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दुर्लभ एग ईटिंग स्नेक मिला, 61 सेंटीमीटर के सांप का GPS रिकॉर्ड बना

दुर्लभ एग ईटिंग स्नेक मिलने से राजस्थान में वन्यजीव प्रेमियों में उत्साह है। 61 सेंटीमीटर लंबे जीवित सांप को रेस्क्यू कर सुरक्षित जगह छोड़ा गया।

By अजय त्यागी
1 min read
Advertisement002309202602.jpg advertisement13Aug2026%20copy.jpg दुर्लभ एग ईटिंग स्नेक

दुर्लभ एग ईटिंग स्नेक

चित्तौड़गढ़, राजस्थान। जिले के राशमी क्षेत्र में दुर्लभ एग ईटिंग स्नेक मिलने से वन्यजीव प्रेमियों में उत्साह है। हरनाथपुरा गांव में सोमवार रात एक घर में सांप दिखाई दिया था। सूचना पर वन्यजीव एवं पर्यावरण संरक्षण समिति की टीम पहुंची, लेकिन उस समय सांप नहीं मिला। मंगलवार को वही सांप दोबारा नजर आया तो विशेषज्ञों की टीम मौके पर पहुंची। शरीर के पैटर्न, सिर की बनावट और स्केल की जांच के बाद इसकी पहचान एग ईटिंग स्नेक के रूप में की गई। [1]

सांप की पहचान

परिवार ने सांप दिखने की जानकारी समिति अध्यक्ष मनीष तिवारी को दी थी। इसके बाद चित्तौड़गढ़ से पीयूष कांबले और रामकुमार साहू के नेतृत्व में टीम राशमी पहुंची। विशेषज्ञों ने सांप की बारीकी से जांच की और उसे विषहीन प्रजाति बताया। यह सांप मुख्य रूप से पक्षियों के अंडों पर निर्भर रहता है और अपनी गुप्त जीवनशैली के कारण आमतौर पर बहुत कम दिखाई देता है। टीम के अनुसार राशमी में मिला सांप करीब 2 फीट यानी 61 सेंटीमीटर लंबा और जीवित था।

समिति के मुताबिक इससे पहले राजस्थान में इस प्रजाति का रिकॉर्ड सवाई माधोपुर के भैरोड़ा खुर्द में मिला था, जहां करीब 1 फीट 8 इंच लंबा मृत सांप दर्ज किया गया था। राशमी में जीवित सांप मिलने को इसलिए खास माना जा रहा है। एग ईटिंग स्नेक की पहचान के बाद टीम ने उसकी तस्वीरें लीं और GPS के जरिए स्थान का रिकॉर्ड तैयार किया। इसके बाद सांप को कहीं दूर ले जाने के बजाय उसी इलाके में उसके अनुकूल प्राकृतिक आवास में सुरक्षित छोड़ दिया गया।

रिकॉर्ड से मिले संकेत

वन्यजीव एवं पर्यावरण संरक्षण समिति के मुताबिक एग ईटिंग स्नेक का जीवित मिलना केवल रेस्क्यू की घटना नहीं है, बल्कि इलाके की जैव विविधता को समझने के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। समिति के कोषाध्यक्ष पीयूष कांबले ने कहा कि दुर्लभ वन्यजीव को बचाने के साथ उसकी सही पहचान, तस्वीर और स्थान का दस्तावेजीकरण भी जरूरी है। इससे भविष्य में इस क्षेत्र में प्रजातियों की मौजूदगी और उनके प्राकृतिक आवास को समझने में मदद मिल सकती है। इसी वजह से रेस्क्यू के दौरान पूरा रिकॉर्ड तैयार किया गया।

वन्यजीव वैज्ञानिक डॉ सुनील दुबे के अनुसार मध्य पूर्वी राजस्थान के बाद चित्तौड़गढ़ में इस प्रजाति का जीवित मिलना दक्षिण पूर्वी राजस्थान में इसके अनुकूल आवास होने का संकेत दे सकता है। समिति ने रेस्क्यू अभियान में शामिल सभी सदस्यों के प्रयास को अहम बताया है। सोमवार को घर में मची घबराहट से शुरू हुआ मामला मंगलवार को एक दुर्लभ वन्यजीव रिकॉर्ड में बदल गया। एग ईटिंग स्नेक को सुरक्षित प्राकृतिक आवास में छोड़ने के बाद टीम ने उसकी जानकारी भविष्य के अध्ययन के लिए दर्ज कर ली।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। राजस्थान में इस प्रजाति के जीवित मिलने को लेकर पहला प्रमाणित रिकॉर्ड होने का दावा स्थानीय वन्यजीव संरक्षण समिति और उपलब्ध जानकारी पर आधारित है, इसकी स्वतंत्र वैज्ञानिक पुष्टि अलग विषय है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

Editor-in-Chief