाह कर दिया है। नदी का प्राकृतिक बहाव बदलने से भू-क्षरण का खतरा बढ़ गया है, जिससे बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न होने की आशंका भी बनी रहती है। विशेषज्ञ समिति ने स्पष्ट किया है कि यदि खनन गतिविधियों पर लगाम नहीं लगाई गई, तो आने वाले समय में इसके परिणाम और भी विनाशकारी होंगे।

"अवैध निष्कर्षण ने नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बदल दिया है, तटबंधों को कमजोर किया है और आसपास की कृषि भूमि को प्रभावित किया है।" - विशेषज्ञ समिति का अवलोकन।

अब एनजीटी की आगामी सुनवाई इस मामले में निर्णायक साबित हो सकती है। उम्मीद की जा रही है कि ट्रिब्यूनल न केवल दोषियों के खिलाफ सख्त जवाबदेही तय करेगा, बल्कि नदी के पुनर्वास के लिए भी ठोस दिशा-निर्देश जारी करेगा। यह रिपोर्ट न केवल बडगाम जिले के लिए एक चेतावनी है, बल्कि पूरे देश की उन सरकारी मशीनरी के लिए एक आइना है जो अपने कर्तव्य का पालन करने में विफल रही हैं।

जिम्मेदारी का सवाल

अवैध खनन पर एनजीटी की यह जांच अब जवाबदेही की मांग कर रही है। जिन अधिकारियों को पर्यावरण की रक्षा करनी थी, उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी क्यों बांध रखी थी? क्या यह सरकारी उदासीनता का परिणाम है या किसी बड़े खेल का हिस्सा? इन सवालों का जवाब अब ट्रिब्यूनल के रुख से ही मिलेगा। तब तक, बडगाम की सुखनाग धारा अपनी बर्बादी की दास्तां बयां करती हुई न्याय का इंतजार कर रही है।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

Editor-in-Chief
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