फर्जी हस्ताक्षर पर आयोग सख्त, अस्पताल को लौटाने होंगे 1.14 लाख रुपये
फर्जी हस्ताक्षर के आरोप और इलाज का बिल बढ़ाने के मामले में केरल के एक अस्पताल को मरीज को 1.14 लाख रुपये देने का आदेश दिया गया है।

प्रतीकात्मक फोटो
कोल्लम, केरल। फर्जी हस्ताक्षर के आरोप वाले इस मामले में कोल्लम जिला उपभोक्ता आयोग ने अस्पताल को कुल 1.14 लाख रुपये देने का आदेश दिया है। Indian Express की एक रिपोर्ट के अनुसार, मरीज को अक्टूबर 2025 में तेज गैस्ट्रिक दर्द के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उसे बताया गया था कि इलाज का अनुमानित खर्च करीब 40,000 रुपये होगा। बाद में अस्पताल ने बीमा कंपनी को करीब 1.30 लाख रुपये का बिल भेज दिया। मरीज ने दावा किया कि इलाज के खर्च में इतना बड़ा अंतर सही नहीं था और बीमा कंपनी को भेजे गए दस्तावेज पर मौजूद फर्जी हस्ताक्षर उसका नहीं था। [1]
बिल पर उठे सवाल
मरीज के मुताबिक उसे 30 अक्टूबर 2025 को दोपहर करीब 1.45 बजे तेज गैस्ट्रिक दर्द के कारण भर्ती कराया गया था। दर्द ज्यादा होने पर उसे करीब 12 घंटे ICU में रखा गया और अगले दिन कमरे में भेज दिया गया। अस्पताल ने उसे 3 नवंबर को छुट्टी मिलने की बात बताई थी और इलाज का खर्च करीब 40,000 रुपये बताया था। मरीज के पास 2.50 लाख रुपये का मेडिकल इंश्योरेंस था। उसने इलाज के बिल बीमा कंपनी को भेजने पर सहमति दी। बाद में करीब 1.30 लाख रुपये का दावा भेजा गया जिसमें से 1.19 लाख रुपये मंजूर हुए। मरीज ने इस रकम पर सवाल उठाया।
दस्तावेज पर विवाद
मरीज ने आयोग में शिकायत करते हुए कहा कि अस्पताल ने वास्तविक इलाज खर्च से करीब 79,000 रुपये ज्यादा का दावा किया। उसने यह भी आरोप लगाया कि बीमा कंपनी को भेजे गए बिल में उसके नाम के सामने मौजूद फर्जी हस्ताक्षर उसका नहीं था। अस्पताल ने कथित तौर पर ज्यादा बिल को इनडोर इलाज की लागत से जोड़कर समझाया। हालांकि आयोग की सुनवाई में अस्पताल नोटिस मिलने के बावजूद उपस्थित नहीं हुआ और उसने अपना पक्ष भी दाखिल नहीं किया। आयोग ने कहा कि इलाज और बिल से जुड़े रिकॉर्ड अस्पताल के पास थे। इसलिए विवादित दस्तावेज और उसके बनने की प्रक्रिया पर स्पष्टीकरण देना अस्पताल की जिम्मेदारी थी।
आयोग ने सुनाया फैसला
कोल्लम जिला उपभोक्ता आयोग ने 19 अगस्त के आदेश में अस्पताल को सेवा में कमी का जिम्मेदार माना। आयोग ने मरीज की ओर से दिए गए बयान और दस्तावेजों को अस्पताल की तरफ से चुनौती नहीं मिलने पर स्वीकार किया। फर्जी हस्ताक्षर से जुड़े मरीज के आरोप का भी अस्पताल ने कोई प्रभावी जवाब नहीं दिया। आयोग ने अस्पताल को 79,000 रुपये वापस करने का आदेश दिया। इसके साथ मानसिक परेशानी, असुविधा और कठिनाई के लिए 25,000 रुपये मुआवजा तथा मुकदमे के खर्च के लिए 10,000 रुपये देने को कहा गया। आदेश का पालन 45 दिनों के भीतर करना होगा।
मरीजों के लिए सबक
फर्जी हस्ताक्षर के इस मामले ने अस्पताल के बिल और बीमा दावों में पारदर्शिता का बड़ा सवाल खड़ा किया है। मरीजों के लिए जरूरी है कि अस्पताल में भर्ती होने से लेकर छुट्टी मिलने तक सभी बिल और दस्तावेज संभालकर रखें। बीमा कंपनी को भेजे गए दावे की जानकारी भी संभव हो तो खुद जांचें। अगर इलाज की अनुमानित लागत और अंतिम बिल में बड़ा अंतर दिखाई दे तो अस्पताल से लिखित स्पष्टीकरण मांगना चाहिए। इस मामले में आयोग ने माना कि अस्पताल विवादित दस्तावेज और ज्यादा बिल के आरोपों का संतोषजनक जवाब नहीं दे सका। फर्जी हस्ताक्षर के आरोप पर भी उसका पक्ष सामने नहीं आया।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। फर्जी हस्ताक्षर और अधिक बिल से जुड़े आरोप इस मामले में उपभोक्ता आयोग के समक्ष पेश किए गए साक्ष्यों और अस्पताल की अनुपस्थिति के आधार पर देखे गए हैं। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।