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अस्पताल में भीषण आग: सिस्टम की लापरवाही में राख हुई सांसें

अस्पताल में भीषण आग से मची अफरातफरी, तीन लोगों की दर्दनाक मौत। सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ाने वाली व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल।

By अजय त्यागी
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अस्पताल में भीषण आग

(मुजफ्फरपुर, बिहार)। अस्पताल में भीषण आग की लपटों ने आज एक बार फिर सरकारी तंत्र की खोखली सुरक्षा व्यवस्था को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। एक निजी अस्पताल के आईसीयू वार्ड में लगी आग ने देखते ही देखते कई जिंदगियों को राख के ढेर में बदल दिया। जब अस्पताल के भीतर मरीज जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे, तब वहां मौजूद सुरक्षा प्रबंधों की हकीकत धुएं के गुबार में गुम हो गई। यह हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि उस लापरवाही का जीता-जागता सबूत है जो कागजों पर तो दुरुस्त दिखती है, लेकिन हकीकत में दम तोड़ देती है।[1]

घटना के बाद जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक और नगर आयुक्त जैसे आला अधिकारियों का दल मौके पर पहुंचा, मानो उनकी उपस्थिति से राख हो चुकी सांसें वापस लौट आएंगी। बाहर अपनों को खोने का गम मनाते परिजनों का क्रंदन चीख-चीख कर पूछ रहा था कि आखिर किसकी जवाबदेही तय होगी? क्या अस्पताल के नाम पर चल रहे इन केंद्रों का एकमात्र उद्देश्य केवल मुनाफा कमाना है, या मरीजों की सुरक्षा नाम की कोई चीज भी इन संस्थानों के शब्दकोश में बची है?

मौन है प्रशासनिक तंत्र

डीएम सुब्रत कुमार सेन ने बताया, "आईसीयू में आग लगने के बाद धुएं का गुबार फैल गया, जिसके बाद मरीजों को निकालने का प्रयास किया गया। लोगों के अनुसार, यूनिट के प्रभारी सहित अन्य मरीज गंभीर रूप से घायल हुए हैं। अब तक तीन मौतें हो चुकी हैं।" प्रशासनिक दावों का अपना गणित होता है, लेकिन अपनों को खोने वाले परिवारों के लिए यह गणित बेमानी है। सवाल यह है कि आखिर आईसीयू जैसे संवेदनशील स्थान पर आग बुझाने के कौन से आधुनिक इंतजाम थे, और यदि थे, तो वे नाकाम क्यों रहे?

अस्पताल में भीषण आग के दौरान राहत कार्यों की तस्वीरें भले ही सक्रियता दर्शा रही हों, लेकिन यह सक्रियता हमेशा घटना के बाद ही क्यों जागती है? क्या फायर ऑडिट की औपचारिकताएं केवल फाइलों का पेट भरने के लिए होती हैं? जब अस्पताल जैसी जगहों पर लोग जीवन की उम्मीद लेकर आते हैं, तो उन्हें मौत की आग में झोंक देना यह साबित करता है कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था अभी भी राम भरोसे चल रही है, जहां मौत का आना एक सामान्य घटना बन गई है।

"अब तक तीन मौतें हो चुकी हैं। एक व्यक्ति गंभीर रूप से घायल है जिसे भर्ती कराया गया है। आग लगने का कारण आईसीयू में शॉर्ट सर्किट माना जा रहा है," कांतेंश मिश्र, एसएसपी।

जवाबदेही का अभाव

घटना का समय प्रातः 3:30 से 3:45 के बीच बताया जा रहा है। अस्पताल में भीषण आग लगने का कारण शॉर्ट सर्किट बताया जा रहा है, जो कि आज के समय का सबसे सुविधाजनक और घिसा-पिटा तर्क है। यदि शॉर्ट सर्किट ही कारण था, तो इलेक्ट्रिकल सेफ्टी का सुपरविजन करने वाली एजेंसियां कहां सो रही थीं? 12 से 13 मरीजों को आनन-फानन में अन्य अस्पतालों में शिफ्ट करना पड़ता है, जो यह स्पष्ट करता है कि उस समय अस्पताल में अफरातफरी का आलम क्या रहा होगा।

शॉर्ट सर्किट का यह 'दुष्प्रभाव' आखिर हर बार अस्पताल को ही क्यों निशाना बनाता है? क्या अस्पताल संचालकों की जेबें भारी होने के साथ ही उनकी जिम्मेदारी का एहसास हल्का हो जाता है? मरीजों को शिफ्ट करने का जो 'बचाव अभियान' चला, वह यह बताने के लिए पर्याप्त है कि किसी भी आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए अस्पताल के पास कोई ठोस तैयारी नहीं थी। सरकारी अधिकारियों की मौजूदगी और वहां का शोर-शराबा उन तीन परिवारों की खामोश चीखों को कभी नहीं मिटा पाएगा जिन्होंने आज सिस्टम की लापरवाही में अपने अपनों को खो दिया है।

व्यवस्था पर कटाक्ष

अस्पताल में भीषण आग के इस मंजर ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर केवल इमारतें खड़ी की जा रही हैं। सुरक्षा के नाम पर जो आग बुझाने वाले सिलेंडर दीवारों पर टंगे होते हैं, वे अधिकतर प्रदर्शन की वस्तु बन कर रह जाते हैं। जब आग लगती है, तो वे सिलेंडर या तो काम नहीं करते या उन्हें चलाने वाला कोई नहीं होता। यह कैसी विडंबना है कि जो जगह जीवन देने की जिम्मेदारी लेती है, वही अंत समय में काल का ग्रास बन जाती है।

नेताओं और अधिकारियों के दौरों के बाद एक जांच कमेटी बनेगी, जिसकी रिपोर्ट शायद महीनों तक धूल फांकती रहेगी और फिर एक और हादसा किसी और परिवार को तबाह कर देगा। हम कब तक इन 'शॉर्ट सर्किट' वाले बहानों के पीछे अपनी लाचारी छिपाते रहेंगे? अस्पताल में भीषण आग केवल तारों में नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक तंत्र में लगी है जो घूस और मिलीभगत की राख में तब्दील हो चुका है। जब तक दोषियों को कड़ी सजा नहीं मिलेगी, तब तक ये अस्पताल कसाईखाने बने रहेंगे।

अस्वीकरण

यह रिपोर्ट उपलब्ध तथ्यों और सूचनाओं के आधार पर तैयार की गई है। इसमें किसी व्यक्ति या संस्थान पर लगाए गए आरोप सार्वजनिक प्रतिक्रिया पर आधारित हैं। लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी प्रकार के कानूनी विवाद के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। यह सूचना जनहित में है।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

Editor-in-Chief