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वंदे गंगा जल संरक्षण: प्यासी धरती को अब मिलेगी नई संजीवनी

वंदे गंगा जल संरक्षण अभियान से जल स्रोतों का कायाकल्प, जनभागीदारी से प्यासी धरती को बचाने का संकल्प ले रहा है हर एक नागरिक।

By अजय त्यागी
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advertisement13Aug2026%20copy.jpg वंदे गंगा जल संरक्षण अभियान के तहत निरिक्षण

वंदे गंगा जल संरक्षण अभियान के तहत निरिक्षण

कोटपूतली-बहरोड़, राजस्थान (शिंभु सिंह शेखावत)। वंदे गंगा जल संरक्षण की यह पावन गाथा केवल फाइलों में दर्ज सरकारी आंकड़े नहीं, बल्कि उस मिट्टी की पुकार है जो बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रही थी। जब 25 मई से विश्व पर्यावरण दिवस तक के इस महाअभियान का आगाज हुआ, तो लगा जैसे धरती ने एक लंबी सांस ली हो। यह आंदोलन अब केवल सरकारी तंत्र की एक कड़ी नहीं रहा, बल्कि यह हर उस व्यक्ति के हृदय की धड़कन बन चुका है जो आने वाली पीढ़ियों को जल से भरा हुआ समृद्ध संसार देना चाहता है।

जिले के हर कोने में जब वंदे गंगा जल संरक्षण के नारे गूंजते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे नदियाँ और बावड़ियाँ अपनी खोई हुई मुस्कान वापस पा रही हैं। अब तक 5,962 से अधिक गतिविधियों का आयोजन यह दर्शाता है कि जब समाज का हर वर्ग—किसान, युवा, महिलाएं और धार्मिक संगठन—एक साथ कदम बढ़ाता है, तो कोई भी लक्ष्य कठिन नहीं होता। यह सामूहिक शक्ति ही है जो धूल में खोए पारंपरिक जल स्रोतों को जीवनदान दे रही है।

जल स्रोतों का पुनर्जन्म

वंदे गंगा जल संरक्षण अभियान के अंतर्गत 577 जल स्रोतों की सफाई करना मानो किसी मरणासन्न रोगी को नई ऊर्जा देना है। जब लोग अपने हाथों से तालाबों और नहरों की गाद निकालते हैं, तो वे केवल कचरा साफ नहीं कर रहे होते, बल्कि वे अपनी संस्कृति और अपने अस्तित्व को सहेज रहे होते हैं। 363 स्थानों पर हुआ श्रमदान यह साबित करता है कि अब समाज जागरूक हो चुका है और वह समझता है कि जल की एक-एक बूंद हमारी विरासत है।

प्रभात फेरियों और कलश यात्राओं के माध्यम से जो संदेश दिया जा रहा है, वह सीधा रूह को छू जाता है। पीपल पूजन और पौधारोपण के दृश्य यह बताते हैं कि हमारे पूर्वजों ने पर्यावरण को जो सम्मान दिया था, उसे हम फिर से अपना रहे हैं। जब कोई व्यक्ति पेड़ लगाता है, तो वह अपने लिए नहीं, बल्कि आने वाले कल के लिए छाँव और जीवन की आशा लगाता है। यही भावना इस पूरे अभियान को एक भावुक और पावन रूप देती है।

"जल संरक्षण अब केवल एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि यह हमारा नैतिक दायित्व है। हम सब मिलकर अपनी धरती को फिर से हरा-भरा और जलपूर्ण बनाएंगे," दिनेश गुर्जर, वाटरशेड एईएन।

किसानों की नई उम्मीद

वंदे गंगा जल संरक्षण की दिशा में किसानों का योगदान सबसे अनमोल है। जब किसान चौपालों और कार्यशालाओं के जरिए कम पानी में अधिक फसल लेने के तरीके सीखते हैं, तो उनकी आंखों में भविष्य का एक सपना दिखाई देता है। सूक्ष्म सिंचाई और प्राकृतिक खेती के माध्यम से वे न केवल अपना पेट भर रहे हैं, बल्कि धरती माता के गिरते स्वास्थ्य को भी बेहतर कर रहे हैं। यह एक ऐसा प्रेम है जो मिट्टी और इंसान के बीच के अटूट रिश्ते को फिर से जीवित कर रहा है।

जल गौरव सम्मान की पहल उन लोगों के प्रति एक आभार है, जिन्होंने चुपचाप रहकर इस धरती के लिए त्याग किया है। यह सम्मान उन संस्थाओं और पंचायतों को दिया जाएगा जो इस कठिन कार्य में सबसे आगे रहे हैं। ऐसी प्रतिस्पर्धा निश्चित रूप से समाज में एक प्रेरणा का वातावरण बनाएगी, जिससे हर कोई जल बचाने की दौड़ में शामिल होना चाहेगा। यह एक ऐसी होड़ है, जिसमें जीत अंततः मानवता की और हमारे पर्यावरण की होगी।

हरियालो राजस्थान का स्वप्न

वंदे गंगा जल संरक्षण के साथ हरियालो राजस्थान का लक्ष्य 18 लाख पौधों का रोपण करना अपने आप में एक विराट संकल्प है। हर परिवार द्वारा कम से कम एक पौधा लगाकर उसे पालने की जिम्मेदारी लेना, किसी बच्चे को बड़ा करने जैसा भावुक अहसास है। जिस दिन यह अभियान जन-जन का बन जाएगा, उसी दिन राजस्थान की यह मरूभूमि फिर से लहलहा उठेगी। जिला प्रशासन का यह आह्वान हर नागरिक के लिए एक चुनौती है कि क्या हम अपनी धरती के प्रति अपना कर्तव्य निभा सकते हैं।

इस महाअभियान का लक्ष्य केवल पानी बचाना नहीं, बल्कि एक ऐसी संस्कृति पैदा करना है जहाँ जल का दुरुपयोग पाप माना जाए। आने वाले पांच वर्षों में 50 करोड़ पौधे लगाने का जो सपना राज्य सरकार ने देखा है, वह इसी जनआंदोलन की बुनियाद पर खड़ा होगा। हम सभी का यह दायित्व है कि हम इस पवित्र प्रयास को और अधिक ऊंचाइयों पर ले जाएं। इस प्यासी धरती को आपकी एक बूंद और आपके एक पौधे की सख्त जरूरत है।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

Editor-in-Chief