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गोमूत्र से बिजली का निर्माण कर गौशाला ने चलाई अनोखी घड़ी

गोमूत्र से बिजली का निर्माण करके एक गौशाला ने एक घड़ी को सफलतापूर्वक चलाकर पारंपरिक संसाधनों के अनूठे और व्यावहारिक उपयोग की एक अद्भुत मिसाल पेश की है।

By अजय त्यागी
1 min read
Advertisement002309202602.jpg advertisement13Aug2026%20copy.jpg गौमूत्र से चलाई घडी

गौमूत्र से चलाई घडी

एलूरु, आंध्र प्रदेश। देश की सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक विज्ञान के अनूठे संगम का एक दिलचस्प नजारा सामने आया है। जिले के उंगुशुरू मंडल के नाचुगुंटा गांव में स्थित श्री गोपाल कृष्ण गौशाला ने बिना किसी पारंपरिक बैटरी, बिजली या सौर ऊर्जा के केवल गाय के मूत्र का उपयोग करके एक घड़ी को बिजली देने का अनोखा तरीका प्रदर्शित किया है। यह अनूठा आविष्कार इन दिनों लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र बना हुआ है क्योंकि इसमें एक साधारण इलेक्ट्रोकेमिकल सेटअप के जरिए पर्याप्त ऊर्जा पैदा की जा रही है। [1]

गौशाला के प्रतिनिधियों ने बताया कि गोमूत्र से बिजली का निर्माण का यह पूरा सिस्टम गोमूत्र को एक इलेक्ट्रोलाइट के रूप में उपयोग करके काम करता है। इस पूरे प्रयोग को तैयार करने के लिए दो प्लास्टिक के बर्तनों की आवश्यकता होती है, जिनमें से प्रत्येक में एक-एक लीटर गोमूत्र भरा जाता है। इसके बाद एक बर्तन में तांबे की रॉड और दूसरे बर्तन में जिंक की रॉड डाली जाती है। एक बर्तन की तांबे की रॉड को एक तार के माध्यम से दूसरे बर्तन की जिंक रॉड से जोड़ दिया जाता है।

काम करने का तरीका

इसके बाद बचे हुए जिंक और तांबे के टर्मिनलों को सीधे घड़ी के दोनों सिरों से जोड़ दिया जाता है। गौशाला के प्रतिनिधि परिमी वेंकट राघवलु और गद्दे वेंकट रत्नजी ने बताया कि गोमूत्र में डूबे तांबे और जस्ता के इलेक्ट्रोड द्वारा उत्पन्न विद्युत रासायनिक प्रतिक्रिया से इतनी विद्युत ऊर्जा पैदा होती है कि घड़ी बिना रुके काम करने लगती है। इस प्रकार गोमूत्र से बिजली का निर्माण किया जा सकता है। यह सरल प्रणाली विज्ञान के बुनियादी सिद्धांतों पर आधारित है जो पर्यावरण के अनुकूल है।

"एक बार जब दोनों बर्तनों को गोमूत्र से भरकर सही तरीके से जोड़ दिया जाता है, तो घड़ी तुरंत काम करना शुरू कर देती है। एक बार भरा गया गोमूत्र इस इलेक्ट्रोलाइट को बदलने की आवश्यकता से पहले घड़ी को लगभग चौदह दिनों तक लगातार चलाए रखता है।" — परिमी वेंकट राघवलु, प्रतिनिधि

तकनीकी पहलू

यह सफल प्रदर्शन एक साधारण गैल्वेनिक सेल के सिद्धांत को उजागर करता है, जहां इलेक्ट्रोलाइट में डूबी दो अलग-अलग धातुएं एक छोटा इलेक्ट्रिक करंट उत्पन्न करती हैं। इस व्यवस्था में गोमूत्र पूरी तरह इलेक्ट्रोलाइट का कार्य करता है जो तांबे और जिंक इलेक्ट्रोड के बीच रासायनिक प्रतिक्रिया को सुगम बनाता है। हालांकि इस रासायनिक प्रक्रिया से उत्पन्न बिजली की मात्रा केवल क्वार्ट्ज घड़ी जैसे कम बिजली वाले उपकरणों के लिए ही पर्याप्त है।

इसके बावजूद आसानी से उपलब्ध प्राकृतिक सामग्रियों का उपयोग करके वैकल्पिक ऊर्जा उत्पादन के एक उदाहरण के रूप में इस प्रयोग ने गौशाला में आने वाले आगंतुकों का ध्यान खींचा है। गौशाला के प्रतिनिधियों का कहना है कि इस अनूठी पहल का मुख्य उद्देश्य सरल वैज्ञानिक सिद्धांतों के माध्यम से पारंपरिक संसाधनों के अभिनव और सतत अनुप्रयोगों के बारे में समाज में जागरूकता को बढ़ावा देना है। इस प्रकार गोमूत्र से बिजली का निर्माण करने का यह छोटा सा प्रयास आने वाले समय में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए आत्मनिर्भरता का एक नया जरिया बन सकता है।

अस्वीकरण (Disclaimer): 

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचनात्मक उद्देश्य से किया गया है। किसी भी प्रकार के वैज्ञानिक या विद्युत रासायनिक प्रयोगों को करते समय संबंधित सुरक्षा मानकों और विशेषज्ञों की देखरेख का विशेष ध्यान रखें। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक उत्तरदायी नहीं हैं।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

Editor-in-Chief
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