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बद्रीनाथ नेशनल हाईवे हादसा: लापरवाही ने ली एक मासूम जान

बद्रीनाथ नेशनल हाईवे हादसा: शुक्रवार की सुबह 17 यात्री शिकार, एक महिला की दर्दनाक मौत और 16 घायल। क्या सुरक्षित है पहाड़ों का यह सफर?

By अजय त्यागी
1 min read
बद्रीनाथ नेशनल हाईवे हादसा

बद्रीनाथ नेशनल हाईवे हादसा

(चमोली, उत्तराखंड)। बद्रीनाथ नेशनल हाईवे हादसा ने एक बार फिर उन कड़वी सच्चाइयों को उजागर कर दिया है, जिन्हें अक्सर विकास के नाम पर कालीन के नीचे दबा दिया जाता है। शुक्रवार की सुबह जब जोशीमठ के समीप यह टेम्पो ट्रैवलर अनियंत्रित होकर पलटा, तो वह केवल एक गाड़ी नहीं पलटी थी, बल्कि उन तमाम दावों की कलई भी खुल गई जो चारधाम यात्रा मार्गों को सुरक्षित बनाने के लिए किए जाते हैं। गाजियाबाद से बद्रीनाथ जा रहे यात्रियों के लिए यह सफर मोक्ष की यात्रा न बनकर एक खौफनाक अंत में बदल गया।(1)

पहाड़ों की टेढ़ी-मेढ़ी सड़कों पर मौत हमेशा दौड़ती रहती है, लेकिन जब बात राष्ट्रीय राजमार्ग की आती है, तो सवाल व्यवस्था पर उठना लाजिमी है। क्या केवल बड़े-बड़े दावों और कागजी सुरक्षा मानकों से यात्रियों की जान बचाई जा सकती है? एक महिला यात्री की मौत के साथ इस हादसे ने 16 अन्य परिवारों के जीवन में जो सन्नाटा घोला है, वह आने वाले समय में भी प्रशासन की कार्यप्रणाली पर एक गहरा प्रश्नचिन्ह बना रहेगा।

सड़कों पर मौत का खेल

पहाड़ों पर सफर करना अब जोखिम का पर्याय बन चुका है, जहां हर मोड़ पर मौत दस्तक देती है। जोशीमठ के पास हुआ यह बद्रीनाथ नेशनल हाईवे हादसा संकेत है कि हमारे सुरक्षा इंतजाम कितने खोखले हैं। जब गाड़ी का संतुलन बिगड़ा, तो शायद चालक ने भी वह नहीं सोचा होगा जो परिणाम निकला। लेकिन असली जिम्मेदारी किसकी है? क्या सड़कों की बदहाल स्थिति को नजरअंदाज करना अब प्रशासन की नई कार्यशैली बन गई है?

जब यात्री गाजियाबाद से बद्रीनाथ के लिए चले थे, तो उनके मन में श्रद्धा का भाव था। उन्हें क्या पता था कि जिस मार्ग पर वे अपनी आस्था के लिए निकल रहे हैं, वही मार्ग उनके लिए काल साबित होगा। सुरक्षा की बातें केवल भाषणों तक सीमित रह जाती हैं, और जब ऐसे हादसे होते हैं, तो फिर से एक जांच कमेटी बिठा दी जाती है। पर उस महिला की जान वापस कौन लाएगा, जो इन औपचारिकताओं के शोर में हमेशा के लिए खो गई?

व्यवस्था की ढुलमुल कार्यशैली

पहाड़ी रास्तों पर हादसों का सिलसिला बदस्तूर जारी है, लेकिन लगता है कि जिम्मेदार कुंभकर्णी नींद में सोए हैं। इस बद्रीनाथ नेशनल हाईवे हादसा को देखकर यही लगता है कि दुर्घटनाएं केवल संयोग नहीं, बल्कि हमारी लापरवाही की परिणति हैं। सड़कों के चौड़ीकरण और निर्माण के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, फिर भी हादसों की संख्या कम होने का नाम नहीं ले रही है।

शासन और प्रशासन की प्राथमिकताएं शायद उन फाइलों में दबी हुई हैं, जो सिर्फ हादसों के बाद ही खोली जाती हैं। यदि समय रहते सुरक्षा के ठोस इंतजाम किए गए होते, तो शायद आज वह महिला अपने परिवार के साथ होती। लेकिन हमारी व्यवस्था को तो शायद किसी बड़े हादसे का ही इंतजार रहता है, तभी तो सुध ली जाती है। 16 घायल लोग अब अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं, और व्यवस्था फिर से अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की तैयारी में है।

सुरक्षा का नामो-निशान गायब

अक्सर देखा गया है कि हादसों के बाद प्रशासन अपनी पीठ थपथपाने में कोई कसर नहीं छोड़ता, लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां करती है। बद्रीनाथ नेशनल हाईवे हादसा के बाद जो स्थिति सामने आई, वह बताती है कि आपातकालीन स्थिति में बचाव कार्य और सुरक्षा की मुस्तैदी केवल बातों में है। जब पहाड़ों में सड़कें ही सुरक्षित नहीं होंगी, तो तीर्थयात्री क्या खाक सुरक्षित महसूस करेंगे?

यात्रा मार्ग पर जगह-जगह सुरक्षा बोर्ड लगाने से दुर्घटनाएं नहीं रुकतीं। इसके लिए जमीनी स्तर पर काम करना पड़ता है, जो कि यहाँ नदारद दिखता है। प्रशासन की 'सख्त' होने की खबरें सिर्फ मीडिया की सुर्खियां बन कर रह जाती हैं, जबकि हकीकत में सड़कों पर आज भी मौत का तांडव जारी है। क्या यही वह आधुनिक उत्तराखंड है जिसका सपना दिखाया गया था? एक ऐसी यात्रा जहाँ पहुँचने की गारंटी तो है, पर सुरक्षित वापसी की नहीं।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

Editor-in-Chief