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अंतरराष्ट्रीय

इजरायल का ईरान पर हमला और अमेरिका के साथ तनाव

इजरायल ने ईरान पर हवाई हमले कर शांति वार्ता को लेकर अमेरिका को कड़ा संदेश दिया है। नेतनयाहू सरकार ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा हितों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाए

By अजय त्यागी
1 min read
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

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येरुशलम, इजरायल। इजरायल ने सोमवार को ईरान पर नए सिरे से हवाई हमले शुरू कर ट्रम्प प्रशासन की शांति वार्ता रणनीति को बड़ी चुनौती दी है। अमेरिका द्वारा बार-बार शांति बनाए रखने और संयम बरतने की सार्वजनिक अपील के बावजूद, इजरायल ने ईरान के खिलाफ यह सैन्य कदम उठाया है। यह घटनाक्रम तब हुआ जब ईरान ने लेबनान की राजधानी में इजरायली हमलों के जवाब में मिसाइलें दागीं। इजरायल ने इन हमलों के जरिए वाशिंगटन को यह स्पष्ट संदेश देने का प्रयास किया है कि यदि उनकी सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज किया गया, तो शांति समझौता संभव नहीं होगा।[1]

सैन्य इतिहासकारों के अनुसार, इजरायल ने यह दर्शाया है कि यदि ईरान के साथ किसी भी समझौते में इजरायल के हितों को कुचला गया, तो वे वार्ता की मेज को पलटने की पूरी क्षमता रखते हैं। रायटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, हेब्रू विश्वविद्यालय के सैन्य इतिहासकार डैनी ओरबैक का मानना है कि इजरायल ने एक कड़ा कूटनीतिक रुख अख्तियार किया है। अमेरिका का ट्रम्प प्रशासन अब तक इजरायल को ईरान के साथ चल रही शांति वार्ता से अलग रखने की कोशिश कर रहा है, जो इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतनयाहू के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।

वार्ता में इजरायल की भूमिका

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, जिन्होंने फरवरी में इजरायल के साथ मिलकर युद्ध शुरू किया था, अब ईरान के साथ एक समझौते तक पहुंचने के लिए प्रयासरत हैं। इस प्रक्रिया में इजरायल को शामिल न करना नेतनयाहू सरकार के लिए कूटनीतिक संकट पैदा कर रहा है। नेतनयाहू को घरेलू स्तर पर आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है, जहां आलोचक उन पर आरोप लगा रहे हैं कि वे अमेरिकी दबाव में इजरायली संप्रभुता से समझौता कर रहे हैं। ईरान ने भी स्पष्ट किया है कि जब तक लेबनान में संघर्ष विराम प्रभावी नहीं होगा, वह वाशिंगटन के साथ कोई शांति समझौता नहीं करेगा।

रिपोर्ट के अनुसार, पिछले सप्ताह बेरुत में इजरायली हवाई हमलों को नेतनयाहू ने ट्रम्प के साथ फोन कॉल के बाद रद्द कर दिया था। खबरों के अनुसार, उस दौरान दोनों नेताओं के बीच तीखी बातचीत हुई थी, जिसमें ट्रम्प ने नेतनयाहू के लिए आपत्तिजनक शब्दों का भी उपयोग किया था। हालांकि, ट्रम्प का मानना है कि इजरायल और ईरान दोनों ने अपने 'हमले के दौर' पूरे कर लिए हैं और अब और अधिक तनाव की आवश्यकता नहीं है। इसके बावजूद, इजरायल ने यह तय किया है कि उसे अपनी रक्षा रणनीति खुद तय करनी होगी ताकि ईरान भविष्य में लेबनान के मामलों में दखल न दे सके।

सुरक्षा और रणनीतिक लक्ष्य

रिपोर्ट के अनुसार, एक वरिष्ठ इजरायली रक्षा अधिकारी के अनुसार, ईरान के हमलों को इजरायल पर जवाबी कार्रवाई के रूप में स्वीकार करना तेल अवीव के लिए असंभव था। इसी उद्देश्य को लेकर नेतनयाहू ने सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलाई, जिसमें लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ सैन्य अभियान जारी रखने और अपनी सेना को तैनात रखने के लक्ष्यों पर चर्चा की गई। इजरायल चाहता है कि भविष्य में होने वाला कोई भी अमेरिकी-ईरान समझौता इजरायल के उन अधिकारों को सीमित न करे, जिनके तहत वह हिजबुल्लाह के ठिकानों पर हमला कर सके।

नेतनयाहू ने सोमवार रात को इजरायल की जनता को संबोधित करते हुए कहा कि यदि ईरान फिर से उन पर हमला करता है, तो इजरायल पूरी ताकत के साथ जवाबी कार्रवाई करेगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प का सम्मान करते हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में वे कोई समझौता नहीं कर सकते। इजरायली नेतृत्व अब इस कशमकश में है कि ट्रम्प की शांति नीति और इजरायल की सैन्य आवश्यकता के बीच संतुलन कैसे बिठाया जाए। निजी तौर पर नेतनयाहू ने माना है कि ईरान पर ट्रम्प के नजरिए को प्रभावित करना उनके लिए चुनौतीपूर्ण है।

सैन्य क्षमता और चुनौतियां

इजरायल के पास ईरान पर हमला करने की तकनीकी क्षमता मौजूद है, लेकिन सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि बिना अमेरिकी समर्थन के इस हवाई अभियान को लंबे समय तक जारी रखना व्यावहारिक नहीं है। इजरायल इंस्टीट्यूट फॉर नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज के वरिष्ठ शोधकर्ता येहोशुआ कालिसकी ने कहा कि गोला-बारूद की खपत और रसद आपूर्ति के मामले में इजरायल लंबे युद्ध के लिए पूरी तरह से आत्मनिर्भर नहीं है। ट्रम्प के साथ तनाव के बावजूद, इजरायल को अंततः वाशिंगटन के आशीर्वाद और निरंतर समर्थन की आवश्यकता बनी रहेगी।

इजरायल की हालिया सैन्य सक्रियता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह मध्य पूर्व के शांति समझौते में केवल एक दर्शक बनकर नहीं रहेगा। नेतनयाहू सरकार यह सुनिश्चित करने में जुटी है कि ईरान के साथ होने वाला कोई भी संभावित समझौता इजरायल की सुरक्षात्मक कार्रवाइयों को बाधित न करे। अब देखना यह है कि ट्रम्प प्रशासन इजरायल की इस अवज्ञा पर क्या प्रतिक्रिया देता है और क्या शांति वार्ता की मेज पर इजरायल को स्थान मिल पाता है या नहीं।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसी एवं स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचनात्मक उद्देश्य से किया गया है। अंतरराष्ट्रीय राजनयिक घटनाक्रम और सैन्य संघर्ष से संबंधित यह जानकारी वर्तमान विश्लेषण पर आधारित है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक उत्तरदायी नहीं हैं।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

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