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बाल संस्कार शिविर: बच्चों के भविष्य को बदल देगी यह बड़ी सीख

बाल संस्कार शिविर में बच्चों को सिखाए जा रहे अद्भुत जीवन मूल्य। आधुनिक दौर में पाश्चात्य संस्कृति से अलग भारतीय सनातन संस्कृति की पाठशाला।

By अजय त्यागी
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बाल संस्कार शिविर

भीलवाड़ा, राजस्थान (पंकज पोरवाल)। बाल संस्कार शिविर में आजकल जो नजारा देखने को मिल रहा है, वह आधुनिक दौर के अभिभावकों के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है। मोबाइल और वीडियो गेम्स में खोए रहने वाली आज की पीढ़ी जब वैदिक मंत्रोच्चार और महापुरुषों के जयकारों से माहौल को गुंजायमान कर रही है, तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं लगता। रामधाम के पीछे स्थित माहेश्वरी भवन में आयोजित इस शिविर में बच्चों को किताबी ज्ञान से परे भारतीय सनातन संस्कृति की वह विरासत सौंपी जा रही है, जो आज के भागदौड़ भरे जीवन में लगभग विलुप्त होती जा रही है।

शिविर के दूसरे दिन का दृश्य पूरी तरह से भावुक और प्रेरणादायक था। बच्चों ने न केवल अपनी संस्कृति की महानता को महसूस किया, बल्कि उसे अपने जीवन में उतारने का संकल्प भी लिया। इस दौरान मुख्य वक्ता मधुबाला यादव ने बच्चों को एक ऐसे आइने के सामने खड़ा कर दिया, जहाँ उन्हें अपनी जड़ों की अहमियत समझ आई। उनका संबोधन बच्चों के लिए किसी 'वेक-अप कॉल' की तरह था, जिसने उन्हें यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि हम आखिर कहां जा रहे हैं।

संस्कारों का वैज्ञानिक सच

बाल संस्कार शिविर में बच्चों को चरण स्पर्श की वैज्ञानिक विधि समझाई गई। मधुबाला यादव ने कहा कि चरण स्पर्श केवल परंपरा नहीं, बल्कि बड़ों से सकारात्मक ऊर्जा लेने का एक सशक्त माध्यम है। उन्होंने पश्चिमी सभ्यता की ओर इशारा करते हुए कहा कि 'हैंडशेक' या हाथ मिलाना हमारी आंतरिक ऊर्जा का क्षय करता है, जबकि भारतीय पद्धति हमें समृद्ध बनाती है। यह तर्क सुनकर वहां मौजूद बच्चों के साथ-साथ उनके अभिभावक भी सन्न रह गए, क्योंकि आज की पीढ़ी ने इसे कभी इस नजरिए से देखा ही नहीं था।

"भारतीय संस्कृति अत्यंत महान है। हमारे पूर्वजों ने हमें ऐसे संस्कार दिए हैं जो हमारे जीवन को समृद्ध बनाते हैं। छोटे-छोटे संस्कारों में ही जीवन की सबसे बड़ी सफलता छिपी है।" - मधुबाला यादव, मुख्य वक्ता।

शिविर का एक बड़ा आकर्षण मंदिर में जाकर बच्चों को व्यावहारिक ज्ञान देना रहा। बच्चों को सिखाया गया कि मंदिर प्रवेश की मर्यादा क्या होती है, दहलीज को नमन क्यों किया जाता है और माथे पर तिलक लगाने की सही वैदिक विधि क्या है। यह सिर्फ पूजा-पाठ नहीं, बल्कि एक संपूर्ण जीवन जीने की कला थी, जिसे विशेषज्ञ राजेंद्र पारीक, के.जी. सोनी और हरगोविंद सोनी जैसे समर्पित कार्यकर्ताओं की देखरेख में सिखाया जा रहा है।

तकनीक से महापुरुषों की गाथा

बाल संस्कार शिविर में आधुनिक तकनीक का भी बखूबी इस्तेमाल किया जा रहा है। प्रोजेक्टर पर महापुरुषों की कहानियों को एनिमेशन के माध्यम से देखकर बच्चे इस कदर मंत्रमुग्ध थे कि उनकी एकाग्रता देखने लायक थी। सुबह के सत्र में सूर्य नमस्कार और प्राणायाम ने न केवल उनके शरीर को लचीला बनाया, बल्कि मानसिक रूप से भी उन्हें शांत और केंद्रित कर दिया। यह शिविर सिर्फ बच्चों को ही नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था को चुनौती दे रहा है जो बच्चों को केवल किताबी कीड़ा बनाने पर तुली है।

"बच्चों को बड़ी स्क्रीन के माध्यम से महापुरुषों की प्रेरक कहानियां और विभिन्न संस्कार विधियां विस्तार से एनिमेशन के साथ समझाई गईं, ताकि वे इसे गहराई से समझ सकें।" - आयोजन समिति।

शिविर को भव्य रूप देने में गिरीश अग्रवाल, आनंद जागेटिया, प्रीति जागेटिया, कल्पना काबरा, अदिति काबरा, राखी मोदी और मधुबाला यादव की टीम ने दिन-रात एक कर दिया है। यह आयोजन 5 जून तक छोटे बच्चों के लिए और 7 जून तक युवाओं के लिए जारी रहेगा। भीलवाड़ा की यह पहल यह संदेश देने के लिए काफी है कि अगर बच्चों को सही दिशा दी जाए, तो वे देश का गौरव बन सकते हैं।

एक नई चेतना का उदय

बाल संस्कार शिविर की यह लहर अब पूरे शहर में चर्चा का विषय है। लोग इस बात से हैरान हैं कि कैसे कुछ ही दिनों में बच्चों के व्यवहार में इतना सकारात्मक बदलाव आ सकता है। यह शिविर उन सभी अभिभावकों के लिए एक सबक है जो यह मान बैठे थे कि अब संस्कारों को बचाना नामुमकिन है। यह आयोजन साबित करता है कि नींव अगर मजबूत हो, तो भविष्य की इमारत को कोई भी आंधी नहीं गिरा सकती।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

Editor-in-Chief