स्कूलों में रोक के बीच यूट्यूबर्स और पत्रकारों की एंट्री पर क्या नियम
बाहरी लोगों की एंट्री और फोटो वीडियो पर सरकारी स्कूलों में रोक का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अदालत ने याचिका खारिज की और अनुमति वाली व्यवस्था फिलहाल कायम।


प्रतीकात्मक फोटो
नई दिल्ली, दिल्ली। स्कूलों में रोक से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों की एंट्री तथा फोटो वीडियो, इंटरव्यू और लाइव स्ट्रीमिंग पर लगाए गए प्रतिबंधों को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने अनुच्छेद 32 के तहत याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया। राजस्थान ने 16 अगस्त 2026 और उत्तर प्रदेश ने 19 अगस्त 2026 को ऐसे आदेश जारी किए थे। [1]
विवाद की असली वजह
स्कूलों में रोक का मामला स्कूल ठीक करो अभियान के दौरान सामने आया। अभियान में सरकारी स्कूलों की व्यवस्थाओं और बुनियादी सुविधाओं को वीडियो के जरिए सामने लाने की कोशिश की गई थी। इसके बाद राज्यों ने बिना अनुमति स्कूल परिसर में बाहरी लोगों के प्रवेश और रिकॉर्डिंग पर पाबंदी लगाई। राजस्थान के आदेश में प्रवेश के लिए प्रधानाचार्य की अनुमति तथा फोटो वीडियो, इंटरव्यू और लाइव स्ट्रीमिंग के लिए पहले से अनुमति लेने की व्यवस्था रखी गई। उत्तर प्रदेश के अयोध्या में भी इसी तरह का आदेश जारी हुआ था।
याचिका में इन प्रतिबंधों को नागरिकों के मौलिक अधिकारों से जोड़ते हुए चुनौती दी गई थी। दलील दी गई कि सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए स्वतंत्र दस्तावेजीकरण जरूरी है। इसके जरिए शौचालय, पीने का पानी, मिड डे मील और बुनियादी ढांचे जैसी कमियां सामने आ सकती हैं। दूसरी ओर बच्चों की सुरक्षा और निजता का सवाल भी महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि स्कूलों में रोक को लेकर बहस केवल वीडियो बनाने की अनुमति तक सीमित नहीं रही बल्कि पारदर्शिता और सुरक्षा के संतुलन का मुद्दा बन गई।
अदालत का रुख
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अनुच्छेद 32 के तहत सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत के इस रुख के बाद राज्यों की अनुमति आधारित व्यवस्था फिलहाल बनी हुई है। इसका मतलब है कि बाहरी व्यक्ति बिना अनुमति सरकारी स्कूल परिसर में प्रवेश या वहां फोटो वीडियो, इंटरव्यू और लाइव स्ट्रीमिंग नहीं कर सकता। इस फैसले से स्कूलों में रोक को चुनौती देने वाले पक्ष को तत्काल राहत नहीं मिली। हालांकि आदेश का असर सार्वजनिक संस्थानों में निगरानी, बच्चों की निजता और सरकारी स्कूलों की स्थिति सामने लाने के अधिकार से जुड़ी बहस पर आगे भी पड़ सकता है।
मामले ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि सरकारी स्कूलों में पारदर्शिता और बच्चों की सुरक्षा के बीच सही संतुलन कैसे बनाया जाए। स्कूलों की कमियां सामने आना जरूरी है, लेकिन रिकॉर्डिंग और बाहरी प्रवेश के लिए स्पष्ट नियम भी जरूरी हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा आदेश के बाद स्कूलों में रोक से जुड़ी अनुमति व्यवस्था फिलहाल लागू रहेगी। इसलिए यूट्यूबर्स, पत्रकारों और दूसरे बाहरी लोगों के लिए सरकारी स्कूल में प्रवेश या रिकॉर्डिंग से पहले संबंधित विभाग की अनुमति लेना महत्वपूर्ण होगा।
अस्वीकरण (Disclaimer):
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