पर्युषण में आत्मचिंतन की राह, साध्वीवृंद ने समझाया क्षमा का महत्व
पर्युषण के अवसर पर आध्यात्मिक कार्यक्रम हुआ। साध्वीवृंद ने ध्यान, संयम, क्षमा और आत्मचिंतन को जीवन में उतारने का संदेश दिया। श्रद्धालुओं ने धर्माराधना की।

पर्युषण महापर्व पर आत्माराधना
मुंबई, महाराष्ट्र। पर्युषण महापर्व के पावन अवसर पर कालबादेवी स्थित महाप्रज्ञ पब्लिक स्कूल में आध्यात्मिक और प्रेरणादायी कार्यक्रम आयोजित हुआ। साध्वीवृंद के सान्निध्य में धर्म, आत्मचिंतन और संयम से जुड़े विषयों पर श्रद्धालुओं को मार्गदर्शन मिला। कार्यक्रम में ध्यान को जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने वाली प्रभावी पद्धति बताया गया। पर्युषण में आत्मचिंतन का संदेश देते हुए साध्वीश्री ने कहा कि व्यक्ति को बाहरी भागदौड़ के बीच अपने भीतर की चेतना को पहचानने और जीवन में संतुलन कायम करने की जरूरत है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रावक श्राविकाएं शामिल हुए।
ध्यान से जीवन बदलाव
शासनश्री साध्वीश्री कंचनप्रभाजी ने कहा कि ध्यान जीवन रूपांतरण की उत्तम पद्धति है। उनके अनुसार कुछ लोग सहज, सरल और शांत स्वभाव के होते हैं तथा विपरीत परिस्थितियों में भी अपना संतुलन बनाए रखते हैं। ऐसे लोगों का ध्यान चेतना की पवित्रता को सामने लाता है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति बाहरी दुनिया के सभी व्यवहार निभाते हुए भी भीतर की दुनिया से जुड़ सकता है। ध्यान के आनंद और संयम के सहारे जीवन को सही दिशा दी जा सकती है। पर्युषण में आत्मचिंतन इसी आंतरिक यात्रा को समझने और स्वयं को बेहतर बनाने का अवसर देता है।
शासनश्री साध्वीश्री मंजुरेखाजी ने ध्यान को एकाग्रता बढ़ाने और इंद्रियों पर नियंत्रण पाने का सशक्त माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि प्रेक्षाध्यान के जरिए व्यक्ति अपने भीतर की शक्ति को पहचान सकता है। श्वास प्रेक्षा और दीर्घ श्वास प्रेक्षा के अभ्यास से आवेग और आवेश को नियंत्रित करने में मदद मिलती है तथा मन शांति और सौहार्द की ओर बढ़ता है। उन्होंने स्वस्थ पारिवारिक जीवन में भी ध्यान की भूमिका बताई। उनका संदेश था कि नियमित अभ्यास से व्यक्ति अपने व्यवहार और सोच में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।
क्षमा का मिला संदेश
कार्यक्रम में संवत्सरी की भावना और क्षमा के महत्व पर भी विशेष चर्चा हुई। साध्वीवृंद ने कहा कि यह पर्व अपनी भूलों को पहचानने और दूसरों को माफ करने का अवसर देता है। चौरासी लाख जीवों के प्रति क्षमा और मैत्री की भावना रखने का संदेश दिया गया। पर्युषण में आत्मचिंतन करते हुए व्यक्ति अपने भीतर की कड़वाहट को छोड़ने और मन को निर्मल बनाने की कोशिश करता है। इस अवसर पर प्रतिक्रमण के जरिए आत्मावलोकन और सुधार की भावना को महत्व दिया गया। श्रद्धालुओं को आपसी मैत्री और सद्भाव के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली।
साध्वीश्री ने भगवान महावीर के ध्यान से केवलज्ञान प्राप्त करने का संदर्भ देते हुए कहा कि ध्यान जीवन का विज्ञान है और अनेक समस्याओं के समाधान की दिशा दिखाता है। उन्होंने ध्यान की व्यापक प्रासंगिकता पर जोर दिया और कहा कि इसके अभ्यास से मानसिक संतुलन तथा शांति की दिशा में मदद मिल सकती है। भगवान पार्श्वनाथ के दस जन्मों की पूर्णता पर भी श्रावक समाज ने प्रसन्नता व्यक्त की। कार्यक्रम में धर्माराधना के साथ आध्यात्मिक चिंतन का माहौल बना रहा और उपस्थित लोगों ने इसे भीतर की ओर देखने का अवसर माना।
संस्थाओं की रही भागीदारी
कार्यक्रम का मंगलाचरण तेरापंथ समाज दादर की ओर से किया गया। इसके बाद उपस्थित श्रावक श्राविकाओं ने साध्वीवृंद के सान्निध्य में धर्माराधना और आध्यात्मिक चिंतन का लाभ लिया। आयोजन में आचार्य महाप्रज्ञ विद्यानिधि फाउंडेशन, श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथी सभा, तेरापंथ युवक परिषद, तेरापंथ महिला मंडल और अणुव्रत समिति दक्षिण मुंबई सहित विभिन्न संस्थाओं के पदाधिकारी और सदस्य मौजूद रहे। दक्षिण मुंबई के साथ दादर, परेल, एल्फिंस्टन तथा सायन कोलीवाड़ा क्षेत्र से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु कार्यक्रम में पहुंचे।
आयोजन ने लोगों को रोजमर्रा की भागदौड़ से कुछ समय निकालकर अपने भीतर झांकने और आत्मचिंतन करने की प्रेरणा दी। कार्यक्रम की जानकारी सभा प्रचार मंत्री नितेश धाकड़ और तेयुप दक्षिण मुंबई उपाध्यक्ष दर्शन डागलिया ने दी। पर्युषण में आत्मचिंतन का संदेश कार्यक्रम के केंद्र में रहा और ध्यान, संयम, क्षमा तथा मैत्री के जरिए जीवन को अधिक शांत और संतुलित बनाने की बात सामने आई। आयोजन में धर्म और आध्यात्मिक चेतना के साथ सामूहिक सहभागिता दिखाई दी और श्रद्धालुओं ने साध्वीवृंद के मार्गदर्शन को जीवन में उतारने का संकल्प लिया।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। धार्मिक कार्यक्रम और उसमें दिए गए आध्यात्मिक विचार उपलब्ध कराए गए आयोजकीय विवरण पर आधारित हैं तथा किसी धार्मिक मत या आध्यात्मिक दावे को चिकित्सकीय या वैज्ञानिक सलाह के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।