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डिजिटल सखी परियोजना: साइकिल के पहियों पर दौड़ती ग्रामीण उम्मीदें

डिजिटल सखी परियोजना ने साइकिल यात्रा से जगाई जागरूकता, ग्रामीण महिलाओं ने पर्यावरण संरक्षण और डिजिटल साक्षरता का बीड़ा उठाया।

By अजय त्यागी
1 min read
advertisement13Aug2026%20copy.jpg डिजिटल सखी परियोजना

डिजिटल सखी परियोजना

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश। डिजिटल सखी परियोजना की इन बेटियों ने जब अपनी साइकिलों के पैडल थामे, तो वह केवल एक सवारी नहीं थी, बल्कि बदलाव की एक ऐसी लहर थी जो ग्रामीण भारत की पगडंडियों को रोशन कर गई। विश्व साइकिल दिवस और पर्यावरण दिवस के पावन अवसर पर, इन डिजिटल सखियों ने यह साबित कर दिया कि हौसले यदि बुलंद हों, तो छोटी सी साइकिल भी पूरे समाज की दिशा बदल सकती है। यह पहल केवल सूचना साझा करने तक सीमित नहीं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के स्वाभिमान को जगाने का एक भावुक प्रयास है।

गोपालपुर, पीपरा बसंत और मोहनपुर जैसे गांवों की धूल भरी गलियों में जब इन सखियों की साइकिलें रुकीं, तो वहां की महिलाओं की आंखों में एक नई चमक दिखी। अनुष्का, हेमा, मनीषा, अंजनी और आशा जैसी सखियों ने जिस निस्वार्थ भाव से डिजिटल साक्षरता और वित्तीय सशक्तिकरण की बात की, उसने गांव की महिलाओं को यह अहसास दिलाया कि वे भी इस आधुनिक युग की धड़कन बन सकती हैं। यह उन हजारों घरों की कहानी है, जहां अब तकनीक का पहिया घूम रहा है।

साइकिल, स्वास्थ्य और सशक्तिकरण

डिजिटल सखी परियोजना के इस अभियान ने ग्रामीण समाज को एक बहुत गहरी सीख दी है। साइकिल न केवल एक परिवहन का साधन है, बल्कि यह आत्मनिर्भरता और पर्यावरण के प्रति सम्मान का प्रतीक है। इन सखियों ने ग्रामीणों को बार-बार याद दिलाया कि हर पैडल के साथ हम न केवल अपनी सेहत सुधारते हैं, बल्कि पृथ्वी को प्रदूषण के उस बोझ से भी मुक्त करते हैं जो भविष्य के लिए घातक है। यह संदेश उन लोगों तक पहुंचना बहुत जरूरी था जो आज भी सुविधाओं के अभाव में अपनी प्रतिभा को दबाए बैठे थे।

"साइकिल की गति केवल एक दिशा की ओर नहीं है, बल्कि यह सशक्त नारी की प्रगति का प्रतीक है। हर पैडल के साथ स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और आत्मनिर्भरता का संदेश जुड़ा है," डिजिटल सखियों का संदेश।

पंचायत भवनों में गूंजता संकल्प

अभियान के दूसरे चरण में जब ये डिजिटल सखियाँ पंचायत भवनों पर रुकीं, तो नजारा देखने लायक था। श्रमदान के दौरान न केवल महिलाएं, बल्कि गांव के बड़े-बुजुर्गों ने भी हाथ बंटाए। जब स्वच्छ भारत मिशन के लिए हाथ में झाड़ू थामे इन सखियों को देखा, तो यह समझ आया कि पर्यावरण संरक्षण केवल भाषणों का विषय नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन जीने का तरीका है। स्वच्छता के इस संकल्प ने गांव की मिट्टी को एक नई पहचान दी है।

कार्यक्रम के दौरान दिए गए इन प्रेरक संदेशों ने न केवल लोगों का ध्यान खींचा, बल्कि उनके दिलों में बदलाव की चिंगारी भी जला दी:

  • "पैडल बढ़ाओ, प्रदूषण घटाओ – स्वस्थ समाज बनाओ"
  • "साइकिल की गति, सशक्त नारी की प्रगति"
  • "हर पैडल के साथ स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और आत्मनिर्भरता का संदेश"

यह अभियान केवल 1,200 लोगों की संख्या नहीं है, बल्कि यह 1,200 परिवारों में आया हुआ सकारात्मक बदलाव है। डिजिटल सखी परियोजना की इन 20 सखियों ने 53 ग्राम पंचायतों में जिस तरह का नेतृत्व दिखाया है, वह आने वाली पीढ़ी के लिए एक मार्गदर्शक है। गीता कौर, जो इस परियोजना की जॉइंट प्रोग्राम कॉर्डिनेटर हैं, का कहना है कि यह पहल ग्रामीण समाज को न केवल जागरूक, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक बनाने का एक छोटा सा प्रयास है।

बदलाव की एक लंबी यात्रा

डिजिटल सखी परियोजना के माध्यम से जो बीज आज बोया गया है, वह भविष्य में एक बड़ा वटवृक्ष बनेगा। ग्रामीण महिलाओं को अब यह समझ आ गया है कि उनके हाथ में केवल घर का काम नहीं, बल्कि स्मार्टफोन के माध्यम से पूरी दुनिया है। ऑनलाइन भुगतान से लेकर सरकारी योजनाओं तक का सफर अब उनके लिए आसान हो गया है। यह वाकई भावुक कर देने वाला है कि कैसे एक छोटे से गांव की बेटी आज तकनीक की मदद से आत्मनिर्भर बन रही है।

पर्यावरण और डिजिटल साक्षरता का यह मेल भविष्य के लिए एक मिसाल है। जब एक गांव की महिला अपनी साइकिल पर बैठकर पर्यावरण बचाने की बात करती है, तो वह पूरे समाज के लिए एक प्रेरणा बन जाती है। इस रिपोर्ट के माध्यम से हम यही संदेश देते हैं कि बदलाव के लिए बड़े संसाधनों की नहीं, बल्कि बड़े इरादों की जरूरत होती है। डिजिटल सखी परियोजना की यह साइकिल यात्रा इसी इरादे का एक सुंदर प्रमाण है।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

Editor-in-Chief