मिट्टी कैफे की खास टीम: झिझक से आत्मविश्वास तक पहुंचने की कहानी
गुजरात के डिप्टी सीएम हर्ष सांघवी ने मिट्टी कैफे की टीम की तारीफ की। जानें 2017 में हुब्बली से प्रारंभ इस पहल ने कैसे दिव्यांगों को रोजगार और सम्मान की राह दी।
मिट्टी कैफे
गांधीनगर, गुजरात। गुजरात के डिप्टी सीएम हर्ष सांघवी ने मिट्टी कैफे की खास टीम से मुलाकात के बाद उनकी हिम्मत और आत्मविश्वास की तारीफ की। उन्होंने कहा कि हम अक्सर अपनी क्षमताओं को सामान्य मानकर पहली कोशिश से पहले ही झिझक जाते हैं, जबकि असली सीमाएं कई बार शरीर में नहीं बल्कि हमारे मन में होती हैं। सांघवी ने इस टीम को ईश्वर का उपहार, ताकत, गरिमा और उम्मीद की मिसाल बताया। उनकी टिप्पणी ने उस पहल पर फिर ध्यान खींचा है, जो रोजगार के जरिए सोच बदलने की कोशिश कर रही है। [1]
शुरुआत की कहानी
मिट्टी कैफे की शुरुआत 2017 में अलिना आलम ने कर्नाटक के हुब्बली से की थी। विचार था कि दिव्यांग लोगों को दया की जगह सम्मानजनक काम, प्रशिक्षण और कमाई का मौका मिले। आलम को इस सोच की प्रेरणा बेंगलुरु के Samarthanam Trust for the Disabled में इंटर्नशिप के दौरान मिली। कॉलेज के दिनों में सामाजिक असमानता पर सोचते हुए उन्होंने भोजन को ऐसा माध्यम माना, जो लोगों को जोड़ सकता है और रोजगार का रास्ता भी खोल सकता है। पहला कैफे एक छोटे और जर्जर टिन शेड से शुरू हुआ।
शुरुआत आसान नहीं थी। पैसे नहीं थे, कारोबारी अनुभव कम था और कई संस्थानों से मदद के लिए इनकार मिला। आखिर Deshpande Foundation ने हुब्बली में जगह दी और छात्र समुदाय की मदद से पहला कैफे तैयार हुआ। पहली कर्मचारी कीर्ति थीं, जो चलने में सक्षम नहीं थीं और नौकरी के इंटरव्यू तक रेंगकर पहुंची थीं, क्योंकि उनके परिवार के पास व्हीलचेयर खरीदने के पैसे नहीं थे। बाद में उन्होंने अपनी कमाई से व्हीलचेयर खरीदी और उसी कैफे की मैनेजर बनीं। यही कहानी इस मॉडल की असली ताकत समझाती है।
काम से बदली तस्वीर
मिट्टी कैफे का मॉडल सिर्फ चाय और खाना बेचने तक सीमित नहीं है। यहां दिव्यांग कर्मचारी खाना तैयार करने, ग्राहकों को सेवा देने और कैफे के रोजमर्रा के काम संभालने जैसी जिम्मेदारियां निभाते हैं। प्रशिक्षण भी व्यावहारिक तरीके से दिया जाता है, ताकि जिन लोगों को पढ़ने लिखने में दिक्कत हो, वे काम करते हुए जरूरी कौशल सीख सकें। यही वजह है कि यह पहल रोजगार के साथ आत्मनिर्भरता और सामाजिक स्वीकार्यता का संदेश भी देती है। 2025 तक उपलब्ध रिपोर्टों में इसके भारत भर में दर्जनों आउटलेट और सैकड़ों कर्मचारियों का उल्लेख मिलता है।
इस सफर की पहुंच अब कई बड़े संस्थानों तक है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक मिट्टी कैफे के आउटलेट सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रपति भवन, हवाई अड्डों, शैक्षणिक संस्थानों और कॉरपोरेट परिसरों तक पहुंचे हैं। 2024 में इसे दिव्यांगजनों के सशक्तिकरण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिला। इस पूरी यात्रा का सबसे बड़ा संदेश यही है कि अवसर मिलने पर क्षमता सामने आती है। हर्ष सांघवी की टिप्पणी भी इसी सोच को रेखांकित करती है कि मिट्टी कैफे की टीम ने सीमाओं की परिभाषा बदलने का काम किया है।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। दिव्यांगता, रोजगार और सामाजिक समावेशन से जुड़े आंकड़े समय के साथ बदल सकते हैं और यहां उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।
Gujarat Deputy CM Harsh Sanghavi tweets, "We often take our abilities for granted and hesitate before taking that first step. But meeting the specially-abled team of Mitti Café, who run their lives and work with such incredible confidence, reminded me that the biggest limitations… pic.twitter.com/X80Y3qkoqD
— IANS (@ians_india) August 20, 2026