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जंगलों में मचानों पर रात गुजारने को मजबूर सैकड़ों बेबस ग्रामीण

गहराते आदिवासी वन्यजीव संघर्ष के कारण सुदूर जंगलों में सैकड़ों बेबस ग्रामीण जंगली हाथियों के जानलेवा हमलों से बचने के लिए मचानों पर रातें गुजार रहे है।

By अजय त्यागी
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मचानों पर रात गुजारने को मजबूर सैकड़ों बेबस ग्रामीण

कन्याकुमारी, तमिलनाडु। पश्चिमी घाट की तलहटी में बसे सुदूर वन क्षेत्रों में इन दिनों हालात बेहद चिंताजनक हो चुके हैं। यहाँ के थोट्टामलाई और मारामलाई जैसे बेहद दुर्गम आदिवासी इलाकों में रहने वाले सैकड़ों बेबस ग्रामीण हर रात खौफ के साए में जीने को मजबूर हैं। हिंसक वन्यजीवों के लगातार बढ़ते जानलेवा हमलों के कारण इन लोगों का सामान्य जनजीवन पूरी तरह से पटरी से उतर गया है।

इस भयानक खतरे के बीच जंगलों में रहने वाले इन मूल निवासियों को अपनी जान और कीमती संपत्ति की रक्षा करने के लिए बेहद कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। इस इलाके में रहने वाले सैकड़ों बेबस ग्रामीण अब अपने ही पक्के घरों को छोड़कर रात के समय पेड़ों पर बनाए गए ऊंचे बांस के मचानों में सोने को मजबूर हो गए हैं।[विडियो]

गहराता स्थानीय संकट

जून दो हजार छब्बीस के मध्य में पेचीपराई के पास स्थित थोट्टामलाई जैसे सुदूर आदिवासी बस्तियों में अचानक से भारी दहशत फैल गई। जंगलों से निकलकर बस्तियों की तरफ आने वाले जंगली हाथियों और अन्य खतरनाक हिंसक जानवरों के सीधे प्रवेश के तात्कालिक खतरे ने यहां रह रहे सैकड़ों बेबस ग्रामीण परिवारों को एक बेहद डरावने और असुरक्षित माहौल में धकेल दिया है।

अपनी रक्षा के लिए इन परिवारों ने आनन-फानन में अस्थायी मचानों का निर्माण किया ताकि वे हिंसक वन्यजीवों की रात्रिकालीन घुसपैठ से सुरक्षित रह सकें। इस जानलेवा खतरे के साथ-साथ इन सुदूर गांवों में बुनियादी ढांचे की भारी कमी है, जहां खराब सड़कें, पीने के साफ पानी की अनुपलब्धता और बेहद लचर स्वास्थ्य सुविधाएं इन लोगों की इस दर्दनाक स्थिति को और अधिक गंभीर बना देती हैं।

चुनावी बहस का मुद्दा

तमिलनाडु में अप्रैल दो हजार छब्बीस के दौरान संपन्न हुए राज्य विधानसभा चुनावों में भी यह गंभीर मानवीय मुद्दा राजनीतिक और सार्वजनिक चर्चाओं के केंद्र में रहा था। मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ते इस नकारात्मक और हिंसक टकराव के मुद्दे ने चुनाव के दौरान एक बहुत बड़ा रूप ले लिया था, जिससे सियासी गलियारों में काफी तीखी बहस देखने को मिली थी।

कन्याकुमारी के साथ-साथ दक्षिणी पश्चिमी घाट के अन्य प्रमुख जिलों जैसे तिरुनेलवेली और तेनकासी में भी बगान श्रमिकों और स्थानीय किसानों ने सरकार से दीर्घकालिक शमन नीतियां बनाने की पुरजोर मांग की थी। इस विकट मानवीय संकट के बीच न्याय की गुहार लगाते सैकड़ों बेबस ग्रामीण चुनावी माहौल में वोटरों के बीच अपनी सुरक्षा को लेकर एक बहुत बड़ा और गंभीर सवाल बनकर उभरे थे।

सरकारी आंकड़ों का सच

वन विभाग द्वारा जनवरी दो हजार छब्बीस के अंत में आयोजित एक आधिकारिक वन्यजीव कार्यशाला के दौरान राज्य के बेहद चौंकाने वाले और डराने वाले आंकड़े जारी किए गए थे। इन आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार पिछले दस वर्षों की ट्रैकिंग अवधि के दौरान वन्यजीवों के साथ हुए हिंसक संघर्षों के कारण कुल छह सौ पचासी लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है।

इस सरकारी मूल्यांकन रिपोर्ट में भी कन्याकुमारी को औपचारिक रूप से एक अत्यधिक संवेदनशील और उच्च जोखिम वाले संघर्ष क्षेत्र के रूप में दर्ज किया गया था। इस रिपोर्ट में राज्य सरकार की तरफ से ड्रोन निगरानी और बेहतर सुरक्षा घेरा बनाने जैसी तत्काल और प्रभावी व्यवस्थाएं लागू करने की सख्त आवश्यकता भी रेखांकित की गई थी।

प्रशासनिक स्तर पर प्रयास

वन विभाग और स्थानीय प्रशासन इस गंभीर मानवीय संकट को दूर करने के लिए लगातार प्रयास करने का दावा कर रहे हैं। जंगलों के संवेदनशील सीमाओं पर सुरक्षात्मक उपाय बढ़ाने और वन्यजीवों की बस्तियों में आवाजाही को रोकने के लिए आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल पर विचार किया जा रहा है ताकि आम जनता को इस भयानक खौफ से मुक्ति मिल सके।

"तमिलनाडु वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार: कन्याकुमारी जिला वर्तमान में वन्यजीवों के अत्यधिक संवेदनशील संघर्ष क्षेत्र के रूप में दर्ज है, जहां ड्रोन निगरानी और सुरक्षा घेरा बनाने जैसे कदमों की बेहद सख्त जरूरत है।"

लेकिन धरातल पर मौजूदा परिस्थितियों के अनुसार सुदूर पहाड़ी और वन क्षेत्रों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम न होने के कारण यह गंभीर संकट लगातार विकराल होता जा रहा है। हिंसक जानवरों के डर से जंगलों में छिपने को मजबूर सैकड़ों बेबस ग्रामीण अब भी सरकार और प्रशासन से किसी ऐसे स्थाई और ठोस समाधान की उम्मीद लगाए बैठे हैं जिससे वे अपने ही घरों में बिना किसी जानलेवा खौफ के शांति से सो सकें।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसी एवं स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचनात्मक उद्देश्य से किया गया है। तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले के वन क्षेत्रों में आदिवासियों और वन्यजीवों के बीच जारी जमीनी संघर्ष की प्रामाणिक जानकारी लोकहित में प्रस्तुत की गई है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक उत्तरदायी नहीं हैं।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

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