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राजनीति, कविता, पोखरण और कारगिल की विरासत के धनी- अटल बिहारी वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि पर भावभीनी श्रृद्धांजली। उनकी राजनीति, कविता, पोखरण, कारगिल और लोकतांत्रिक संवाद की विरासत आज भी कायम है।

By अजय त्यागी
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advertisement13Aug2026%20copy.jpg अटल बिहारी वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि पर भावभीनी श्रृद्धांजली

नई दिल्ली, भारत। आज 16 अगस्त को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि है। 16 अगस्त 2018 को 93 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ था। अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि पर देश उन्हें याद कर रहा है। सदैव अटल स्मृति स्थल पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम हुआ, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई नेताओं ने उन्हें नमन किया। अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति में प्रभावशाली वक्ता, कवि और लंबे संसदीय अनुभव वाले नेता के रूप में अपनी अलग पहचान बना चुके थे। [विडियो]

ग्वालियर से संसद तक

25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर में जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी ने पत्रकारिता से सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की और आगे चलकर भारतीय जनसंघ से जुड़े। 1957 में पहली बार लोकसभा पहुंचे और चार दशक से अधिक लंबे संसदीय जीवन में दोनों सदनों के सदस्य रहे। उनकी भाषा सरल थी, लेकिन भाषणों में गहरी राजनीतिक समझ और प्रभाव साफ दिखता था। यही वजह रही कि सत्ता पक्ष के साथ विपक्ष में भी उनका सम्मान बना रहा। कविता और लेखन उनके व्यक्तित्व का अहम हिस्सा रहे।

अटल बिहारी वाजपेयी तीन बार भारत के प्रधानमंत्री बने। 1996 में उनका पहला कार्यकाल बहुत छोटा रहा। इसके बाद 1998 से 1999 और फिर 1999 से 2004 तक उन्होंने सरकार का नेतृत्व किया। उनके दौर में गठबंधन राजनीति को मजबूती मिली और कई दलों को साथ लेकर सरकार चलाने की नई मिसाल बनी। 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षण, बुनियादी ढांचे पर जोर और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसले उनके कार्यकाल के प्रमुख पड़ाव रहे। विदेश नीति में संवाद और दृढ़ता दोनों उनकी शैली का हिस्सा रहे।

निर्णायक दौर और फैसले

1999 में पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश के तहत अटल बिहारी वाजपेयी ने लाहौर बस यात्रा की। शांति की इस पहल के कुछ ही समय बाद कारगिल युद्ध ने भारत पाकिस्तान संबंधों को गंभीर तनाव में डाल दिया। युद्ध के दौरान सरकार ने सैन्य और कूटनीतिक दोनों मोर्चों पर स्थिति संभाली। उनकी राजनीति में एक तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर स्पष्ट रुख दिखा तो दूसरी तरफ संवाद के रास्ते खुले रखने की कोशिश भी नजर आई। यही संतुलन उनकी राजनीतिक शैली की खास पहचान माना जाता है।

राजनीति के साथ अटल बिहारी वाजपेयी की पहचान हिंदी कवि और प्रभावशाली वक्ता की भी रही। उनकी कविताओं और भाषणों में संघर्ष, उम्मीद, राष्ट्र और लोकतांत्रिक मूल्यों की झलक मिलती है। संसद में उनके वक्तव्य अक्सर गंभीर मुद्दों को सहज भाषा में सामने रखते थे। विरोधी दलों के नेताओं के साथ भी संवाद बनाए रखने की उनकी शैली को लंबे समय तक याद किया गया। यही कारण है कि उनका प्रभाव केवल एक राजनीतिक दल या एक दौर तक सीमित नहीं रहा और सार्वजनिक जीवन में उनकी स्वीकार्यता व्यापक बनी।

सम्मान और अमिट विरासत

अटल बिहारी वाजपेयी को 1992 में पद्म विभूषण और 2015 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। उनका जन्मदिन 25 दिसंबर को सुशासन दिवस के रूप में मनाया जाता है। प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने बुनियादी ढांचे, राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और गठबंधन सरकार के संचालन में अपनी अलग छाप छोड़ी। उनके निधन के बाद सदैव अटल स्मृति स्थल उनकी स्मृति का प्रमुख केंद्र बना। देश के अलग अलग हिस्सों में भी उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

आज अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि पर उनकी राजनीति, कविता और सार्वजनिक जीवन की विरासत फिर चर्चा में है। उन्हें याद करने का अर्थ केवल पुराने राजनीतिक फैसलों को दोहराना नहीं, बल्कि उस दौर की संसदीय बहस, गठबंधन राजनीति और संवाद की शैली को समझना भी है। अटल बिहारी वाजपेयी ने लंबे सार्वजनिक जीवन में कई भूमिकाएं निभाईं और हर भूमिका में अपनी अलग पहचान छोड़ी। अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि इसी व्यापक विरासत को याद करने और उनके योगदान का मूल्यांकन करने का अवसर है।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार स्रोतों और उपलब्ध आधिकारिक जानकारियों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। श्रद्धांजलि कार्यक्रमों से जुड़ी उपस्थिति और अन्य ताजा विवरण संबंधित आधिकारिक स्रोतों के अनुसार बदल सकते हैं। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

Editor-in-Chief