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गिद्ध संरक्षण को लेकर जागरूकता बढ़ाने पर विशेषज्ञों ने दिया जोर

गिद्ध संरक्षण को लेकर बीकानेर में जागरूकता कार्यक्रम हुआ, जहां विशेषज्ञों ने गिद्धों की अहम भूमिका, घटती संख्या और संरक्षण के जरूरी कदम बताए।

By अजय त्यागी
1 min read
Advertisement002309202602.jpg advertisement13Aug2026%20copy.jpg गिद्ध संरक्षण को लेकर विशेषज्ञ व्याख्यान और जागरूकता कार्यक्रम

गिद्ध संरक्षण को लेकर विशेषज्ञ व्याख्यान और जागरूकता कार्यक्रम

बीकानेर, राजस्थान। अंतर्राष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस 2026 के मौके पर राजस्थान पशुचिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय में गिद्ध संरक्षण को लेकर विशेषज्ञ व्याख्यान और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. सुमंत व्यास ने कहा कि गिद्ध पारिस्थितिकी तंत्र के बेहद जरूरी घटक हैं और इनके बचाव के लिए वैज्ञानिक सोच, जनजागरूकता तथा पशुचिकित्सा और वन्यजीव क्षेत्र के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है। उन्होंने भावी पशु चिकित्सकों को वन्यजीव संरक्षण के प्रति संवेदनशील बनाने की जरूरत पर भी जोर दिया।

विशेषज्ञों ने खतरे बताए

कार्यक्रम में राजकीय डूंगर महाविद्यालय के प्राणीशास्त्र विभाग के डॉ. प्रताप सिंह ने आकाश के राजा: खतरे और संरक्षण की रूपरेखा विषय पर विशेषज्ञ व्याख्यान दिया। उन्होंने गिद्धों के पारिस्थितिक महत्व, उनकी घटती संख्या और मानव जनित खतरों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि गिद्धों को बचाने के लिए केवल वन्यजीव विभाग के प्रयास पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि समाज की भागीदारी और लगातार जागरूकता भी जरूरी है। कार्यक्रम में मौजूद विद्यार्थियों और संकाय सदस्यों के बीच संरक्षण को लेकर जिम्मेदारी की भावना बढ़ाने पर भी जोर दिया गया।

वेटरनरी महाविद्यालय की कार्यकारी अधिष्ठाता एवं संकायाध्यक्ष प्रो. मनीषा माथुर ने स्वागत भाषण में गिद्धों को प्रकृति का स्वच्छता प्रहरी बताया। केन्द्र के प्रधान अन्वेषक डॉ. जे.पी. कच्छावा ने कहा कि गिद्ध मृत पशुओं के शवों का प्राकृतिक निस्तारण कर पर्यावरण को स्वच्छ रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। उन्होंने समझाया कि यह काम संभावित रोगों के प्रसार को कम करने में भी मदद करता है। उनके अनुसार गिद्ध संरक्षण का संबंध केवल वन्यजीवों से नहीं, बल्कि पशु स्वास्थ्य, जनस्वास्थ्य और पर्यावरणीय संतुलन से भी सीधे जुड़ा है।

संदेश साफ है

कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने साफ किया कि गिद्धों की मौजूदगी स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण है और इनके संरक्षण को लेकर जागरूकता लगातार बढ़ाने की जरूरत है। केन्द्र के प्रधान अन्वेषक ने पशुचिकित्सा और वन्यजीव क्षेत्र के बीच समन्वय को अहम बताया। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ी के पशु चिकित्सकों को वन्यजीवों की जरूरतों और पर्यावरणीय संतुलन के प्रति संवेदनशील बनाना जरूरी है। इस तरह के कार्यक्रम विद्यार्थियों को किताबों से आगे जाकर प्रकृति और समाज के बीच संबंध समझने का अवसर भी देते हैं।

कार्यक्रम के अंत में निदेशक क्लिनिकस प्रो. प्रवीण बिश्नोई ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के संकाय सदस्य और विद्यार्थी मौजूद रहे। आयोजन में गिद्धों की घटती संख्या को लेकर चिंता के साथ संरक्षण की व्यावहारिक जरूरतों पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने संकेत दिया कि जनभागीदारी के बिना वन्यजीवों को बचाने की कोशिश अधूरी रह सकती है। गिद्ध संरक्षण को समाज, पशुचिकित्सा विशेषज्ञों और वन्यजीव क्षेत्र की साझा जिम्मेदारी मानकर लगातार जागरूकता फैलाना ही इस कार्यक्रम का सबसे अहम संदेश रहा।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। वन्यजीव संरक्षण से जुड़ी किसी भी नीति, उपचार या संरक्षण संबंधी निर्णय के लिए संबंधित विशेषज्ञों और अधिकृत संस्थाओं की सलाह मान्य होगी। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

Editor-in-Chief