हाथियों का संरक्षण जरूरी, घटते जंगल और बढ़ता टकराव बढ़ा रहा चिंता
भारत में हाथियों की संख्या करीब 22,514 आंकी गई है, लेकिन आवास टूटने, बिजली, रेल हादसों और बढ़ते मानव हाथी संघर्ष से हाथियों का संरक्षण चुनौती बन गया है।
प्रतीकात्मक फोटो
कोलकाता, पश्चिम बंगाल। भारत में सरकार ने हाथियों का संरक्षण करने की प्रतिबद्धता जताई है, लेकिन एक हालिया रिपोर्ट ने जमीनी चुनौतियों की गंभीर तस्वीर सामने रखी है। IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में जंगलों के टूटने, खनन, सड़क और रेलवे निर्माण तथा मानव हाथी संघर्ष को बड़ी चिंता बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हाथियों की अनुमानित संख्या 22,514 है। ऐसे में हाथियों का संरक्षण अब सिर्फ जंगल बचाने तक सीमित मुद्दा नहीं रह गया है। [1]
हाथियों पर संकट
वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने पहली बार डीएनए आधारित देशव्यापी गणना के जरिए हाथियों की आबादी का आकलन किया है। रिपोर्ट के अनुसार वास्तविक संख्या 18,255 से 26,645 के बीच हो सकती है। पश्चिमी घाट में कॉफी और चाय के बढ़ते बागान, खेतों में बाड़, अतिक्रमण और विकास परियोजनाओं ने हाथियों के पुराने रास्तों को प्रभावित किया है। जंगलों के बीच संपर्क टूटने से हाथियों की आवाजाही मुश्किल हो रही है और वे ऐसे इलाकों में पहुंच रहे हैं जहां इंसानों के साथ उनका संपर्क पहले कम रहा था।
पूर्व मध्य क्षेत्र और पूर्वोत्तर में भी हालात आसान नहीं बताए गए हैं। खनन, हाईवे और दूसरी रैखिक परियोजनाओं के कारण कई इलाकों में हाथियों का प्राकृतिक आवास बिखर रहा है। इसके साथ ही बाहरी वनस्पतियों का फैलाव और बढ़ता मानवीय इस्तेमाल भी समस्या बढ़ा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक लंबे समय तक सुरक्षित रहने के लिए हाथियों के आवासों के बीच संपर्क बनाए रखना जरूरी है। हाथियों का संरक्षण तभी मजबूत होगा जब जंगलों के बचे हिस्सों को सुरक्षित गलियारों के जरिए आपस में जोड़ा जा सके।
बढ़ता मानव दबाव
रिपोर्ट में बिजली का करंट और रेलवे ट्रैक पर होने वाली टक्कर को हाथियों की मौत की बड़ी वजहों में शामिल किया गया है। खनन और हाईवे निर्माण भी उनके आवास और आवाजाही पर असर डाल रहे हैं। दूसरी तरफ कई जगह इंसानों और हाथियों के बीच टकराव बढ़ रहा है। हाल के समय में हाथियों और उनके बच्चों पर इंसानों के हमलों की तस्वीरें और वीडियो भी सामने आए हैं। इनमें धारदार हथियारों, पटाखों और आग के इस्तेमाल जैसी घटनाएं चिंता बढ़ाती हैं और संरक्षण व्यवस्था के सामने गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक केवल जंगल बचाना पर्याप्त नहीं होगा। हाथियों के लिए सुरक्षित कॉरिडोर मजबूत करने, बिजली लाइनों और दूसरी रैखिक परियोजनाओं के जोखिम घटाने तथा कानून का बेहतर पालन कराने की जरूरत है। स्थानीय लोगों को भी संरक्षण की प्रक्रिया में शामिल करना अहम माना गया है। हाथियों की मौजूदगी वाले क्षेत्रों और नए इलाकों में जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत बताई गई है। साथ ही अलग अलग राज्यों में मुआवजे की व्यवस्था को अधिक समान और प्रभावी बनाने की बात भी रिपोर्ट में सामने आई है।
बचाव की राह
केंद्रीय वन मंत्री भूपेंद्र यादव ने विश्व हाथी दिवस पर कहा कि भारत में 14 राज्यों में 33 हाथी रिजर्व और 150 वैज्ञानिक रूप से मान्य हाथी गलियारे हैं। उन्होंने हाथियों और लोगों के साझा भविष्य को सुरक्षित करने पर जोर दिया। उनके मुताबिक आबादी की निगरानी के बेहतर तरीकों और मानव हाथी संघर्ष कम करने के उपायों से संरक्षण को मजबूती मिल रही है। वहीं केंद्रीय राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने कहा कि दुनिया के जंगली एशियाई हाथियों की करीब 60 प्रतिशत आबादी भारत में रहती है।
हाथियों को पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि वे लंबी दूरी तक बीज फैलाकर नए पौधों के उगने में मदद करते हैं। यही वजह है कि उनके संरक्षण को जंगल और जैव विविधता की सुरक्षा से सीधे जोड़ा जाता है। रिपोर्ट का जोर साफ है कि भविष्य की नीतियों में विकास और वन्यजीवों की जरूरत के बीच संतुलन बनाना होगा। जंगलों की बहाली, सुरक्षित गलियारे, बेहतर सुरक्षा और स्थानीय समुदायों की भागीदारी से ही हाथियों का संरक्षण प्रभावी तरीके से आगे बढ़ सकता है।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। हाथियों की आबादी, उनके आवास और मानव हाथी संघर्ष से जुड़े आंकड़े संबंधित रिपोर्टों और सरकारी बयानों पर आधारित हैं तथा समय के साथ इनमें बदलाव संभव है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।