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विकलांगता को दी मात, ब्रजेश बने प्रेरणा, बच्चों को दे रहे मुफ्त शिक्षा

गया के ब्रजेश कुमार ने हादसे में अपने दोनों हाथ खोने के बावजूद हार नहीं मानी है। वे आज अपने पैरों से लिखकर और बच्चों को पढ़ाकर समाज के लिए एक बड़ी प्रेरणा बन गए ह

By अजय त्यागी
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गया के ब्रजेश कुमार बच्चो को पढ़ाते हुए

गया, बिहार। गया जिले के केंदुआ गांव के रहने वाले ब्रजेश कुमार की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है। जीवन में आए भीषण संकट और दोनों हाथ खो देने जैसी त्रासदी के बावजूद ब्रजेश का हौसला और आत्मविश्वास अडिग है। आज ब्रजेश कुमार अपनी मेहनत और संकल्प के दम पर न केवल अपना जीवन संवार रहे हैं, बल्कि दर्जनों बच्चों को शिक्षित कर उनके भविष्य को भी नई दिशा दे रहे हैं। उनकी यह प्रेरणादायक यात्रा उन सभी के लिए एक बड़ा सबक है जो छोटी कठिनाइयों में ही हिम्मत हार जाते हैं।[1]

ब्रजेश की प्रेरणादायक जीवनगाथा उन हजारों दिव्यांगजनों के लिए एक मिसाल है जो समाज में सम्मान और अवसर की तलाश में हैं। वे अपने पैरों का उपयोग करके न केवल लिखने का काम करते हैं, बल्कि मोबाइल चलाने और व्हाइटबोर्ड पर गणित के कठिन सवालों को हल करने जैसे जटिल कार्य भी कुशलतापूर्वक कर लेते हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि यदि व्यक्ति में दृढ़ इच्छाशक्ति हो, तो कोई भी शारीरिक बाधा उसके सपनों को पूरा करने से नहीं रोक सकती।

शिक्षण के जरिए सेवा

ब्रजेश के पास वर्तमान में पहली से दसवीं कक्षा तक के दर्जनों छात्र पढ़ते हैं। वे व्हाइटबोर्ड पर मार्कर से लिखने के लिए अपने कटे हुए हाथ के सिरे पर रबर बैंड की मदद लेते हैं और बेहद खूबसूरती से अक्षर उकेरते हैं। उनके छात्र बताते हैं कि ब्रजेश का पढ़ाने का तरीका इतना प्रभावी है कि वे अपनी पढ़ाई में लगातार बेहतर कर रहे हैं। ब्रजेश का मानना है कि भले ही नियति ने उन्हें शारीरिक रूप से सीमित कर दिया हो, लेकिन मानसिक रूप से वे पूरी तरह सक्षम हैं।

ब्रजेश कुमार ने बताया कि वे मूल रूप से एक मेधावी छात्र थे और इंजीनियर बनने का सपना देखते थे। साल 2015 में 11,000 वोल्ट के करंट की चपेट में आने के कारण उन्हें गंभीर चोटें आईं और अंततः इलाज के दौरान उनके दोनों हाथ काटने पड़े। इस हादसे के बाद पांच साल तक उन्होंने लंबा और पीड़ादायक उपचार झेला। इस दौरान उन्होंने अपने पैरों और सिर में गंभीर चोटों का भी सामना किया, लेकिन उनकी पढ़ने की ललक कभी कम नहीं हुई।

"मैं फोन इस्तेमाल करने से लेकर लिखने और पढ़ने तक का हर काम बिना किसी परेशानी के कर सकता हूं। मुझे केवल इस बात का दुख है कि मैं अपनी मां को नहीं बचा सका," ब्रजेश कुमार।

संघर्ष और सपनों की उड़ान

ब्रजेश के पिता एक छोटे किसान हैं और परिवार का भरण-पोषण करने के लिए मजदूरी भी करते हैं। मां के देहांत के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था, लेकिन ब्रजेश ने हार नहीं मानी। साल 2023 में उन्होंने अपनी इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की और वर्तमान में वे स्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं। आर्थिक तंगी के बावजूद वे न केवल खुद पढ़ रहे हैं, बल्कि गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देकर उनके भविष्य को सुरक्षित बनाने की प्रेरणा दे रहे हैं।

ब्रजेश अब भी अपनी स्थिति सुधारने के लिए नौकरी की तलाश में हैं। हालांकि, उन्हें अक्सर इसलिए खारिज कर दिया जाता है क्योंकि उनके दोनों हाथ नहीं हैं। लोग उनसे पूछते हैं कि वे काम कैसे करेंगे। इस पर ब्रजेश का कहना है कि लोग उनकी शारीरिक अक्षमता को देखते हैं, लेकिन वे यह नहीं जानते कि दृढ़ संकल्प वाले लोग असंभव को भी संभव बना सकते हैं। ब्रजेश को विश्वास है कि एक न एक दिन उनका इंजीनियर बनने का सपना जरूर पूरा होगा।

एक योद्धा का जज्बा

ब्रजेश का जीवन यह सिखाता है कि प्रेरणा किसी बाहरी स्रोत से नहीं, बल्कि भीतर की शक्ति से आती है। वे आज खाना पकाने के अलावा लगभग हर काम अपने पैरों से कुशलतापूर्वक कर लेते हैं। उन्होंने अपनी शारीरिक सीमाओं को अपनी कमजोरी नहीं बल्कि अपनी एक अलग पहचान बना लिया है। उन्होंने सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों से अपील की है कि उनके मामले पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाए ताकि वे समाज में अपनी जगह बना सकें।

अंत में, ब्रजेश कुमार का जीवन उन सभी के लिए एक मार्गदर्शक है जो किसी न किसी कारण से अपने सपनों से दूर हो रहे हैं। उनकी निरंतर कोशिशें और शिक्षा के प्रति समर्पण यह दर्शाता है कि इंसान अपने हौसलों से इतिहास रच सकता है। ब्रजेश की यह प्रेरणा अब केवल उनके गांव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हर उस व्यक्ति के लिए एक उम्मीद की किरण है जो जीवन की मुश्किलों को पार करना चाहता है।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसी एवं स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचनात्मक उद्देश्य से किया गया है। ब्रजेश कुमार के मामले में सरकारी योजनाओं के लाभ एवं रोजगार के अवसरों के संबंध में निर्णय संबंधित विभाग के नियमों पर आधारित होगा। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक उत्तरदायी नहीं हैं।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

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