कच्चा तेल 100 डॉलर पार, होर्मुज संकट ने बाजार को हिलाया
कच्चा तेल 100 डॉलर पार हो गया है और करीब 4 महीने बाद Brent और WTI दोनों इस स्तर से ऊपर बने हुए हैं। बढ़ते तनाव से सप्लाई संकट की आशंका ने तेल बाजार को हिला दिया

प्रतीकात्मक फोटो
नई दिल्ली, दिल्ली। कच्चा तेल 100 डॉलर पार पहुंचने के बाद दुनिया भर के बाजारों में चिंता बढ़ गई है। शुक्रवार को Brent crude और अमेरिकी WTI दोनों इस हफ्ते को 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर खत्म करने की राह पर थे। TNN की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह मई के मध्य के बाद पहली बार है जब दोनों प्रमुख बेंचमार्क लगातार इस स्तर से ऊपर रहने की स्थिति में हैं। तेल की कीमतों में उछाल के पीछे पश्चिम एशिया में बढ़ते हमले, महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में रुकावट और लंबे समय तक सप्लाई बाधित रहने की आशंका प्रमुख कारण हैं। [1]
होर्मुज पर संकट
तेल बाजार की सबसे बड़ी चिंता स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बनी हुई है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में शामिल है और यहां लंबे समय से आवाजाही प्रभावित होने की खबरों ने बाजार में सप्लाई को लेकर डर बढ़ाया है। शुक्रवार को Brent करीब 105.99 डॉलर और WTI करीब 101.20 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था। दोनों में सप्ताह के दौरान 10 प्रतिशत से ज्यादा की तेजी दर्ज हुई। यमन के मोचा बंदरगाह पर ईरान समर्थित हूती समूह के कब्जे और क्षेत्र में टैंकरों पर बढ़ते हमलों ने लाल सागर और खाड़ी के रास्तों को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है।
महंगाई का बढ़ा डर
तेल की कीमतों में लगातार तेजी का सीधा असर दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है। महंगा कच्चा तेल परिवहन, उत्पादन और ऊर्जा की लागत बढ़ा सकता है और इससे महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। अमेरिका में डीजल की औसत कीमत भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी है। इस बीच OPEC ने 2026 के लिए वैश्विक तेल मांग बढ़ने का अनुमान घटाकर 380,000 बैरल प्रतिदिन कर दिया है। अगस्त में OPEC का उत्पादन भी घटा। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि आगे कीमतों की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि वास्तविक तेल आपूर्ति सामान्य होती है या क्षेत्रीय संघर्ष के कारण और बिगड़ती है।
भारत पर भी नजर
भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए कच्चा तेल 100 डॉलर पार होना खास महत्व रखता है। लंबे समय तक ऊंची कीमतें बनी रहीं तो आयात बिल पर दबाव बढ़ सकता है और परिवहन से लेकर कई उद्योगों की लागत प्रभावित हो सकती है। इसका असर महंगाई और आम लोगों के खर्च पर भी पड़ सकता है। हालांकि घरेलू ईंधन कीमतों पर असर कई अन्य कारकों पर भी निर्भर करता है। फिलहाल सबसे बड़ी चिंता यह है कि पश्चिम एशिया में तनाव लंबा खिंचता है तो वैश्विक सप्लाई व्यवस्था पर कितना असर पड़ेगा और तेल बाजार कितनी देर तक इस दबाव को झेल पाएगा।
चीन तय करेगा दिशा
आने वाले दिनों में चीन की मांग भी तेल बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है। चीन दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में है और उसकी खरीद बढ़ने पर पहले से दबाव में चल रही वैश्विक सप्लाई पर असर और तेज हो सकता है। विश्लेषकों के मुताबिक अगर क्षेत्रीय तनाव कम नहीं हुआ और तेल की वास्तविक आपूर्ति कमजोर रही तो कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। दूसरी तरफ युद्ध से जुड़े घटनाक्रम में नरमी या समुद्री रास्तों पर आवाजाही सामान्य होने से दबाव कम हो सकता है। फिलहाल कच्चा तेल 100 डॉलर पार रहने से बाजार और उपभोक्ताओं दोनों की चिंता बढ़ी हुई है।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम, आपूर्ति, मांग और बाजार की परिस्थितियों के अनुसार तेजी से बदल सकती हैं इसलिए ईंधन कीमतों और आर्थिक प्रभावों के बारे में अंतिम निष्कर्ष ताजा आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।