निजी स्पेस सेक्टर संभालेगा रॉकेट, ISRO अब रिसर्च पर देगा जोर
ISRO के मुताबिक भविष्य में लॉन्च व्हीकल बनाने का काम निजी स्पेस सेक्टर संभालेंगे, ISRO रिसर्च और नई तकनीक पर ज्यादा ध्यान देगा।
प्रतीकात्मक फोटो
नई दिल्ली, दिल्ली। निजी स्पेस सेक्टर के लिए भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में बड़ी भूमिका का रास्ता खुल रहा है। IN-SPACe के चेयरमैन पवन गोयनका ने कहा है कि आने वाले समय में ISRO लॉन्च व्हीकल का निर्माण नहीं करेगा और यह जिम्मेदारी निजी कंपनियों या PSU को दी जाएगी। इसका मतलब ISRO की भूमिका खत्म होना नहीं बल्कि उसका फोकस बदलना है। एजेंसी नई तकनीक, वैज्ञानिक मिशन और विशेष अंतरिक्ष ढांचे पर ज्यादा ध्यान देगी। सरकार का लक्ष्य 2033 तक भारत की space economy को 44 billion डॉलर तक पहुंचाना है। [1]
ISRO का बदलेगा रोल
अब तक ISRO रॉकेट और सैटेलाइट के विकास से लेकर उनके निर्माण तक अंतरिक्ष कार्यक्रम के लगभग हर अहम हिस्से में सीधे शामिल रहा है। नए मॉडल में परिपक्व तकनीक को उद्योग तक पहुंचाकर बड़े पैमाने पर उत्पादन की जिम्मेदारी कंपनियों को देने की दिशा में काम हो रहा है। SSLV इसका उदाहरण है। इसकी तकनीक HAL को हस्तांतरित की जा चुकी है और HAL को इसे बनाने, एकीकृत करने और व्यावसायिक तथा रणनीतिक मिशनों के लिए लॉन्च करने की क्षमता मिली है। PSLV और LVM3 के लिए भी उद्योग की भूमिका बढ़ाने की तैयारी है।
यह बदलाव भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को सरकारी संस्थान से उद्योग आधारित मॉडल की ओर ले जा सकता है। ISRO का ज्यादा समय उन तकनीकों पर लगाया जा सकेगा जिनमें अभी शोध और विकास की जरूरत है। वहीं कंपनियां पहले से विकसित तकनीक को उत्पादन, लॉन्च और बाजार तक ले जाएंगी। सरकार के हालिया आंकड़े बताते हैं कि भारत में करीब 440 space technology startups पंजीकृत हैं और IN-SPACe ने 52 गैर सरकारी संस्थाओं को 113 authorisations दिए हैं। इनमें 18 startups शामिल हैं।
टेक्नोलॉजी ट्रांसफर तेज
निजी स्पेस सेक्टर के विस्तार में ISRO की तकनीक का उद्योग तक पहुंचना सबसे अहम कड़ी बन रहा है। सरकार के मुताबिक NSIL ने अब तक 118 Technology Transfer Agreements किए हैं जिनके जरिए ISRO और Department of Space की विकसित 83 तकनीकों को भारतीय उद्योग तक पहुंचाया गया है। इनमें SSLV, Indian Mini Satellite 1 bus, laser gyro, antenna systems और ceramic accelerometer जैसी तकनीकें शामिल हैं। इससे कंपनियों को हर तकनीक को शून्य से विकसित करने के बजाय परिपक्व तकनीक को व्यावसायिक उत्पाद में बदलने का मौका मिल रहा है।
हालांकि सिर्फ तकनीक मिलने से बड़ा अंतरिक्ष कारोबार खड़ा नहीं होगा। कंपनियों को शुरुआती दौर में बड़े ग्राहक और स्थिर ऑर्डर भी चाहिए होंगे। पवन गोयनका ने सरकार की मांग को निजी उद्योग के लिए anchor customer की तरह इस्तेमाल करने की जरूरत बताई है। यही मांग कंपनियों को उत्पादन क्षमता बढ़ाने, विशेषज्ञों की भर्ती करने और सप्लाई चेन तैयार करने का भरोसा दे सकती है। इसके बाद लक्ष्य सरकारी ऑर्डर से आगे बढ़कर वैश्विक ग्राहकों तक पहुंच बनाना है।
दुनिया में बढ़ेगा दायरा
निजी स्पेस सेक्टर की अगली बड़ी चुनौती भारत के बाहर बाजार बनाना है। IN-SPACe की decadal vision में 2033 तक 44 billion डॉलर की space economy का लक्ष्य रखा गया है। इसमें करीब 11 billion डॉलर का हिस्सा निर्यात से हासिल करने की परिकल्पना है। सरकार के मुताबिक मार्च 2026 तक भारतीय space startups में cumulative investment करीब 618.5 million डॉलर पहुंच चुका था। अब कंपनियों के लिए launch services, satellite manufacturing, space data और analytics जैसे क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय बाजार पकड़ना अहम होगा।
अंतरिक्ष कारोबार का दायरा केवल रॉकेट और सैटेलाइट तक सीमित नहीं रहेगा। खेती में फसल की निगरानी, खनन में जमीन का आकलन और शहरों की योजना बनाने में satellite data का इस्तेमाल बढ़ सकता है। सरकार भी space technology को दूसरे उद्योगों तक पहुंचाने पर जोर दे रही है। ऐसे में निजी स्पेस सेक्टर भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम का सिर्फ निर्माण भाग नहीं बल्कि कारोबार और रोजमर्रा की सेवाओं का बड़ा हिस्सा बन सकता है। ISRO के लिए इसका अर्थ नई तकनीक और वैज्ञानिक मिशनों पर ज्यादा फोकस है।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार स्रोतों और सरकारी दस्तावेजों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों की भूमिका बढ़ाने की प्रक्रिया चरणबद्ध है और भविष्य में नियम, जिम्मेदारियां तथा तकनीकी हस्तांतरण की शर्तें बदल सकती हैं। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।