राजनीतिक हलचल तेज, पार्टी के बैंक खाते फ्रीज होने से मचा हड़कंप
एक निजी बैंक में जमा 440 करोड़ रुपये के भारी फंड वाले तृणमूल कांग्रेस के तीन बैंक खातों पर पुलिस ने रोक लगा दी है जिससे पार्टी के बैंक खाते फ्रीज हो चुके हैं।
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India
कोलकाता, पश्चिम बंगाल। देश की राजनीति में उस समय भूचाल आ गया जब जांच एजेंसियों ने सत्ताधारी दल के खिलाफ एक बेहद सख्त कदम उठाया। साइबर पुलिस ने एक निजी क्षेत्र के बैंक को पत्र लिखकर तृणमूल कांग्रेस के तीन सक्रिय खातों से होने वाले सभी तरह के डेबिट लेनदेन पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने का निर्देश दिया है। इस बड़ी वित्तीय कार्रवाई के बाद राज्य में राजनीतिक सरगर्मी चरम पर पहुंच गई है, क्योंकि करोड़ों रुपये के लेन-देन वाले पार्टी के बैंक खाते फ्रीज होने से विपक्षी और सत्ता पक्ष के बीच तकरार बढ़ गई है। पुलिस सूत्रों के अनुसार, इन खातों की गहनता से जांच की जा रही है। [1]
इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब पूर्व कोषाध्यक्ष अरूप बिस्वास ने संबंधित बैंक के शाखा प्रबंधक को एक पत्र लिखकर इन खातों को फ्रीज करने का आग्रह किया था। उन्होंने आशंका जताई थी कि उनके हस्ताक्षर वाले कुछ अप्रयुक्त या कोरे चेकों का गलत इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके तुरंत बाद निष्कासित विधायक रीताब्रत बनर्जी के नेतृत्व में बागी विधायकों ने बिधाननगर साइबर अपराध पुलिस स्टेशन में एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। इसी शिकायत पर त्वरित एक्शन लेते हुए पुलिस ने कार्रवाई की जिससे पार्टी के बैंक खाते फ्रीज करने की नौबत आई।
खातों में करोड़ों का फंड
बागी विधायकों ने अपनी शिकायत में तीनों निजी बैंक खातों की संख्या का स्पष्ट उल्लेख करते हुए आरोप लगाया था कि सत्ता के दुरुपयोग के माध्यम से इन खातों में अपारदर्शी स्रोतों से भारी मात्रा में धन जमा किया गया है। पुलिस सूत्रों के अनुसार, बैंक प्रशासन ने जांचकर्ताओं को सूचित किया है कि इन तीनों विवादित खातों में कुल 440 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि जमा है। पुलिस अधिकारियों ने डिजिटल साक्ष्यों को नष्ट होने या ट्रांसफर होने से बचाने के लिए कानूनी औपचारिकताएं पूरी करते हुए बैंक में पार्टी के बैंक खाते फ्रीज करा दिए हैं।
डेबिट फ्रीज लागू होने का सीधा अर्थ यह है कि इन खातों से होने वाले सभी बाहरी वित्तीय लेनदेन को पूरी तरह से रोक दिया गया है। हालांकि इन खातों में पैसे जमा करने की अनुमति रहेगी, लेकिन किसी भी प्रकार की नकद निकासी, फंड ट्रांसफर, डेबिट कार्ड लेनदेन और स्वचालित बिल भुगतानों पर पूरी तरह प्रतिबंध रहेगा। इस कड़े फैसले के बाद पार्टी के रोजमर्रा के राजनीतिक खर्चों और चुनावी प्रबंधन पर गहरा असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है, जो वर्तमान समय में पार्टी के बैंक खाते फ्रीज होने से उत्पन्न हुई है।
"इन खातों में मौजूद पैसों की वैधता और उनके वास्तविक स्रोतों की व्यापक जांच होनी चाहिए। हम चाहते हैं कि इस पूरे मामले की पूरी निष्पक्षता से गहन जांच हो ताकि सच्चाई जनता के सामने आ सके।" : संदीपन साहा, बागी तृणमूल कांग्रेस विधायक खेमे के प्रमुख सदस्य
गहन जांच की मांग
इस संवेदनशील मामले में अब पुलिस अपनी जांच का दायरा बढ़ाने की तैयारी कर रही है। आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि इन तीन खातों के अलावा तृणमूल कांग्रेस के अन्य बैंक खातों का पता लगाने के प्रयास भी तेज कर दिए गए हैं। बागी विधायकों का तर्क है कि पारदर्शी लोकतंत्र के लिए राजनीतिक दलों के फंड का साफ-सुथरा होना अनिवार्य है। इस बीच, पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के समर्थक और विधायक कुणाल घोष ने कहा है कि वह इस पूरे घटनाक्रम से पूरी तरह वाकिफ हैं और इस मुद्दे पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इतनी बड़ी राशि के खातों पर लगी यह पाबंदी आने वाले दिनों में एक बड़ा कानूनी रूप ले सकती है। चूंकि मामला सीधे तौर पर 440 करोड़ रुपये की अवैध फंडिंग की आशंका से जुड़ा है, इसलिए वित्तीय अपराध शाखा भी इसमें शामिल हो सकती है। इसके साथ ही पार्टी के बैंक खाते फ्रीज होने का यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर तूल पकड़ता जा रहा है। जांच एजेंसियां अब बैंक से इन खातों के पिछले पांच वर्षों के विस्तृत स्टेटमेंट और उनके केवाईसी दस्तावेजों की मांग कर रही हैं ताकि फंड के असली मालिकों का पर्दाफाश हो सके।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसी एवं स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचनात्मक उद्देश्य से किया गया है। बैंक खातों के अंतिम ऑडिट, साइबर पुलिस की अंतिम चार्जशीट, संबंधित न्यायालय के दिशा-निर्देशों और तृणमूल कांग्रेस द्वारा जारी किए जाने वाले आधिकारिक पक्ष से संबंधित किसी भी प्रामाणिक विवरण के लिए बिधाननगर पुलिस और संबंधित बैंक द्वारा जारी आधिकारिक सूचनाओं को ही अंतिम आधार मानें। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक उत्तरदायी नहीं हैं।