पार्टनर चुनने की आजादी पर हाईकोर्ट का फैसला, माता पिता को साफ संदेश
पार्टनर चुनने की आजादी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, कहा माता पिता की चिंता वयस्क की पसंद पर भारी नहीं, पुलिस को दंपति की सुरक्षा का आदेश।

प्रतीकात्मक फोटो
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश। पार्टनर चुनने की आजादी को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए साफ किया कि बालिग व्यक्ति की अपनी जिंदगी और जीवनसाथी चुनने की संवैधानिक स्वतंत्रता को केवल माता पिता की चिंता के आधार पर दबाया नहीं जा सकता। अदालत ने 18 वर्षीय महिला को अपनी इच्छा से पति के साथ रहने की अनुमति दी। न्यायमूर्ति संदीप जैन ने 7 सितंबर को पुलिस को महिला और उसके पति की सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश भी दिया। अदालत ने माना कि महिला ने बिना दबाव के अपनी पसंद से शादी की है। [1]
बालिग की पसंद अहम
मामला हैबियस कॉर्पस याचिका से जुड़ा था। सुनवाई के दौरान महिला को अदालत के सामने पेश किया गया और न्यायाधीश ने उससे व्यक्तिगत बातचीत की। महिला ने बताया कि उसका जन्म 2008 में हुआ है और वह बालिग है। उसने कहा कि उसने अपनी मर्जी से शादी की है और उस पर किसी तरह का दबाव नहीं था। महिला ने यह भी साफ किया कि वह अपने पति के साथ वैवाहिक घर में रहना चाहती है। उसके पिता ने उसकी शादी पर आपत्ति जताई लेकिन यह भी स्वीकार किया कि उनकी बेटी बालिग है।
अदालत ने महिला के बयान को स्पष्ट और लगातार एक जैसा पाया। न्यायाधीश को रिकॉर्ड या महिला के व्यवहार में ऐसा कुछ नहीं मिला जिससे लगे कि शादी के पीछे धमकी, जबरदस्ती, अनुचित प्रभाव या गैरकानूनी लालच था। पति से भी अदालत ने बातचीत की और उसने शादी की पुष्टि करते हुए पत्नी के साथ रहने की इच्छा जताई। इसके बाद कोर्ट ने माना कि बालिग व्यक्ति को अपनी जिंदगी का तरीका और जीवनसाथी चुनने का अधिकार है। इस पार्टनर चुनने की आजादी को माता पिता या रिश्तेदार अपनी इच्छा से बदल नहीं सकते।
सुरक्षा पर कोर्ट सख्त
अदालत ने कहा कि पार्टनर चुनने की आजादी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा से जुड़ी है। राज्य और उसकी संस्थाओं को इस स्वायत्तता का सम्मान करना चाहिए बशर्ते व्यक्ति का फैसला कानून के दायरे में हो। कोर्ट ने साफ किया कि महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ माता पिता की कस्टडी में लौटने या वहीं रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इस आधार पर उसे अपनी पसंद की जगह पति के साथ जाने की स्वतंत्रता दी गई। अदालत ने यह भी कहा कि उसके फैसले के कारण किसी को धमकी या उत्पीड़न नहीं करना चाहिए।
हाईकोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया कि दंपति को उनकी पसंद की जगह तक सुरक्षित पहुंचाया जाए और उनके रास्ते में कोई रुकावट न आए। अदालत ने यह भी कहा कि माता पिता या रिश्तेदार महिला के वैध फैसले में दखल नहीं दे सकते। अगर उसकी जिंदगी या स्वतंत्रता को खतरा होने की जानकारी पुलिस तक पहुंचती है तो अधिकारियों को सुरक्षा देनी होगी। यानी कोर्ट ने परिवार की भावनाओं को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया बल्कि यह स्पष्ट किया कि वयस्क व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों पर उनका दबाव हावी नहीं हो सकता।
कानून ने साफ की सीमा
इस फैसले का सीधा संदेश यह है कि बालिग होने के बाद व्यक्ति अपनी जिंदगी से जुड़े अहम फैसले खुद ले सकता है। शादी किससे करनी है और कहां रहना है जैसे फैसले व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े माने जाते हैं। अदालत ने इसी आधार पर महिला की इच्छा को प्राथमिकता दी। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर रिश्ते या शादी को कानून से बाहर संरक्षण मिल जाएगा। कोर्ट ने भी अपने निर्देशों को कानून की आवश्यकताओं के अधीन माना है। इस मामले में महिला के बयान और परिस्थितियों से जबरदस्ती का कोई संकेत नहीं मिला।
पार्टनर चुनने की आजादी को लेकर हाईकोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण है जहां परिवार की असहमति के कारण बालिग जोड़ों को दबाव या खतरे का सामना करना पड़ता है। अदालत ने कहा कि माता पिता की चिंता चाहे जितनी वास्तविक क्यों न हो वह किसी बालिग व्यक्ति की संवैधानिक स्वायत्तता को खत्म नहीं कर सकती। फिलहाल इस मामले में दंपति को सुरक्षा देते हुए पुलिस को उनकी सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है।
अस्वीकरण (Disclaimer):
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