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निकाय चुनाव में उलटफेर, कांग्रेस, भाजपा और निर्दलीयों ने बदला खेल

अजमेर संभाग के निकाय चुनाव में उलटफेर ने सियासी समीकरणों को हिलाया। कहीं कांग्रेस ने वापसी की तो कहीं भाजपा मजबूत रही और कई निकायों में निर्दलीय निर्णायक बने।

By अजय त्यागी
1 min read
Advertisement002309202602.jpg advertisement13Aug2026%20copy.jpg प्रतीकात्मक फोटो

प्रतीकात्मक फोटो

अजमेर, राजस्थान। राजस्थान के निकाय चुनाव में उलटफेर की तस्वीर अजमेर संभाग में भी साफ दिखाई दी है। सबसे बड़ी तस्वीर अजमेर नगर निगम से आई जहां कांग्रेस ने 80 में से 37 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी का दर्जा हासिल किया। भाजपा 32 वार्डों पर रही जबकि 11 निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी जीत दर्ज की। करीब 35 साल बाद कांग्रेस के सबसे बड़ी पार्टी बनने से स्थानीय राजनीति में हलचल बढ़ गई है।  [1]

अजमेर में बदला गणित

अजमेर नगर निगम का परिणाम कांग्रेस के लिए बड़ी वापसी के तौर पर सामने आया है। 80 वार्डों में कांग्रेस ने 37 सीटें जीतकर भाजपा के 32 सीटों वाले प्रदर्शन को पीछे छोड़ दिया। लेकिन कांग्रेस को अपने दम पर बहुमत नहीं मिला। 11 निर्दलीय पार्षदों की मौजूदगी ने उन्हें बेहद महत्वपूर्ण बना दिया है। अब मेयर के चुनाव में इन निर्दलीयों का रुख सत्ता की दिशा तय कर सकता है। इसी वजह से नतीजे आने के बाद भी अजमेर की राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं हुई है।

अजमेर में भाजपा भले ही दूसरे स्थान पर रही लेकिन 32 वार्डों की जीत को कमजोर प्रदर्शन नहीं कहा जा सकता। कांग्रेस और भाजपा के बीच केवल 5 सीटों का अंतर रहा। ऐसे में दोनों दलों के सामने अब निर्दलीय पार्षदों को साधने की चुनौती है। स्थानीय स्तर पर पार्षदों के बीच बातचीत और समर्थन का गणित आने वाले दिनों में काफी अहम होगा। यही वजह है कि अजमेर का चुनाव परिणाम सिर्फ जीत और हार की कहानी नहीं बल्कि बोर्ड गठन से पहले शुरू होने वाले सियासी समीकरणों की भी कहानी बन गया है।

ब्यावर में मुकाबला कड़ा

अजमेर संभाग के दूसरे प्रमुख शहरी निकायों में भी चुनावी मुकाबला दिलचस्प रहा है। ब्यावर नगर परिषद में कुल 60 वार्डों के लिए चुनाव हुआ और 14 सितंबर को मतगणना के साथ परिणाम सामने आए। उपलब्ध चुनावी अपडेट में वार्डवार नतीजों के आधार पर तस्वीर सामने आ रही है। ब्यावर का परिणाम इसलिए अहम है क्योंकि यहां भी स्थानीय उम्मीदवारों और प्रमुख दलों के बीच मुकाबला रहा। निकाय चुनाव में उलटफेर का असर संभाग के अलग अलग शहरों में अलग रूप में दिखाई देता है।

किशनगढ़ में भी चुनावी मुकाबले पर खास नजर रही। यहां मतदान प्रतिशत में पिछले चुनाव की तुलना में 2.89 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज होने की जानकारी सामने आई थी। पूर्व सभापति दिनेश सिंह राठौड़ की प्रतिष्ठा भी चुनावी मुकाबले से जुड़ी रही। मतगणना के दौरान भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबले को लेकर लगातार अपडेट सामने आते रहे। इससे साफ है कि संभाग में मतदाताओं की भागीदारी और स्थानीय चेहरों का प्रभाव दोनों ही चुनावी नतीजों को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण पहलू रहे।

निर्दलीयों की बढ़ी ताकत

निकाय चुनाव में उलटफेर के बीच अजमेर के परिणाम ने एक बड़ा संदेश दिया है कि निकाय चुनाव में सिर्फ भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला ही पूरी कहानी नहीं है। 11 निर्दलीयों की जीत ने बोर्ड गठन के समीकरण को पूरी तरह बदल दिया है। राज्यभर के निकाय चुनाव परिणामों में भी कई शहरों में निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका महत्वपूर्ण दिखाई दे रही है। ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए स्थानीय स्तर पर संगठन के साथ मजबूत उम्मीदवार और व्यक्तिगत जनाधार भी पहले से ज्यादा जरूरी होता जा रहा है।

अजमेर संभाग की पूरी तस्वीर को देखें तो नतीजे एकतरफा नहीं रहे। कहीं कांग्रेस ने बढ़त बनाई तो कहीं भाजपा का प्रदर्शन मजबूत रहा और कई जगह निर्दलीयों ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। यही निकाय चुनाव में उलटफेर की सबसे बड़ी कहानी है। अजमेर में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बन गई है लेकिन सत्ता की अंतिम तस्वीर निर्दलीयों के रुख पर निर्भर कर सकती है। अब निगाहें मेयर और सभापति पद के चुनाव पर रहेंगी क्योंकि असली राजनीतिक तस्वीर इन पदों के चुनाव के बाद ही पूरी तरह सामने आएगी।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। चुनाव परिणामों के शुरुआती और अपडेट होते आंकड़ों में आधिकारिक पुष्टि या संशोधन के कारण बदलाव संभव है इसलिए अंतिम स्थिति के लिए राजस्थान राज्य निर्वाचन आयोग के आधिकारिक आंकड़ों को प्राथमिक माना जाना चाहिए। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

Editor-in-Chief